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पोस्टपार्टम डिप्रेशन का समय पर उपचार जरुरी- विशेषज्ञ

नई दिल्ली । कई महिलाओं को प्रसव के बाद लगातार उदासी, घबराहट, डर, अत्यधिक थकान, बिना वजह रोने की इच्छा और मानसिक बेचौनी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।  विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ये लक्षण कुछ दिनों में ठीक होने के बजाय दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक बने रहें और महिला के दैनिक जीवन को प्रभावित करने लगें, तो यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन यानी प्रसवोत्तर अवसाद का संकेत हो सकता है। इसे सामान्य मूड स्विंग या कमजोरी समझकर नजरअंदाज करना मां और शिशु दोनों के स्वास्थ्य के लिए गंभीर परिणाम पैदा कर सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, पोस्टपार्टम डिप्रेशन एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या है, जो बच्चे के जन्म के बाद किसी भी महिला को प्रभावित कर सकती है। यह केवल पहली बार मां बनने वाली महिलाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि दूसरी या तीसरी बार मां बनने पर भी हो सकता है। प्रसव के बाद शरीर में तेजी से होने वाले हार्माेनल बदलाव, पर्याप्त नींद न मिलना, शारीरिक थकावट, मानसिक तनाव, नई जिम्मेदारियों का दबाव और पहले से मौजूद मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं इसके प्रमुख कारण माने जाते हैं। 

चिकित्सकों का कहना है कि इसे सामान्य बेबी ब्लूज से अलग समझना चाहिए। बेबी ब्लूज के लक्षण आमतौर पर एक-दो सप्ताह में अपने आप कम हो जाते हैं, जबकि पोस्टपार्टम डिप्रेशन लंबे समय तक बना रह सकता है और इसके लिए विशेषज्ञ उपचार आवश्यक होता है। यदि किसी महिला को लगातार उदासी महसूस हो, बिना कारण बार-बार रोना आए, पहले पसंद आने वाले कामों में रुचि खत्म हो जाए, अत्यधिक चिंता या घबराहट बनी रहे, नींद और भूख में असामान्य बदलाव दिखाई दें, खुद को बेकार या दोषी महसूस होने लगे, बच्चे से भावनात्मक जुड़ाव न बन पाए या ध्यान केंद्रित करने और निर्णय लेने में कठिनाई होने लगे, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए। सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है जब महिला के मन में स्वयं को नुकसान पहुंचाने या आत्महत्या जैसे विचार आने लगें। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर बिना देरी किए मनोचिकित्सक या क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट से संपर्क करना चाहिए। 

समय पर इलाज न मिलने पर पोस्टपार्टम डिप्रेशन मां की मानसिक और शारीरिक सेहत को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। इससे बच्चे की देखभाल प्रभावित होती है और मां-बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध भी कमजोर पड़ सकता है। गंभीर मामलों में आत्मघाती विचार या बच्चे को नुकसान पहुंचाने जैसे खतरनाक विचार भी उत्पन्न हो सकते हैं। हालांकि समय रहते पहचान और उचित उपचार से इस स्थिति पर प्रभावी ढंग से काबू पाया जा सकता है। विशेषज्ञ नई माताओं को पर्याप्त आराम और नींद लेने, संतुलित एवं पौष्टिक भोजन करने, हल्का व्यायाम या शारीरिक गतिविधि अपनाने तथा अपनी भावनाओं को परिवार और करीबी लोगों के साथ खुलकर साझा करने की सलाह देते हैं। इस पूरे दौर में परिवार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। 

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