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विदेशी मुद्रा संकट और एफसीएनआर योजना

नई दिल्ली। भारत में विदेशी मुद्रा (फॉरेन एक्सचेंज) भंडार को लेकर वित्तीय विशेषज्ञ और राजनेताओं के बीच चर्चा तेज हो गई है। सरकार द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने और विदेशी मुद्रा के खर्च को कम करने के लिए आयात, विदेश यात्राओं और अन्य खर्चों में कटौती की सलाह दी गई है। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम होता जा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरावट तथा कच्चे तेल एवं उन आयत के लिए विदेशी मुद्रा का खर्च बढ़ गया है। इस स्थिति से निपटने के लिए सरकार ने (फॉरेन करेंसी नॉनरेसीडेंट) जमा योजना शुरू की है। सरकार द्वारा इस योजना को बढ़ावा दिया जा रहा है। इस योजना के तहत विदेशों में रहने वाले भारतीय (एनआईआर) डॉलर, यूरो, पाउंड जैसी विदेशी मुद्राओं में भारत के बैंकों में जमा कर आकर्षक ब्याज और कर-मुक्त लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

 इस योजना के आलोचकों का दावा है, इस योजना का उपयोग “राउंड ट्रिपिंग” के लिए किया जा सकता है। कुछ भारतीय नागरिक लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम (एलआरएस) के माध्यम से विदेशी मुद्रा को पहले एनआरआई को विदेश मे भेज सकते हैं। फिर वही राशि एनआरआई रिश्तेदारों के माध्यम से भारत के एफसीएनआर खातों में निवेश कराकर अधिक ब्याज और कर लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यह सारा रिटर्न उन्हें विदेशी मुद्रा में प्राप्त होगा। जिसके कारण भारत सरकार को आगे चलकर एक नई मुसीबत का सामना करना पड़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है, यदि ऐसा बड़े पैमाने पर होता है। तो भारत में आने वाली विदेशी मुद्रा का एक बड़ा हिस्सा वास्तव में भारतीय स्रोतों से देश के बाहर जाकर फिर वापस लौट सकता है। सरकार का मानना है, यह योजना विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने और आर्थिक स्थिरता बनाए रखने में सहायक होगी। भारत में अभी विदेशी मुद्रा ले जाने के लिए जो कानून है। उसमें पढ़ाई के लिए और विदेश में रह रहे अपने परिवार को विदेशी मुद्रा भेजने की छूट प्राप्त है। इस कानून का दुरुपयोग होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। इस मुद्दे पर आर्थिक और राजनीतिक बहस तेज हो गई है।


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