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लोकतंत्र बचाने जनता को सड़कों पर उतरना पड़ेगा?

देश इस समय एक ऐसे संवैधानिक संकट के मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है, जहां सवाल केवल मतदाता सूची में नाम रहने या कटने का नहीं है। बल्कि सवाल नागरिक होने के अधिकार का है। चुनाव आयोग को लेकर देशभर में उठ रहे सवाल, एसआईआर के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए जाने के आरोप और अब न्याय पालिका की भूमिका पर उठती उंगलियां लोकतंत्र नागरिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों के लिए बेहद गंभीर संकेत हैं। सत्य हिंदी के एक कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता एवं चुनाव मामलों के जानकार अरुण अग्रवाल, वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश और महाराष्ट्र के वरिष्ठ अधिवक्ता फिरदौस मिर्जा ने जिस तरह इन सवालों पर चर्चा की, उसने पूरे विवाद को एक नए राजनीतिक- संवैधानिक आयाम में पहुंचा दिया है। विशेष रूप से अरुण अग्रवाल द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत के संबंधों तथा न्यायिक नियुक्तियों को लेकर लगाए गए आरोपों ने कई असहज प्रश्न खड़े किए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और न्यायिक जांच अलग विषय है। लेकिन लोकतंत्र में इतने गंभीर आरोपों का सामने आना भी अपने आप में चिंता का विषय है। सबसे बड़ा सवाल यह है, जिस चुनाव आयोग के फैसले से करोड़ों नागरिकों के मतदान के अधिकार समाप्त कर दिए गए। उसके खिलाफ न्यायपालिका कितनी तेजी और कितनी निष्पक्षता से हस्तक्षेप कर रही है? यह चुनाव आयोग की मदद कर रही है। एसआईआर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई और विभिन्न राज्यों में मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के मामलों ने यह प्रश्न पैदा किया है। कहीं प्रक्रिया इतनी जटिल तो नहीं बना दी गई कि सामान्य नागरिक अपने ही नागरिक अधिकार को साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता रह जाए? मतदान केवल एक बटन दबाने की प्रक्रिया नहीं है। मतदान नागरिकता की मौलिक अधिकारों की एक राजनीतिक अभिव्यक्ति है। मतदाता सूची से नाम हटना केवल चुनाव से बाहर होना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी आवाज को खो देना है। अंग्रेजों के शासनकाल में केवल पढ़े लिखे कुछ लोगों को ही मतदान का अधिकार था। स्वतंत्रता के पश्चात बिना किसी भेदभाव के सभी नागरिकों को समान मतदान के अधिकार दिए गए।सत्ता में सभी की भागीदारी एक समान रखी गई। इसलिए जब लाखों-करोड़ों नामों के हटने के आंकड़े सामने आते हैं, तो चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका तक हर संवैधानिक संस्था की जवाबदेही नागरिकों के मौलिक अधिकारों को लेकर और भी बढ़ जाती है।

यही वह बिंदु है जहां न्याय पालिका की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। संविधान ने न्यायपालिका को सर्वाेच्च स्थान पर रखा है। विधायिका और कार्यपालिका के कार्यों की समीक्षा का अधिकार और सर्वाेच्चता न्यायपालिका को संविधान ने प्रदान की है। संविधान और जनता अदालत से यह अपेक्षा नहीं करती, वह किसी राजनीतिक दल या किसी व्यक्ति के पक्ष में खड़ी हो। जनता केवल यह चाहती है कि संविधान और न्याय के पक्ष में न्यायालय निर्णय करें। यदि न्यायपालिका को लेकर यह धारणा बनने लगे, वह सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं के बीच उठ रहे विवादों में निष्पक्ष निर्णायक की भूमिका नहीं निभा रही है। तो लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ ही कमजोर हो जाएगा और लोकतंत्र के स्थान पर राजतंत्र स्थापित होने मे देर नहीं लगेगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को लेकर कार्यक्रम में लगाए गए आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण तथ्य, दस्तावेज और न्यायिक प्रक्रिया ही कर सकती है। लेकिन आरोपों को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। न्यायपालिका सर्वाेच्च है, इसलिए उसके खिलाफ कोई सवाल नहीं पूछे जा सकते हैं। यदि आरोप गलत हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच हो और उसका तथ्यात्मक खंडन होना चाहिए। यदि उनमें कुछ सत्य है, तो उसकी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह होती है। जब गंभीर सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाए। आज जनता के सामने मूल प्रश्न यही है।क्या संविधान केवल किताब में सुरक्षित रहेगा या नागरिकों के जीवन में भी दिखाई देगा? यदि मतदाता सूची में नाम नहीं है, नागरिक को अपने अधिकार के लिए प्रमाणों की गठरी लेकर सरकारी कार्यालयों तथा अदालतों में बार-बार चक्कर लगाने पड़ेंगे। न्याय पाने के लिए वर्षों इंतजार करना पडेगा, नागरिक के मूल अधिकार खत्म हो जाएंगे और वह तारीख पर तारीख और चक्कर पर चक्कर लगाने पर उलझा रहेगा ऐसी स्थिति में वह अपनी रोजी-रोटी भी नहीं चल पाएगा। यहीं से विद्रोह उत्पन्न होता है। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का कोई अर्थ नही रह जाता है। जनता का सड़कों पर आना संविधान सम्मत है। शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक प्रदर्शन अधिकारों के लिए होना ही चाहिए। हिंसा लोकतंत्र को मजबूत नहीं करती, बल्कि कमजोर करती है। जनता को अपने अधिकारों के लिए आवाज उठानी होगी। सरकार और सभी संवैधानिक संस्थाओं से उनके जवाब देही को लेकर प्रश्न भी पूछने होंगे। दस्तावेज मांगने होंगे,अदालतों का दरवाजा खटखटाना होगा, अदालत नहीं सुनेगी, तो सड़कों पर आना होगा। आज लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, व्यवस्था की जवाबदेही के लिए है। 13 करोड़ नागरिकों का सवाल हो या एक नागरिक काकृअधिकार संख्या देखकर तय नहीं होता। संविधान में एक नागरिक का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना तेरह करोड़ नागरिकों का है। इतनी बड़ी संख्या बगावत को जन्म देती है।इसलिए अब समय आ गया है, चुनाव आयोग से लेकर न्यायपालिका एवं सभी संवैधानिक संस्थाएं जनता को यह भरोसा दिलाए, कानून सबके लिए समान है। सभी नागरिकों के अधिकार समान है।सत्ता के लिए अलग कानून और आम नागरिक के लिए अलग कानून की धारणा लोकतंत्र के लिए सबसे खतरनाक बीमारी है। जनता यदि चुप रही, तो संस्थाएं और अधिक निरंकुश हो सकती हैं। जनता यदि संविधान हाथ में लेकर, कानून के दायरे में रहकर और शांतिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों के लिए खड़ी होती है।तो लोकतंत्र की असली शक्ति सामने आएगी। लोकतंत्र चुनाव से शुरू होता है, लोकतंत्र की रक्षा जागरूक नागरिकों से होती है। अब सवाल यह नहीं कि जनता सड़कों पर आएगी या नहीं। सवाल यह है कि क्या संवैधानिक संस्थाएं जनता को सड़कों पर आने की नौबत आए इसके पहले ही निष्पक्षता के साथ इन सारे विवादों का निपटारा करें ताकि आम जनता का विश्वास लोकतंत्र और संवैधानिक संस्थाओं पर बना रहे।

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