Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles
Advertisement

क्या ज्ञानेश कुमार को हटा पायेगा इण्डिया गठबंधन का शक्ति प्रदर्शन

गत 1 नवंबर 2026 को दिल्ली के रामलीला मैदान में इण्डिया गठबंधन द्वारा आयोजित ऐतिहासिक वोट बचाओ, देश बचाओ महारैली में विपक्षी दलों की भारी एकजुटता देखने को मिली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों के खि़लाफ़ बुलाई गई इस रैली में देश के कई प्रमुख दलों के शीर्ष नेतृत्व ने हिस्सा लिया। इस रैली में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के सबसे प्रमुख नेताओं में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा शामिल हुए।

इसके अलावा वरिष्ठ नेता के.सी. वेणुगोपाल, डी.के. शिवकुमार और अभिषेक मनु सिंघवी भी मंच पर मौजूद रहे। जबकि समाजवादी पार्टी  की ओर से उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस रैली में अपनी पार्टी का नेतृत्व किया। तृणमूल कांग्रेस की तरफ़ से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी विपक्ष की इस महारैली में विशेष रूप से शामिल हुईं। तथा राष्ट्रीय जनता दल की ओर से बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और युवा नेता तेजस्वी यादव ने मंच से रैली को संबोधित किया। इसी तरह  पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी शरद पवार गुट से सुप्रिया सुले नेशनल कॉन्फ्रेंस से जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री व पार्टी प्रमुख फ़ारूक़ अब्दुल्ला,आम आदमी पार्टी की ओर से पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान व अन्य कई विपक्षी दलों के अनेक वरिष्ठ नेता इस विशाल रैली को संबोधित करते या सम्मिलत होते दिखाई दिए। 

इस रैली में कॉकरोच जनता पार्टी की भी बाहरी तौर पर एक बड़े रैली समर्थक संग्ठन की  सक्रिय भूमिका नज़र आई। कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने रैली से ठीक पहले सोशल मीडिया पर आधिकारिक घोषणा करते हुए इस रैली को अपना पूर्ण समर्थन दिया था। सीजेपी का मुख्य एजेंडा भी देश में चुनावी शुचिता और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाना रहा है। इस महारैली में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन आईसा की राष्ट्रीय अध्यक्ष और प्रमुख छात्र नेता नेहा बोरा और उनके संगठन की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण और आक्रामक रही। इस रैली के ज़रिए नेहा बोरा मुख्यधारा की राजनीति के बड़े विपक्षी नेताओं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर एक बड़े युवा चेहरे के रूप में उभरी हैं। नेहा बोहरा ने तो अपने संक्षिप्त परन्तु तीखा भाषण देते हुये सीधे तौर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को निष्पक्ष होने के बजाय सत्ता पक्ष का इलेक्शन मैनेजर क़रार दिया। उन्होंने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि लोकतंत्र से खिलवाड़ करने वाले अधिकारियों पर न केवल महाभियोग चलना चाहिए, बल्कि उन्हें जेल भी भेजा जाना चाहिए।  

परन्तु सवाल यह है कि क्या इंडिया गठबंधन का यह विशाल शक्ति प्रदर्शन सरकार पर इतना दबाव डाल सकेगा कि सरकार ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटा दे ? निश्चित रूप से इण्डिया गठबंधन के पास पूर्व केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का ताज़ातरीन उदाहरण है जिन्हें गत  25 जुलाई 2026 को भारी सार्वजनिक और राजनीतिक दबाव के चलते त्यागपत्र देना पड़ा था। उस समय अभूतपूर्व जन-आक्रोश और देशव्यापी दबाव को देखते हुए ही धर्मेंद्र प्रधान ने नैतिक ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा दे दिया था। यह नरेंद्र मोदी सरकार के इतिहास में जनता के सीधे दबाव में किसी बड़े कैबिनेट मंत्री के इस्तीफ़े का एक विरल उदाहरण माना जाता है।

निःसंदेह धर्मेंद्र प्रधान के त्यागपत्र के बाद गत 1 नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी इण्डिया गठबंधन की  वोट बचाओ, देश बचाओ महारैली भी भारतीय राजनीति के लिहाज़ से एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। इस रैली के ज़रिए विपक्ष ने ईवीएम के साथ-साथ सीधे मतदाता सूचियों में कथित हेरफेर और लगभग 13.2 करोड़ वोटर्स के नाम हटाए जाने के मुद्दे को देश के राजनीतिक केंद्र में ला दिया है। इससे भविष्य के चुनावों विशेषकर 2027 के उत्तर प्रदेश, पंजाब और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनावों में चुनावी शुचिता पर बड़ी बहस छिड़ गयी है। इस रैली से ठीक पहले 31 अक्टूबर को विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध एक प्रतीकात्मक जनता द्वारा महाभियोग प्रस्ताव भी पारित किया। विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग एक स्वायत्त संस्था के बजाय सत्ता पक्ष के इशारे पर काम कर रहा है।

तो क्या इतने सुबूतों व इतने दबाव के बाद ज्ञानेश कुमार जल्द हटाए जा सकते हैं?  वास्तव में सरकार व ज्ञानेश कुमार पर अभूतपूर्व दबाव होने के बावजूद संवैधानिक प्रावधानों और वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य के आधार पर ज्ञानेश कुमार को उनके पद से हटाना बेहद जटिल नज़र आता है। भारतीय संविधान के अनुसार मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज के समान ही बेहद कठिन है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई विशेष बहुमत से महाभियोग प्रस्ताव पास होना ज़रूरी है। वर्तमान में संसद के समीकरणों को देखते हुए विपक्ष के पास अकेले इस तरह का बहुमत भी नहीं है। हाँ अगर न्यायालय इस प्रक्रिया में कोई गंभीर ख़ामी पाता है, तो ज्ञानेश कुमार के पद पर बने रहने पर नैतिक संकट खड़ा हो सकता है। परन्तु सुप्रीम कोर्ट 17 नवंबर 2026 को मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयोग के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करने वाला है। इस बीच  प्छक्प्। गठबंधन ने साफ़ किया है कि इस रैली की गूंज संसद में दिखाई देगी और वे ज्ञानेश कुमार के खि़लाफ़ औपचारिक महाभियोग का प्रस्ताव लाएंगे।

केंद्र सरकार,भारतीय जनता पार्टी और ख़ुद चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया को पूरी तरह से वैध और पारदर्शी बताया है। जबकि विपक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग के अंदर ही अन्य दो चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में एसआईआर से जुड़े फ़ैसलों पर 14 बार औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। परन्तु विपक्ष के इन आरोपों व सत्ता के बचाव की दलीलों के बीच ऐसा प्रतीत होता है कि जब तक या तो सरकार स्वयं बैकफ़ुट पर नहीं आती या फिर सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई सख़्त निर्णय अथवा टिप्पणी नहीं आती तब तक केवल विपक्ष के दबाव में किसी संवैधानिक प्रमुख को हटाना संभव नहीं लगता। क्योंकि ज्ञानेश कुमार के हटने के फ़ौरन बाद ही केंद्र सहित विभिन्न राज्यों के चुनाव नतीजों की वैधता पर भी सवाल उठने वाला है। इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या 1 नवंबर का इण्डिया गठबंधन का शक्ति प्रदर्शन ज्ञानेश कुमार को यथा शीघ्र हटा पायेगा? 


Comments (0)

Leave a Comment