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भगवान शिव के डमरू वादन का रहस्य

शिवजी का प्रिय वाद्य डमरू है। वे इसे अपने त्रिशूल पर धारण करते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह डमरू ब्रह्माजी ने शिवजी को प्रदान किया था। मान्यता है कि जब सृष्टि में ध्वनि और लय का अभाव था, तब देवी सरस्वती के पृथ्वी पर आगमन के पश्चात् उनके वीणा वादन से ध्वनि का प्रादुर्भाव हुआ। इसी क्रम में भगवान शिव ने डमरू बजाया, जिससे लय और ताल की उत्पत्ति हुई।

शिवजी के डमरू वादन को संगीत, व्याकरण और नृत्य की उत्पत्ति से भी जोड़ा जाता है। डमरू वादन के साथ भगवान शिव ने तांडव नृत्य किया। इसी कारण नटराज स्वरूप को नृत्यकला का आदि प्रतीक माना जाता है। तांडव नृत्य विनाश, सृजन और संरक्षण—तीनों का प्रतीक है। सती के योगाग्नि में प्रवेश करने के पश्चात् भगवान शिव द्वारा किया गया तांडव विनाश का प्रतीक माना जाता है, जबकि नटराज स्वरूप का तांडव सृजन और संरक्षण की दिव्य शक्ति को अभिव्यक्त करता है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार डमरू के प्रथम वादन से ॐ (ओंकार) की ध्वनि प्रकट हुई। इसके पश्चात् भगवान शिव ने पुनः डमरू वादन किया, जिससे संस्कृत व्याकरण के सूत्रों का प्रादुर्भाव हुआ। इन्हें माहेश्वर सूत्र कहा जाता है। वे इस प्रकार हैं—

  1.  ऋलृक्
  2. एओङ्
  3.  ऐऔच्
  4.  हयवरट्
  5. लण्
  6. ञमङणनम्
  7.  झभञ्
  8. घढधष्
  9.  जबगडदश्
  10. खफछठथचटतव्
  11.  कपय्
  12.  शषसर्
  13.  हल्

इस संदर्भ में प्रसिद्ध श्लोक है—

“नृत्यावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धान् एतद्विमर्शे शिवसूत्रजालम्॥”

अर्थात् नटराज भगवान शिव ने अपने नृत्य के अंत में नौ और पाँच बार, कुल चौदह बार, डमरू का नाद किया। परंपरा में इन चौदह नादों को चौदह माहेश्वर सूत्रों से जोड़ा गया है। सनकादि ऋषियों का उद्देश्य आध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति तथा उसके प्रचार-प्रसार से संबंधित माना जाता है। भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए आत्मोन्नति करना उनके जीवन का प्रमुख लक्ष्य था।

इस प्रकार हम देखते हैं कि डमरू को भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में एक साधारण वाद्य नहीं माना गया है। इसके नाद में ध्वनि, लय, ताल, नृत्य और संस्कृत व्याकरण की गहन प्रतीकात्मक अवधारणाएँ समाहित हैं। डमरू से संबद्ध इन चौदह व्याकरणिक सूत्रों को माहेश्वर सूत्र कहा जाता है।

संस्कृत व्याकरण के महान आचार्य महर्षि पाणिनि ने इन्हीं माहेश्वर सूत्रों को आधार बनाकर संस्कृत व्याकरण की प्रसिद्ध रचना ‘अष्टाध्यायी’ का निर्माण किया। अष्टाध्यायी में लगभग चार हजार सूत्र हैं और यह संस्कृत व्याकरण की सर्वाधिक महत्वपूर्ण कृतियों में गिनी जाती है। पाणिनीय व्याकरण में माहेश्वर सूत्रों का विशेष महत्व है, क्योंकि इनके माध्यम से वर्णों के समूहों को संक्षिप्त रूप में व्यक्त करने के लिए प्रत्याहार बनाए जाते हैं।

उदाहरण के लिए, ‘हल्’ प्रत्याहार से संस्कृत के व्यंजनों का बोध होता है, जबकि ‘अच्’ प्रत्याहार से स्वरों का। संधि सहित संस्कृत व्याकरण के अनेक प्रकरणों में इन प्रत्याहारों का महत्वपूर्ण उपयोग होता है।

गुरुकुलों में अध्ययन करने वाले ब्रह्मचारी विद्यार्थी परंपरागत रूप से संस्कृत व्याकरण का गंभीर अध्ययन करते रहे हैं। वे माहेश्वर सूत्रों तथा पाणिनीय व्याकरण के सूत्रों को कंठस्थ करके व्याकरणशास्त्र में प्रवीणता प्राप्त करते हैं।

आज आवश्यकता है कि हमारी नई पीढ़ी, विशेषकर संस्कृत साहित्य और भारतीय ज्ञान-परंपरा में रुचि रखने वाले विद्यार्थी, इन प्राचीन सूत्रों और ग्रंथों का आधुनिक दृष्टि से अध्ययन करें। हमारे प्राचीन ग्रंथों में विज्ञान, ज्योतिष, आयुर्वेद, गणित और दर्शन सहित अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण ज्ञान उपलब्ध है। इस ज्ञान का गंभीर एवं वैज्ञानिक अध्ययन नई खोजों के लिए प्रेरणा दे सकता है।

भगवान शिव का डमरू इस दृष्टि से हमारी समृद्ध भारतीय परंपरा का एक अद्भुत प्रतीक है। उसके नाद में केवल ध्वनि ही नहीं, बल्कि सृजन, चेतना, लय, ज्ञान और भाषा की विराट भारतीय अवधारणा का भी दर्शन होता है। यही शिवजी के डमरू वादन में छिपा रहस्य हमें अपनी प्राचीन ज्ञान-परंपरा को समझने और उसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने की प्रेरणा देता है।

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