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न्यायपालिका कसौटी पर

भारत की राजधानी दिल्ली जंग का मैदान बन गई है। इस जंग में विपक्षी राजनीतिक दलों के साथ-साथ कॉकरोच, वकील, पत्रकार और आम नागरिक बड़ी संख्या में शामिल होते जा रहे हैं। कुछ दिन पहले तक इस बात का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता था, इतनी जल्दी इतनी तेजी के साथ इस तरह की जंग के हालात बनेंगे।

सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच में सत्ता की लड़ाई मानी जा सकती है, लेकिन आम आदमी, अधिवक्ता, पत्रकार, युवा और बच्चे यदि इस लड़ाई में शामिल हो रहे हैं, तो यह समझना होगा कि कहीं कोई ना कोई बात तो है, जो इतने बड़े पैमाने पर लोग सड़कों पर आकर अपने अस्तित्व के लिये यह लड़ाई लड़ रहे हैं। रामायण में गोस्वामी तुलसीदास जी ने स्पष्ट रूप से लिखा है, समरथ को नहीं दोष गुसाईं, होई वही जो राम रचि राखा। राजधानी दिल्ली में जिस तरह के हालात बने हुए हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में जिस तरह से संवैधानिक संस्थाएं सरकार के पक्ष में आकर खड़ी हो गई हैं। यह सरकार की समर्थता है। सरकार को दोष भी नहीं दिया जा सकता है। ऐसी स्थिति में अब लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर एकजुट हो रहे हैं। यदि यह कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। 

संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख पदों पर जो लोग बैठे हैं, उनके बारे में एक धारणा बन गई है, वह सब एक विचारधारा के लोग हैं। जिन्हें सुनियोजित रूप से प्रमुख पदों पर बिठाया गया है। यहां तक कि स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालयों में भी जो नियुक्तियां पिछले वर्षों में की गई हैं, वह भी एक विचारधारा के लोगों की हैं। अब हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की बार में भी यह चर्चा होने लगी है। भारतीय अधिवक्ता परिषद से जुड़े एक विचारधारा के लोग है। उन्हें ही सरकारी वकील और जजों के रूप में नियुक्त किया गया है। पिछले कुछ वर्षों से न्यायपालिका भी सरकार को बचाने का काम कर रही है। जितनी भी जांच एजेंसियां हैं, संवैधानिक पदों पर बैठे हुए अधिकारी हैं, वह सब सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं। सत्ता पक्ष के लिये अलग और विपक्ष के लिये अलग नियम-कानून हैं। लोगों को कहीं से भी न्याय मिलता हुआ नहीं दिख रहा है। जिसके कारण अब सड़कों पर जंग की स्थिति देखने को मिल रही है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति, उसके बाद एसआईआर, चुनाव के पूर्व एवं चुनाव के दौरान जो भी मामले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में गए हैं, उन सब मामलों में न्यायपालिका ने सरकार को प्रत्यक्ष रूप से फेवर किया है। तारीख पर तारीख बढ़ाकर मामले को टाल दिया गया, सरकार जो चाहती थी, वह उसने कर लिया, संविधान और कानून का कोई पालन नहीं हुआ। हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट द्वारा जो भी आदेश पारित किए गए, उसमें सरकार के लिए एक चोर दरवाजा खोल दिया गया। इस चोर दरवाजे से सरकार बाहर निकलकर वह सब काम करती रही, जो वह करना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने रविवार के दिन विशेष सुनवाई की, उसके पहले भी जो सुनवाई की थी और सुप्रीम कोर्ट ने जो आदेश दिया था, उसका पालन दिल्ली पुलिस ने नहीं किया। हर आदेश में सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट कानून व्यवस्था के नाम पर अथवा आधा अधूरा फैसला देकर सरकार के लिए रास्ता छोड़ देती है। इसका दुरुपयोग सरकार और उसकी एजेंसियां कर रही हैं। हाल ही में जिस तरह से वकीलों, पत्रकारों को दिल्ली में अरेस्ट किया गया, उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी ट्रेन बंद कर दी गई। मेट्रो स्टेशन बंद कर दिए गए। 4 किलोमीटर क्षेत्र दिल्ली में प्रतिबंध लगाया था, लेकिन दिल्ली पुलिस ने दिल्ली के अधिकांश हिस्सों में बैरिकेड लगा दिए, प्रदर्शनकारियों को दौड़ा-दौड़ा कर मारा गया। दिल्ली पुलिस द्वारा अवैध तरीके से प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। हिरासत में लिये गए लोगों को कई घंटे तक बसों में घुमाया गया। उन्हें मल-मूत्र त्यागने की भी सुविधा नहीं दी गई। हिरासत में जो हजारों लोग बंद थे, उन्हें खाना-पानी भी नहीं दिया गया। यह स्थिति पहली बार दिल्ली में देखने को मिली। 

दिल्ली में 35 हजार से ज्यादा अर्ध सैनिक बलों को तैनात किया गया है, जिसके कारण अब लोगों में सरकार के खिलाफ विद्रोह देखने को मिला रहा है। जिन लोगों को कोई मतलब नहीं था, वह भी नाराज होकर सड़कों पर निकल रहे हैं। न्यायपालिका और सरकार के खिलाफ अब वकील और बार से भी आवाज आने लगी है। सारे विपक्षी नेता राष्ट्रपति सहित हर दरवाजे को खटखटाकर आ गए हैं। अब अंतिम दरवाजा न्यायपालिका का है। सुप्रीमकोर्ट में याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, मुख्य न्यायाधीश ने नेता प्रतिपक्ष और विपक्षी सांसदों से मिलने से मना कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से जिस तरह के फैसले आ रहे हैं। उससे आम जनता को न्याय मिलता हुआ दिख नहीं रहा है। सुप्रीम कोर्ट जो आदेश देती है, उसका पालन ना तो दिल्ली पुलिस कर रही है, नाही केंद्र सरकार कर रही है। ऐसी स्थिति में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास दिन-प्रतिदिन बढ़ता चला जा रहा है। दिल्ली में प्रदर्शन के दौरान पुलिस बल जिस तरह का पक्षपात कर रहा है। बांसुरी स्वराज के नेतृत्व में भाजपा महिला मोर्चा का प्रदर्शन प्रतिबंधित स्थान पर हो रहा है। दिल्ली पुलिस चुप है। वर्तमान स्थिति को जल्द नहीं संभाला गया, तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश सरकार मानेगी? इसको लेकर सभी के दिमाग में संदेह उत्पन्न हो रहा है। दिल्ली प्रेस क्लब में दिल्ली पुलिस घुस गई। आगे आने वाले दिन कैसे होंगे, भगवान ही मालिक है। जिस तरह के हालात बन गये है, वह एक तरह से गृह युद्ध जैसे हैं। यदि ऐसा हुआ, तो इसका बड़ा भारी नुकसान होना तय है। राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह से भारत की साख दांव पर लगी हुई है, उसको देखते हुए यह कहने में जरा भी संकोच नहीं है, आने वाले समय में भारत को भारी दुष्परिणाम भोगना पड़ेंगे।  


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