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चीनी जे-10सीई पर गहराया संकट

नई दिल्ली । भारत के संभावित 114 राफेल लड़ाकू विमानों की खरीद के सौदे ने पाकिस्तान के रक्षा विशेषज्ञों के बीच गहरी चिंता पैदा की है। मौजूदा 36 राफेल विमानों के साथ, यह अधिग्रहण भारतीय वायुसेना के बेड़े में कुल 150 राफेल जेट लाएगा, इससे इस्लामाबाद में रणनीतिक हलकों में बेचौनी साफ देखी जा सकती है। पाकिस्तानी विशेषज्ञ इस बात पर गहन चर्चा कर रहे हैं कि इतनी बड़ी संख्या में राफेल का शामिल होना क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को कैसे प्रभावित करेगा। उनका मानना है कि इस खरीद से भारत की कई मोर्चों पर ऑपरेशनल क्षमताएं काफी मजबूत होंगी और लॉजिस्टिक्स व मेंटेनेंस की क्षमताएं भी बेहतर होंगी।

पाकिस्तान वायुसेना ने ऐतिहासिक रूप से भारत का मुकाबला करने के लिए उन्नत लड़ाकू विमानों को अपने बेड़े में शामिल किया है, साथ ही पायलट प्रशिक्षण, नेटवर्क-केंद्रित संचालन और आधुनिक एवियोनिक्स पर जोर दिया है। अमेरिकी एफ-16, चीनी जे-10सीई और जेएफ-17 ब्लॉक3 जैसे विमान इस रणनीति के केंद्र में रहे हैं। हालांकि, पाकिस्तानी विशेषज्ञ मानते हैं कि राफेल ऐसा मंच है जो उन्नत सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमताओं, लंबी दूरी के हथियारों और बहु-भूमिका लचीलेपन का एक अद्वितीय संयोजन प्रदान करता है। इसका स्पेक्ट्रा इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट अपनी सुरक्षा क्षमता को बढ़ाता है, जबकि मीटियोर बियॉन्ड-विज़ुअल-रेंज (बीवीआर) मिसाइलें हवाई युद्ध में एक दुर्जेय प्रतिद्वंद्वी बनाती हैं। पहले 36 राफेल विमानों की सीमित संख्या के कारण भारत की तैनाती विकल्प सीमित थे, लेकिन अब 150 विमानों का विशाल बेड़ा भारतीय वायुसेना को एक साथ कई मोर्चों पर निरंतर उपस्थिति बनाए रखने में सक्षम बनाएगा।

इस तरह के बदलाव से पाकिस्तान को अपने हवाई अभियानों की योजना बनाने, मिशन सौंपने और वायु रक्षा संसाधनों के आवंटन पर गंभीर रूप से पुनर्विचार करना पड़ेगा। आधुनिक हवाई युद्ध में सेंसर फ्यूजन और नेटवर्क-आधारित ऑपरेशन के महत्व को समझते हुए, विशेषज्ञ मानते हैं कि अब विमानों के बीच आमने-सामने की लड़ाई की संभावना नगण्य है।

इस अधिग्रहण को केवल सैन्य क्षमता वृद्धि तक सीमित नहीं देखा जा रहा है, बल्कि भारत सरकार की मेक इन इंडिया पहल के तहत घरेलू एयरोस्पेस विनिर्माण को मजबूत करने की दृष्टि से भी देखा जा रहा है। यदि एमआरएफए कार्यक्रम जीतने वाली कंपनी भारत में ही उत्पादन, असेंबली और रखरखाव सुविधाएं स्थापित करती है, तब यह देश के दीर्घकालिक एयरोस्पेस पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करेगा। हालांकि, क्षेत्रीय आधुनिकीकरण के मद्देनजर, कई पाकिस्तानी विशेषज्ञ पांचवीं पीढ़ी के विमानों की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं, जिसके चलते चीनी जे-35 में उनकी गहरी दिलचस्पी बनी हुई है। यह पाकिस्तान की तकनीकी बराबरी बनाए रखने की उत्सुकता को दर्शाता है, लेकिन भारत के राफेल चक्रव्यूह ने फिलहाल उन्हें मुश्किल में डाल दिया है।


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