Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles

राम मंदिर में दानपात्र में गड़बड़ी हुई जिम्मेदार कौन

राम मंदिर अयोध्या में 500 सालों के बाद बना और समाज बादी पार्टी के नेता श्री अखिलेश यादव ने दान सम्पति पर करोड़ो के गबनहोने का आरोप लगा लिया है। इस मामले में अब गजब का माहौल देखने को मिल रहा है इसमें अब तक दो आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है, उनके पास से लाखों रुपये की बरामदगी भी कई है। मामला बढ़ने के बाद जांच तेज कर दी गई इस मामले पर चिंता जताने वाले नेताओं में अब ,सीनियर बीजेपी नेता और राम जन्मभूमि आंदोलन के अनुभवी नेता विनय कटियार भी शामिल हो गए हैं। रविवार को अपने घर पर पत्रकारों से बात करते हुए कटियार ने कहा कि अगर ट्रस्टी खुद ही गड़बड़ी में शामिल पाए जाते हैं, तो इससे मंदिर प्रोजेक्ट का मकसद ही क्या । कटियार ने कहा कि प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप के बाद इस मामले में एसआईटी गठित की गई है और अब दूध का दूध, पानी का पानी हो जाएगा इसमें मंदिर के ट्रस्टी चंपत को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है बाद  में ट्रस्ट  के महासचिव चंपत राय, ट्रस्टी डॉ। अनिल मिश्रा और परिसर व्यवस्थापक गोपाल राव हैं, जिन पर मंदिर व्यवस्था की जिम्मेदारी होने की बात कही जा रही है। जानकारी के अनुसार 7 जून को चढ़ावे की गिनती के दौरान एक कर्मचारी सीसीटीवी में नोटों की गड्डी छिपाते हुए दिखाई दिया ऐ सब का ध्यान भगवान राम पर नहीं बल्कि उस धन पर टीका है जो किसी ने दान किया होगा अब आप इस मुद्दे पर आपस में ही लड़ेंगे तो दूसरे लोग आपके धर्म का मज़ाक उड़ा देंगे इससे राम के नाम पर एक विश्वास टूटेगा भगवान हैं राम अगर किसी ने करोड़ का दान दिया तो खुश होंगे ऐसा बिलकुल नहीं है वो सेवा के प्रति अपने को मर्यादा में रहने की शक्ति देते हैं आखिर क्यों दिया भगवान राम जो दुनिया को चला रहें हैं वो पैसे के मोहताज होंगे इसी पैसे से गरीबों को बाँट देते तो सार्थक होता खैर जहाँ तक पैसा चुराने की बात है वो अंत में पैसा लेकर कहाँ जाएगा सब यहीं रहने वाला है इसलिए इस पर विवाद से बचना चाहिए आप समझदार बनो दूसरे के दुःख में काम आओ और इंसान बनने की कोशिश करे जो भगवान राम का सच्चा भक्त है वो यहाँ नहीं कहीं एकांत में उनका ध्यान कर रहा होगा और भगवान राम जब रावण को हराकर अयोध्या आए थे तो श्रीराम ने हनुमानजी की सहायता से लंका के राजा रावण को हराया था। और युद्ध जीतने के बाद वह सीता माता, लक्ष्मण जी, हनुमानजी और अपने दूसरे साथियों के साथ अयोध्या पहुँचे। जब वह अयोध्या के राजा बने तब सीता माता ने उनसे निवेदन किया कि जिन्होंने भी युद्ध जीतने में उनकी सहायता की है वह उन्हें धन्यवाद के रूप में कुछ भेंट देना चाहती हैं। सीता माता ने सबको कुछ न कुछ अनमोल भेंट दी। अब हनुमानजी की बारी थी। श्रीराम मुस्कुराते हुए बोले, “आप भला हनुमान को क्या भेंट देंगी? इनकी निस्वार्थ सेवा और भक्ति का तो कोई मोल हो ही नहीं सकता।” माता सीता ने फिर भी अपनी एक मोतियों की माला, हनुमानजी को भेंट में दी। हुनमानजी उस माला के एक-एक मोती को दाँतो से तोड़कर देखा और ज़मीन पर फ़ेंक दिया। सीता माता ने हनुमानजी से पूछा, “आपने ऐसा क्यों किया हनुमान? क्या आपको यह माला पसंद नहीं आई?” “ऐसी बात नहीं है माता, पर यह भेंट मेरे किसी काम की नहीं, क्योंकि इसमें मुझे मेरे प्रभु राम नहीं दिखे। अगर मोतियों में राम नहीं तो इनका मोल मेरे लिए मिट्टी के समान है।“ “तो क्या आपके अंदर राम हैं?” सीता माता ने पूछा। सीता माता के ऐसा कहते ही हनुमानजी ने अपना सीना चीर कर सबको अपने हृदय में बसे राम-सीता की छवि के दर्शन कराए। जैसे हनुमानजी ने श्रीराम का कार्य किसी उपहार के लालच में नहीं किया बल्कि इसलिए किया क्योंकि श्रीराम की सेवा करके उन्हें आनंद मिलता था। वैसे ही क़ोई किसी चीज के लालच में ना पड़े भगवान राम का सच्चा भक्त ब्रह्मचारी होता है क्योंकि उसका प्रेम राम से है ऐ आपके सामने की कई घटना जो रामरहीम से लेकर आशाराम बापूजी तक है जो ब्रह्मचारी बनने का पाठ पढ़ाते थे आज उस नियम को तोड़ कर काम के वश में आ गए और अब जेल में अदालत के फैसला से गए हैं अतः पता नहीं ऐसे कितने बाबा होंगे जो धर्म की आड़ लेकर झूठ बोलकर आपको कुछ बताता होगा और वो भी कहीं उसी जाल में तो नहीं है? भगवान राम से सबसे बड़ी शिक्षा लेने की यह जरुरी है सच बोलो झूठ का सहारा नहीं नहीं तो एक झूठ से बचने के लिए हजार झुठ बोलना पड़ेगा और आपकी नींद ख़राब बौगी सेहत पर बुरा असर पड़ेगा राम सेवा सत्य और प्रेम में विश्वास रखते हैं एक तरफ आपके पास भौतिक बस्तु का जाल पड़ेगा फिर आप फंस इसलिए जातो हो कि ऐ सामर्थ नहीं है कि उसी के लिए जीना और उसी के लिए मरना और जब तक काम के बंधन से मुक़्त नहीं होंगे तब तक उसके लिए आप गलत काम भी कर देते हैं आपको यह अहसास नहीं होता है कि जिस माता पिता ने आपको पालन पोषण किया हैं उनको बुढ़ापे में अकेले इसलिए छोड़ देते हो कि मेरी पत्नी प्यारी है और मैं उसके साथ काम में वशीभत हो ताकि उसके साथ मजे कर सकूँ इसलिए आप भगवान राम के लाख पूजा करनेपर भी उसका प्रकाश नहीं दीखता जब दिखेगा तो फिर उसमें विलीन होने की इक्छा होगी क्योंकि वो इतना तेज है कि बाली को मोक्ष मिला और गोस्वामी तुलसीदास जी ने जब स्त्री का मोह त्याग दिया तब वो राम चरित्र मानस लिखा और दुनिया को हिंदी में भगवान राम का उपदेश सबको इसलिए बताया क्योंकि यह आपको संकट से बचाता है आपको गलत और सही का फर्क मालूम होता है

एक बार मेरे पिताजी का हाथ फिसलने से टूट गया मैं मुंबई से पटना तुरंत पहुँचा वहाँ जब पिताजी को देखा तो दर्द से कराह रहें थे किसी ने बहुत ही भरोसा से बोला कि यह डॉक्टर बहुत बढ़िया है पिताजी ने विश्वास किया और जब डॉक्टर के पास गए तो वहाँ मेरी माँ भी थी माँ का एक बेटा अपनी माँ का टुटा हुआ हाथ के इलाज के लिए आया था वो बहुत कराह रही थी बाद में उसके लड़के ने बताया कि मेरा भाई ही औरत की बात में आकर माँ को मार कर इसका हाथ तोड़ दिया है मुझे बहुत दुःख हुआ कि आखिर माँ ने ऐसा क्या किया जो जान लेने पर उतारु है ऐ उसका एक नालायक बच्चा ही होगा ऐसे आजकल एक नहीं कई मामले हैं जो कोरोना काल में आपने देखा होगा देखो पहला भगवान ऊपर वाला है और अगर क़ोई दूसरा भगवान है तो आपके माता पिताजी ही हैं कुछ भी बोले उनकी बात पर गुस्सा नहीं होना नहीं तो दुनिया से जाने के बाद आपको बहुत तकलीफ होगा कौन सही हैं कौन गलत इसका पता भगवान राम के ध्यान से ही मालूम होगा और भगवान राम के ध्यान के लिए में आपको ब्रह्मवर्चस के नियम को पालन करना होगा  ब्रह्मवर्चस का शाब्दिक अर्थ ब्रह्म का तेज या दिव्य आभा है। जिसने अपने दिमाग़ से काम वासना को निकाल कर फेंक दिया समझ लेना वह ब्रह्मवर्चस का नियम पालन कर सकता है जो अध्यात्म में, यह वह उत्कृष्ट आत्मबल, सात्विक ऊर्जा और ज्ञान-तेज है जो एक साधक को कठोर तपस्या और शुद्ध जीवनशैली से प्राप्त होता है। भगवान राम अब ब्रह्मचारी वह व्यक्ति है जो शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तर पर पवित्रता और संयम का पालन करता है ब्रह्मचर्य केवल विवाह न करना या वासना से दूर रहना नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण जीवनशैली है, जिसे भगवान राम ने अपनाया था,एक सच्चे ब्रह्मचारी के मन में वासना या कामुक विचार नहीं आते हैंघ् वह वासना पर नियंत्रण रखता है सभी इंद्रियों (आंख, कान, नाक, जीभ, त्वचा) को वश में रखता है ब्रह्मचारी अपने वीर्य या प्राण-ऊर्जा की रक्षा करता है, जिससे उसका शरीर और मस्तिष्क बेहद ऊर्जावान रहता है सात्विक आहाररू वह अत्यधिक मसालेदार, तला-भुना, और उत्तेजक भोजन से बचता है। उसका आहार सात्विक और नियंत्रित होता है  वह दिखावे और अत्यधिक शारीरिक साज-सज्जा से दूर रहता है, क्योंकि सादा जीवन उसका व्यक्तित्व स्वयं ही आकर्षण का केंद्र होता है ब्रह्मचर्य के पालन से चेहरे पर एक अलग चमक (ओज) होती है और बुद्धि अत्यंत प्रखर व स्मरण शक्ति मजबूत हो जाती है उनका मन सांसारिक मोह-माया के बजाय ज्ञान, ध्यान और ईश्वरीय चिंतन में अधिक लगता है उनके दिनचर्या में अनुशासन होता है और वे सुबह जल्दी उठने और योग/व्यायाम को प्राथमिकता देते हैं,संयमित ऊर्जा के कारण उनमें परोपकार और निस्वार्थ समाज सेवा की प्रबल भावना होती है भगवान राम ने प्रजा के प्रति अपने राजधर्म का पालन करने और राज्य की गरिमा बनाए रखने के लिए माता सीता का त्याग किया था।इसके पीछे की मुख्य घटनाएं और कारण निम्नलिखित हैंरूप्रजा के संदेह और लांछनरू अयोध्या लौटने के बाद, एक धोबी ने माता सीता के रावण की लंका में रहने पर सवाल उठाया और उनके चरित्र पर लांछन लगाया।राजा का धर्मरू एक राजा के रूप में भगवान राम का मानना था कि राज्य की शांति और प्रजा का विश्वास बनाए रखना सर्वाेपरि है। एक आदर्श राजा (मर्यादा पुरुषोत्तम) होने के नाते, उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख से ऊपर प्रजा के हित को रखा।माता सीता की इच्छारू कुछ पौराणिक कथाओं और रामायण के प्रसंगों में यह भी आता है कि माता सीता स्वयं नहीं चाहती थीं कि राजा राम पर कोई अंगुली उठाए, इसलिए उन्होंने राज्य और कुल की मर्यादा की रक्षा के लिए स्वेच्छा से वन जाना स्वीकार किया।ऋषि भृगु का श्रापरू कई धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह अलगाव ऋषि भृगु द्वारा भगवान विष्णु को दिए गए उस श्राप का परिणाम था, जिसके कारण उन्हें मानव रूप में अपनी पत्नी से वियोग सहना पड़ा था।श्री राम ने कभी अपनी पत्नी (सीता) पर संदेह नहीं किया, लेकिन एक जन-कल्याणकारी राजा के रूप में उन्हें यह कठोर निर्णय लेना पड़ा। सीता का त्याग (वाल्मीकि रामायण के अनुसार)रूप्रजा के प्रति कर्तव्यरू रावण की लंका से लौटने के बाद, अयोध्या की प्रजा माता सीता के चरित्र और इतने समय तक असुरों की लंका में रहने पर सवाल उठाने लगी थी।राजा की निष्पक्षतारू एक राजा (राजधर्म) के रूप में, भगवान राम के लिए यह आवश्यक था कि उनकी प्रजा उन पर पक्षपात का आरोप न लगाए। राज्य की एकता और आदर्श मर्यादा स्थापित करने के लिए उन्होंने भारी मन से गर्भवती सीता को वन में जाने का निर्णय लिया।व्यक्तिगत प्रेमरू व्यक्तिगत रूप से भगवान राम को माता सीता की पवित्रता पर कोई संदेह नहीं था, लेकिन राजा के रूप में उन्होंने अपने व्यक्तिगत सुख का बलिदान दिया।सुरक्षारू उन्हें राज्य से बाहर नहीं निकाला गया था, बल्कि महर्षि वाल्मीकि जी के आश्रम में भेजा गया था, जहाँ उन्हें एक रानी और माता के समान संपूर्ण सम्मान और सुरक्षा प्राप्त थी।माता कौशल्या पर प्रभावरूमाता कौशल्या के लिए यह वियोग असहनीय था। जब श्रीराम ने सीता जी का त्याग किया, तो वे बहुत दुखी हुईं। राम के अयोध्या लौटने और राजतिलक के बाद भी माता सीता के साथ उनका गहरा लगाव था।जब माता सीता वन में महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में गईं, तो माता कौशल्या और राम के भाई भरत सहित पूरा राजपरिवार इस निर्णय से बहुत व्यथित था। उन्हें अपने प्रिय पुत्र राम के इस कठोर और त्यागमय जीवन का बहुत दुःख था, परंतु राम-राज्य की मर्यादाओं के कारण वे सभी इस दुख को सहने के लिए विवश थे। वाल्मीकि रामायण के अरण्यकांड के अनुसार, भगवान राम, लक्ष्मण और माता सीता ने १४ वर्षों के वनवास के दौरान अत्यंत कठोर ब्रह्मचर्य का पालन किया थाघ्वे अयोध्या के महलों का सुख त्याग कर केवल कंदमूल और फल खाते थे और उन्होंने भूमि पर शयन करके एक संयमित और तपस्वी जीवन व्यतीत किया था भगवान राम एक बार एक ब्रह्मचारी सन्यासी के नियमों और निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए स्वयं उस रूप में प्रकट हुए थे वाल्मीकि रामायण (अरण्यकांड, सर्ग १९) में स्वयं माता सीता ने रावण को बताया था कि उनके पति भगवान राम और लक्ष्मण कठोर ब्रह्मचारी हैं। ब्रह्मचारी और राम का संबंध अटूट हैघ् यदि आप ब्रह्मचारी के होंठों पे राम की बात कर रहे हैं, तो इसका अर्थ है उस साधक या भक्त से है, जिसकी वाणी और हृदय में केवल भगवान राम का वास होता हैघ् ऐसे शुद्ध मन वाले भक्तों के लिए कहा जाता हैरू अर्थात, जिस व्यक्ति के मन में राम हैं (जो पवित्र और विकार-मुक्त है), वहाँ काम-वासना नहीं रह सकतीघ्आजीवन ब्रह्मचारी और राम भक्तरूइस प्रसंग में सबसे पहला और प्रमुख नाम बजरंगबली हनुमान जी का आता हैघ् उन्हें राम का सबसे बड़ा और आदर्श भक्त माना जाता हैघ्श्री हनुमानरू वे आजन्म ब्रह्मचारी थे और उनके रोम-रोम में राम बसे हुए थे उन्होंने अपना पूरा जीवन और शक्ति भगवान राम की सेवा में समर्पित कर दी। इसलिए राम के सबसे बड़े भक्त हनुमान हैं जिसे ना तो चढ़ावे की पड़ी है ना किसी धन दौलत कि क्योंकि भगवान राम से बड़ा बहुमूल्य है तो राम का ध्यान और उसकी सेवा इसलिए राम मंदिर में कौन क्या लें जा रहा है कौन चोरी कर रहा है कौन इसकी चुगली कर रहा है एसआईटी की जाँच कमिटी बैठाने से विपक्ष इसका मज़ाक उड़ायेगा क्योंकि ट्रस्ट आखिर किसने बनाया और कितना भी धन लें लें बाद में यहीं छोड़ कर जाना है जब राम हैं तो अपने भक्तो को मालामाल ही कर रहें तो क्यों परेशान हो रहें है सबसे बड़ा है धैर्य जो आपमें नहीं है जीवन में पैसा सबकुछ नहीं होता है संस्कार अच्छा होना चाहिए किसी पर गुस्सा ना हो शान्ति से काम लें क़ोई कुछ जब इस संसार से लेकरभी नहीं जा सकता है तो परेशानी किस बात की अंत में राम नाम ही सत्य होगा तो इतना चिंता किस बात कि इससे आपस में ही मतभेद बढ़ेंगे और जब जब आप आपस में लड़ेंगे तो इसका फायदा क़ोई और उठालेगा। भगवान राम ईश्वर है उसपर बिश्वास कीजिए वो कुछ भी गलत नहीं होने देगा।

Comments (0)

Leave a Comment