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खंडवा के जर्रे-जर्रे में धड़कता है यारों का यार किशोर कुमार

(13 अक्टूबर को पुण्यतिथि पर विशेष)

खंडवा। एक ऐसी शख्सियत, जो गायक अच्छा है या इंसान अच्छा है; यह देखना हो या जिंदगी की फिलॉसफी सीखना हो या किसी एक शख्स के प्रति पूरे शहर की दीवानगी को महसूस करना हो, तो एक बार खंडवा जरूर आइए। फिल्मी दुनिया के अप्रतिम गायक किशोर कुमार के शहर खंडवा में आने पर आप यह सोचने को मजबूर हो जाएंगे कि किशोर कुमार खंडवा को ज्यादा प्यार करते थे या खंडवा वाले उन्हें ज्यादा प्यार करते हैं। यहां का हर शख्स खुद को किशोर कुमार जैसा देखता है। एक ऐसा व्यक्तित्व जो खुद अपने आप में मस्तमौला जिंदगी की, रिश्तों की बंदगी की पाठशाला है। ऐसा ही है यारों के यार किशोर कुमार का खंडवा शहर, जहां उनके गीत, किस्से-कहानियां जर्रे-जर्रे में बसे हुए मिलते हैं। उन्हीं दोस्तों, उसी दीवानगी और उन्हीं कहानियां को हमने भी खंडवा पहुंचकर तलाशने की कोशिश की। कल मंगलवार 13 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि है और इस मौके पर फिल्म अभिनेता, सिंगर रघुवीर यादव को संस्कृति विभाग की ओर से उनके स्मारक स्थल पर आयोजित एक समारोह किशोर कुमार अलंकरण सम्मान दिया जा रहा है। कल पूरा खंडवा किशोरमय होने जा रहा है। जगह-जगह उनकी स्मृति में समारोह आयोजित किए जा रहे है। 

मेरा कुछ अरसा पहले खंडवा जाना हुआ था। आप खंडवा जाएं और किशोर कुमार को भूल जाएं, ऐसा हो नहीं सकता। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। खंडवा रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही आधा किलोमीटर की दूरी बॉम्बे बाजार में किशोर कुमार का पुश्तैनी घर है।  वो घर तो बिक गया, लेकिन प्रॉपर्टी के विवाद के चलते उनके भाई अनूप कुमार के बेटे अर्जुन कुमार के पास है। ये मकान बंटवारे में उनके हिस्से में आया था और वर्तमान में भी बहुत ही जर्जर हालत में है। किशोर कुमार यहीं 4 अगस्त 1929 में पैदा हुए थे, पले, पढ़े, बढ़े, गढ़े और दोस्त बनाए और फिर अपने बड़े भाई दिग्गज कलाकार दादामुनि यानी अशोक कुमार के नक्शे कदम पर चलने के लिए मुंबई की राह पकड़ ली। वक्त के साथ फिल्मी दुनिया के सबसे बड़े गायक बन गए, जिसने 18000 से ज्यादा गाने गाए और 8 राष्ट्रीय फिल्म फेयर अवार्ड जीते। इतना बड़ा स्टार जब अपनी जन्मस्थली खंडवा आता था, तो अपने भीतर के सितारा सिंगर को मुंबई छोड़कर मस्तमौला व्यक्ति की तरह आता। अपने दोस्तों से मिलता, घूमता-फिरता, गाता और सबसे बेलाग बात करता, दूध जलेबी खाता, पान खाता, हंसी-ठिठोली करता। लोग कहते कि अरे किशोर तुम एक बड़े सिंगर हो, तो किशोर दा कहते, वह मैं मुंबई में हूं, अभी तो मैं खंडवे वाला हूं और फिर जोरदार ठहाका लगाकर हंस देते। दोस्तों की फरमाइश पर तुरंत गाना बनाकर सुना देते। 

 दूध-जलेबी खाएंगे, खंडवा में बस जाएंगे

खंडवा के बॉम्बे बाजार में ‘लालाजी जलेबी वाले’ की दुकान सिर्फ इसलिए मशहूर हो गई कि वह अपने जिगरी दोस्त हीरालाल शर्मा (लालाजी) की इसी दुकान पर बचपन से दूध जलेबी खाया करते थे। उनके घर की खिड़की से जलेबी की दुकान दिखती थी। जलेबी बनते ही वह खाने के लिए आ धमकते। बाद में जब भी मुंबई से खंडवा आते, तो लालाजी की दुकान पर दूध-जलेबी जरूर खाने जाते। अब हीरालाल शर्मा तो इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन इस पुश्तैनी दुकान को उनकी तीसरी पीढ़ी संभाल रही है। जो रोज सुबह दुकान खोलते के बाद वहां दीवार पर लगी किशोर कुमार की फोटो पर दूध-जलेबी को भोग लगाकर, दीप जलाकर व्यवसाय शुरू करते हैं। दुकान संभालने वाले स्व। हीरालाल जी के प्रपौत्र बादल शर्मा कहते हैं कि आज हम जो कुछ भी हैं, बरसों से जिनका दिया खा रहे हैं, वो किशोर दा ही तो हैं। हमें गर्व होता है कि किशोर दा खंडवा के हैं, वे हमारे दादाजी के दोस्त थे और हमारे यहां ही दूध-जलेबी खाते थे। उन्हीं का आशीर्वाद है जो दुकान खुलने से लेकर बंद होने तक भीड़ लगी रहती है। किशोर दा ने लालाजी की दूध-जलेबी को लेकर एक गीत भी गाते थे कि ‘दूध जलेबी खाएंगे खंडवा में बस जाएंगे’।

यारों के यार किशोर कुमार

खंडवा में किशोर कुमार के दो और जिगरी दोस्त हुआ करते थे, बाबू रंगरेज, जो बॉम्बे बाजार में ही एक पेड़ के नीचे कपड़ा रंगाई का काम करते थे और दूसरे थे रमणीक भाई मेहता। बाबू रंगरेज भी अब नहीं हैं। किशोर दा के जबर्दस्त प्रशंसक मनोज दुबे ने बाबू रंगरेज से किशोर दा की दोस्ती और निमिष भंसाली व उनके भाई नीतीश भंसाली ने उन्हें लेकर एक बहुत ही रोचक किस्सा सुनाया। एक बार किशोर दा खंडवा में प्रोगाम करने आए, तो वह कार्यक्रम शुरू करने से पहले इस बात पर अड़ गए कि पहले मेरे दोस्त बाबू रंगरेज को लाओ, तब मैं गाना सुनाऊंगा। ढूंढने पर एक पेड़ के नीचे कपड़ा रंगते बाबू रंगरेज मिल गए। वे उस समय गीले और कपड़ों पर रंग लगी हालत में थे, उन्हें वैसे ही ले आया गया। तब किशोर कुमार ने उनका हाथ पकड़ा और मंच पर ले गए। इसके बाद उनका हाथ पकड़कर सारे गाने किशोर कुमार ने गाए। ऐसे थे यारों के यार किशोर कुमार।

किशोर कुमार का खंडवा से प्यार

निमिष व नीतीश भंसाली ने किशोर दा की जिंदगी को जैसे अपने जीवन में उतार लिया है। निमिष किशोर दा की बातें करते समय उनके गीत गाते नहीं थकते। वह बताते हैं कि अपनी जन्मभूमि और शहर के लोगों से उनका कितना प्रेम था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है। किशोर कुमार दा यहां जितने भी प्रोगाम देते उसकी शुरुआत वो ऐसे गाकर करते थे। “प्यारे बंधुओं, संगीत प्रेमियों, मेरे काका काकियों, मेरे मामा-मामियों, मेरे भैया-भाभियों, मेरे बच्चों-बच्चियों, आप सबको किशोर कुमार खंडवे वाले का सप्रेम नमस्कार, मैं जो यहां आया हूं आप सबका प्यार है, दुलार है, सत्कार है, ज्यादा वक्त ना लेते हुए ये किशोर कुमार खंडवेवाला गाने को तैयार है।।हा।हा३।”

अद्भुत फिलॉसफी

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।। यानी मित्र, धन, धान्य आदि का संसार में बहुत सम्मान है, किन्तु माता और मातृभूमि का स्थान स्वर्ग से भी ऊपर है। इन पंक्तियों को सार्थक किया किशोर कुमार ने, जिनकी कर्मभूमि तो मुंबई थी, लेकिन सांसें मातृभूमि  खंडवा में बसती थीं। वो बड़ा सितारा बनने के बाद भी खंडवा को नहीं भूले। 13 अक्टूबर 1987 को अपनी मृत्यु से दो माह पहले खंडवा आए और उनके घर का रखरखाव करने वाले सीताराम से बोले- मेरे इस घर की रंगाई-पुताई करा दो, अब मैं खंडवा में ही आकर रहूंगा अपने दोस्तों के बीच। केयरटेकर सीताराम बताते हैं कि मुंबई जाकर एक वसीयत भी लिख भी दी, जिसमें लिखवाया कि मेरे मरने के बाद मेरा अंतिम संस्कार खंडवा में वहीं किया जाए, जहां मैं बैठकर गीत गाया करता था और मेरी अंतिम यात्रा बैलगाड़ी से निकले। निमिष और नीतीश कहते हैं कि वो एक ऐसे कलाकार थे, जिन्होंने यह संस्कार देने की कोशिश की कि अपने माता-पिता, अपने शहर, अपने लोगों को जीवन में कभी मत भूलो। खंडवा को अपनत्व देने वाला किशोर दा जैसा कोई दूसरा नहीं हो सकता।

खंडवा की वह दुकान जहां की दूध जलेबी किशोर कुमार को बेहद पसंद थी।

ऐसी दीवानगी देखी नहीं

बच्चे हों, बुजुर्ग हों या नौजवान। पंचर बनाने वाला हो, सब्जी बेचने वाला हो या मिठाईवाला, घड़ीसाज, खंडवा में जिसे देखो, उसी के भीतर एक किशोर कुमार दिखता है। हम किशोर कुमार के घर गए तो वहां हमें मनोज दुबे मिले, समाधिस्थल पहुंचे तो वहां धर्मेश सोनी, कैलाश और किशोर कुमार स्टाइल में रहने वाले राकेश कन्हारे मिले। सबने किशोर दा का एक-एक गाना सुनाया। लोग सुर में हो या नहीं, लेकिन किशोर कुमार का नाम लेते ही कोई न कोई गाना सुनाने को आतुर जरूर दिखेंगे। किशोर दा के ऐसे ही एक दीवाने निमिष भंसाली हैं, जो तीन भाई हैं और किशोर कुमार स्टाइल में ही रहते हैं। निमिष खंडवा से मुंबई, दिल्ली सहित कई राज्यों में जा-जाकर किशोर कुमार पर कार्यक्रम करते हैं। इन लोगों से मिलकर लगता है कि दुनिया भर के लिए खास किशोर कुमार आम आदमी के सिंगर रहे, जो लोगों के दिलों में धड़कते, महसूस किए जाते हैं।

किशोर दा के जन्मदिन पर पर्व जैसा माहौल खंडवा शहर में किशोर कुमार के चाहने वाले बताते हैं कि किशोर दा कि जन्मदिन 4 अगस्त और पुण्यतिथि 13 अक्टूबर को स्वतंत्रता दिवस, गणतंत्र दिवस, होली, दीपावली राष्ट्रीय पर्वों जैसा माहौल होता है। इस दिन अगर आपको खंडवा में जगह-जगह लाउडस्पीकर लगे मिलेंगे, जिन पर किशोर कुमार के गाने बज रहे होंगे। चाहे जितनी बारिश हो रही हो, लोग-नाचते गाते मिलेंगे। उदाहरण के तौर पर चार सब्जी वाले होंगे तो आपस में चंदा कर लाउडस्पीकर लगा लेंगे और किशोर कुमार के गाने बजाने लगेंगे, खुद गाने लगेंगे। जन्मदिन पर लड्डू बांटेंगे। इस दिन खंडवा में उनके स्मारक और सभागृह में बड़े कार्यक्रम होते हैं। श्रेष्ठ गायकों को सरकार की ओर से किशोर कुमार सम्मान प्रदान किया जाता है।  निमिष भंसाली ने बताया कि इस बार किशोर कुमार अलंकरण फिल्म अभिनेता, बेहतरीन लोकगायक रघुवीर यादव को दिया जा रहा है।  यह खंडवा वालों का किशोर दा के प्रति प्रेम है। ये प्रेम है जो किशोर दा ने लोगों को दिया और लोगों ने किशोर दा को दिया। 13 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर भी ऐसे ही कई कार्यक्रमों के माध्यम से उन्हें याद किया जाता है।


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