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पिछले कुछ सालों से देश भर में नये मेडीकल कॉलेज खोलने की होड़ मची हुई है और कोई भी राज्य सरकार पीछे नहीं छूटना चाहती इसलिए जब तब नये मेडीकल कॉलेज खोलने की घोषणाएं अखबारों की सुर्खियों में रहती हैं। हाल ही में मध्यप्रदेश सरकार ने भी 12 और मेडीकल कॉलेज खोलने की घोषणा की है। देश के अन्य राज्यों में भी स्वास्थ्य सेवाओं के प्रसार की यही कहानी है और नतीजा यह कि 2014 में 387 से बढ़कर 2026 में मेडीकल कॉलेजों की संख्या 858 हो चुकी है। इसी अवधि में एमबीबीएस की सीटें 51 हजार से बढ़कर एक लाख 1 लाख 40 हजार तथा पीजी की सीटें 31 हजार से बढ़कर 86 हजार हो चुकी हैं। इस बीच महाराष्ट्र आईएमए के प्रदेश सहसचिव डॉ अनुपम ताकलकर का बयान गौरतलब है कि इस बढ़ोत्तरी पर विराम देने की जरूरत है क्योंकि इससे शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की पूरी आशंका है।
वाकई इस मामले पर पुनर्विचार एवं गहन मंथन की आवश्यकता है। जनता में लोकप्रियता हासिल करने के लिये राजनेता इस तथाकथित विकास का आश्वासन दे रहे हैं परन्तु वास्तव में यह औचित्यहीन कदम स्वास्थ्य सेवाओं पर बुरा असर डालने वाला है। दरअसल किसी अन्य शिक्षा संस्थान की तुलना में मेडीकल शिक्षा एकदम अलग है। उदाहरण के लिये एक बढ़िया तकनीकी संस्थान खोलने में जमीन, भवन, हॉस्टल, प्रयोगशाला, उपकरण तथा शिक्षकों की व्यवस्था करना ही पर्याप्त होता है। लेकिन मेडीकल कॉलेज में इन सबकी व्यवस्था के अलावा एक और अनिवार्य जरूरत होती है कि वहां बड़ी संख्या में मरीज भी आयें। तकनीकी शिक्षा तो किसी उन्नत प्रयोगशाला में ही प्राप्त की जा सकती है जबकि मेडीकल शिक्षा के लिये मरीज एक अनिवार्य फैक्टर है क्योंकि यह पढ़ाई ऐसी है जिसमें छात्रों से मरीज देखने एवं रोग का निदान तथा उपचार करने का ही कार्य करवाया जाता है। अन्य तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के बाद उक्त छात्र को तजुर्बे के लिये कहीं वास्तविक काम करके व्यावहारिक तजुर्बा लेना पड़ता है जबकि एक नया एमबीबीएस किसी मरते हुए इन्सान की जान बचा सकता है।
यद्यपि मेडीकल कॉलेज खोलने के लिये निर्धारित न्यूनतम जमीन की शर्त अब हटा दी गई है लेकिन फिर भी इसके लिये काफी ज्यादा जमीन की जरूरत होती है जो आम तौर पर शहरों के बीच उपलब्ध नहीं होती। इसलिए नए मेडीकल कॉलेज शहर से दूर स्थानों पर बनाए जाते हैं। सर्वविदित है कि ऐसे बहुत से नये मेडीकल कॉलेजों में मरीजों का पहुंचना आसान नहीं है। इसके लिये कहीं कहीं मुफ़्त ऑटो या मुफ्त बस सेवा की व्यवस्था की जाती है। फिर भी वांछित संख्या में मरीज नहीं पहुंच पाते। उस पर शिक्षकों का अभाव दूसरी बड़ी समस्या है। मेडीकल शिक्षा की नियामक संस्था एनएमसी के निरीक्षण दौरे के समय शिक्षकों को उपस्थित अवश्य दिखा दिया जाता है लेकिन ये सिर्फ खानापूरी के लिये आते हैं। हालत यह है कि अधिकांश मेडीकल कॉलेज इसी तरह की घोस्ट फैकल्टी से चल रहे हैं। परिणामस्वरूप खूबसूरत बिल्डिंग और अत्याधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर के बावजूद ऐसे कॉलेजों में एकेडमिक तथा प्रैक्टिकल शिक्षा आधी अधूरी ही हो पाती है। वही हाल पीजी शिक्षण का भी है। इस वजह से बहुत से ऐसे डॉक्टर तैयार किये जा रहे हैं जिनका क्लीनिकल ज्ञान अधूरा है और वे पर्याप्त प्रशिक्षण के बिना ही मरीजों का उपचार करने के लिये अधिकृत हैं।
ऐसा नहीं कि एनएमसी को इन सब धांधलियों की जानकारी नहीं लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि गैरजरूरी मेडीकल कॉलेज खोलने के राज्य सरकारों के लोकप्रिय अभियान को चालू रखने के लिये एनएमसी भी खानापूरी में पूरा सहयोग दे रही है। वैसे भी देश में वास्तविक स्थितियों को नजरअंदाज करके कागजी कार्रवाई को प्राथमिकता देने की परम्परा है। स्वास्थ्य सम्बन्धी अन्य योजनाओं का भी यही हाल है। उचित गाइडलाइंस के अभाव में आयुष्मान योजना भी दम तोड़ रही है। सरकार अस्पतालों पर दोष मढ़ती है और अस्पताल सालों से लम्बित पड़े करोड़ों के बाकी भुगतान को लेकर लामबंद हो रहे हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्र बिल्कुल खस्ताहाल हैं जहां न दवाएं हैं और न ही डॉक्टर। जिला अस्पतालों में भी डॉक्टर और स्टॉफ के सैकड़ों पद खाली हैं जिससे वे मरीजों का दबाव झेलने में असमर्थ हैं। लेकिन कागजों पर स्वास्थ्य सेवाओं का विकास जारी है जिसमें नए नए मेडीकल कॉलेज खोलना एक शिगूफे के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है।
ऐसा प्रतीत होता है कि धीरे धीरे ये वास्तविकता आम जनता को भी समझ आ रही है। अभी जारी 2026-27 के सत्र की काउंसलिंग में नीट यूजी की लगभग 6000 सीटें खाली हैं। प्राइवेट मेडीकल कॉलेजों की करोड़ों की फीस और लगातार गिरती साख के चलते हो सकता है कि ये सीटें पूरी न भर पायें। पिछले साल पीजी की करीब 20000 सीटें खाली रह गई थीं जिसके बाद सरकार ने कट ऑफ समाप्त कर दिया था। उसके बाद हजारों ऐसे छात्र भी पीजी में प्रवेश के पात्र हो गये थे जिन्हें माइनस में मार्क्स मिले थे। ऐसी परिस्थिति में और अधिक मेडीकल कॉलेज खोलना सिर्फ जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ ही कहा जा सकता है। इसलिए अंधाधुंध मेडीकल कॉलेज खोलने से बेहतर ये होगा कि सभी ग्रामीण स्वास्थ्य केन्द्र एवं जिला अस्पताल भी विकसित और उन्नत किये जायें जिससे आसपास के ग्रामीण मरीजों को सही उपचार के लिये कहीं दूर न जाना पड़े। नया इंफ्रास्ट्रक्चर तभी उचित है जब उसमें विधिवत शिक्षा की पूरी व्यवस्था उपलब्ध हो सके। मरीजों की उचित संख्या के अभाव और नियमित शिक्षकों की अनुपलब्धता के चलते ये नए मेडीकल कॉलेज सिर्फ शोपीस का काम करेंगे। ऐसी अधूरी शिक्षा और अपूर्ण प्रशिक्षण के बाद जो डॉक्टर निकलेंगे वे रोगों के निदान और उपचार में भली भांति प्रशिक्षित एवं पारंगत नहीं होंगे। सरकारों को चाहिये कि वे संख्या के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान दें। वोट हासिल करने के लिये नए नए मेडीकल कॉलेज खोलते जाना वास्तव में स्वास्थ्य सेवाओं के लिये नुकसानदेह ही साबित होगा।
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