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गांधी की हत्या और बदल गई भारत की राजनीति

(स्वतंत्रता दिवस पर विशेष) 

स्वतंत्रता प्राप्त किए हुए साल भी नहीं गुजरा था कि 30 जनवरी 1948 को महात्मा गांधी की हत्या कर दी गई। इस हृदय विदारक घटना ने नव स्वतंत्र भारत को गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकट में डाल दिया था। भारत विभाजन के दौरान हुई हिंसा और साम्प्रदायिक तनाव से जूझ रहे देश में गांधी की हत्या के बाद आक्रोश की लहर फैल गई। हत्या के बाद कई राज्यों में हिंसक घटनाएं हुईं। नाथूराम गोडसे द्वारा सार्वजनिक रूप से महात्मा गांधी की हत्या किए जाने पर देश में बड़ी प्रतिक्रिया हुई। महाराष्ट्र में ब्राह्मण समुदाय के लोगों तथा उनकी संपत्तियों को निशाना बनाए जाने का इतिहास में उल्लेख मिलता है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद काफी बड़ा जान और माल का नुकसान हुआ था। इन घटनाओं की व्यापकता और स्वरूप को लेकर इतिहासकारों के बीच अलग-अलग आकलन हैं। तत्कालीन सरकार के सामने सांप्रदायिक हिंसा को खत्म करना तथा महात्मा गांधी की हत्या के बाद जो नाराजी आम जनता के बीच में बनी थी उसको रोकना था जिसके कारण सरकार ने महात्मा गांधी की हत्या के बाद जो जान-माल का नुकसान हुआ उसके आंकड़े जग जाहिर नहीं किये।

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या का तत्काल राजनीतिक प्रभाव गहरा रहा। सरकार ने सांप्रदायिक और हिंसक संगठनों पर कड़ा रुख अपनाया। 4 फरवरी 1948 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर प्रतिबंध लगा दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू हिंसक साम्प्रदायिक हिंसा पर कठोर कार्यवाही के पक्षधर थे। इसके साथ उनका मानना था हिंसा को तत्काल खत्म किया जाए। जो लोग हिंसा कर रहे हैं, उन्हें सामाजिक व्यवस्था में आने का अवसर भी दिया जाए। उप प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल का दृष्टिकोण संगठन और उसके कार्यकर्ताओं को मुख्यधारा में लाने पर अधिक केंद्रित था। 

गांधी की हत्या के बाद सरकार ने धर्मनिरपेक्ष राज्य की अवधारणा और कानून-व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया। संविधान सभा ने भी संविधान बनाते समय इस बात का ध्यान रखा। इस घटना ने कांग्रेस नेतृत्व के भीतर भी सत्ता-संतुलन को प्रभावित किया। नेहरू-पटेल नेतृत्व वाली सरकार की भूमिका इस मामले में अधिक निर्णायक बनी। गांधी की हत्या, स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास में वह मोड़ साबित हुई, जिसने हिंसा, साम्प्रदायिकता को संविधान के जरिए इतना मजबूत बनाया कि भविष्य में धार्मिक धुव्रीकरण और नागरिकों के मौलिक अधिकार हमेशा सुरक्षित रहें। इस तरीके से संविधान की रचना की। दुनिया के देशों में भारत पहला देश बना जिसने अपना लिखित संविधान बनाया। अधिकारों का विकेंद्रीकरण किया। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को अलग-अलग अधिकार दिए। जनता को चौथा स्तंभ बनाया। जिस तरह महावत अंकुश के जरिए हाथी को नियंत्रित करता है। वही अंकुश भारतीय संविधान ने आम जनता को दिया है जो हर 5 साल में मताधिकार के जरिए शासकों को नियंत्रित कर पाए। 

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