Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles

मानसिक विकास के लिए घातक है बच्चों की अत्यधिक आज्ञाकारिता

नई दिल्ली। बच्चों की अत्यधिक आज्ञाकारिता उनके मानसिक विकास के लिए घातक हो सकती है। यह आदत बच्चों से उनकी सोचने, अपनी राय व्यक्त करने और स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता छीन सकती है, जिससे वे भविष्य में कई समस्याओं का सामना कर सकते हैं। यह कहना है मनोविज्ञान विशेषज्ञों का। उनके अनुसार, जब बच्चों को बचपन से ही हर बात पर चुप रहना और हाँ कहना सिखाया जाता है, तो यह उनके व्यवहार का स्थायी हिस्सा बन जाता है। ऐसे बच्चे बड़े होकर अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने में भी हिचकिचाते हैं और अपनी बात कहने से डरते हैं। यह सिर्फ अच्छे संस्कार नहीं, बल्कि माता-पिता का प्यार या प्रशंसा खोने का डर भी हो सकता है।

यदि बच्चा अपना मनपसंद काम छोड़कर तुरंत आपकी बात मान लेता है, तो यह खुशी की बजाय इस बात का संकेत हो सकता है कि उसे ना कहने पर डांट पड़ने का या बुरा बच्चा कहे जाने का डर है। लगातार दूसरों की तारीफ या शाबाशी पाने की चाहत ऐसे बच्चों को पीपल-प्लीजिंग सिंड्रोम का शिकार बना देती है, जहाँ वे अपनी इच्छाओं को दबाने लगते हैं। इसके चलते, उनमें बड़े होकर खुद निर्णय लेने की क्षमता विकसित नहीं हो पाती और वे आसानी से गलत संगत या दबाव वाले माहौल में फंस सकते हैं, क्योंकि उन्हें ना कहना आता ही नहीं। हद से ज्यादा शांत और आज्ञाकारी बच्चे अक्सर भीतर से भावनात्मक थकान (इमोशनल बर्नआउट) और तनाव में होते हैं, भले ही बाहर से वे सबके पसंदीदा दिखें। वे अपनी भावनाओं को व्यक्त न कर पाने के कारण अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं। यदि आपको लगता है कि आपका बच्चा इस समस्या से जूझ रहा है, तो कुछ बदलाव जरूरी हैं। घर में एक ऐसा माहौल बनाएं जहाँ बच्चे अपनी असहमति या विचार बेझिझक व्यक्त कर सकें और आप उनकी बात को शांति से सुनें। बच्चों के सामने अपनी गलती स्वीकार करने से उनका डर कम होता है और वे खुलकर अपनी बात रख पाते हैं। उन्हें यह सिखाना महत्वपूर्ण है कि गलत बात पर ना कहना बदतमीजी नहीं, बल्कि अपनी सीमाएं तय करना है। यदि समस्या गंभीर है, तो किसी बाल मनोवैज्ञानिक या काउंसलर की मदद लेने में संकोच न करें। 


Comments (0)

Leave a Comment