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72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों मे दिखी भारतीय सिनेमा की बहुभाषी और बहुरंगी तस्वीर

भारतीय सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है,बल्कि यह भारत की बहुभाषी, बहुसांस्कृतिक और बहुरंगी सामाजिक चेतना का जीवंत दस्तावेज भी है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बोली जाने वाली भाषाएँ, लोक परंपराएँ, सामाजिक संघर्ष,बदलते जीवन-मूल्य,आकांक्षाएँ और सपने जब रुपहले पर्दे पर आते हैं तो वे केवल किसी एक प्रदेश की कहानी नहीं रह जाते, बल्कि पूरे भारत की सामूहिक अनुभूति का हिस्सा बन जाते हैं। 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का आयोजन इसी व्यापक भारतीय सिनेमाई चेतना को सामने लाने वाला अवसर बना। गुजरात के एकता नगर में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु द्वारा पुरस्कार प्रदान किया जाना अपने आप में इस समारोह को एक अलग राष्ट्रीय अर्थ देता है।

राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का महत्व केवल पुरस्कार पाने वाले कलाकारों और फिल्मों तक सीमित नहीं है। यह भारतीय सिनेमा की उस रचनात्मक यात्रा का सम्मान है, जिसमें देश की अलग-अलग भाषाओं और क्षेत्रों के फिल्मकार अपने-अपने समाज की कहानियों को राष्ट्रीय मंच तक लेकर आते हैं। इस बार भी लगभग 400 फीचर फिल्मों ने 34 भाषाओं में और 161 गैर-फीचर फिल्मों ने 24 भाषाओं में पुरस्कारों के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत की। इनमें से 22 फीचर फिल्मों और 23 गैर- फीचर फिल्मों को राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किए गए। यह संख्या बताती है कि भारतीय सिनेमा का विस्तार किसी एक भाषा, प्रदेश या शैली तक सीमित नहीं है। इस समारोह का सबसे भावपूर्ण क्षण दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से अभिनेता अनंत नाग को सम्मानित किया जाना रहा। वर्ष 2024 के दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित अनंत नाग ने अपने लंबे अभिनय जीवन की स्मृतियों को साझा करते हुए उस संघर्षपूर्ण यात्रा को याद किया, जिसने उन्हें रंगमंच से भारतीय सिनेमा तक पहुँचाया।

आश्रम में बचपन बिताने से लेकर मुंबई पहुँचने और रंगमंच से जुड़ने तक का उनका सफर इस बात का प्रमाण है कि कला की दुनिया में बड़ी पहचान के पीछे वर्षों की साधना, संघर्ष और निरंतर सीखने की प्रक्रिया होती है। फिल्मों में आने से पहले लगभग 50 नाटकों में अभिनय का अनुभव उनके अभिनय जीवन की मजबूत बुनियाद बना। श्याम बेनेगल जैसे महत्वपूर्ण फिल्मकार के साथ काम करने के बाद उन्होंने कन्नड़ सिनेमा और बेंगलुरु को अपनी कर्मभूमि बनाया। पिछले वर्ष राष्ट्रपति द्वारा उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया जाना भी उनके दीर्घकालिक योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति का प्रमाण है।अनंत नाग की यात्रा भारतीय सिनेमा के उस स्वरूप को सामने लाती है,जिसमें कलाकार केवल पर्दे पर दिखाई देने वाला चेहरा नहीं होता, बल्कि वह अपने समय, समाज और संस्कृति का संवाहक भी होता है। एक कलाकार का जीवन कई पीढ़ियों को प्रभावित करता है। इसलिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु का यह आग्रह विशेष महत्व रखता है कि फिल्म जगत से जुड़े लोग स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा दें और ऐसे पदार्थों के प्रचार से बचें जो समाज और विशेषकर युवाओं के लिए हानिकारक हो सकते हैं। कलाकारों की लोकप्रियता उन्हें सामाजिक जिम्मेदारी भी प्रदान करती है। युवा पीढ़ी अपने पसंदीदा कलाकारों के व्यवहार और संदेश से प्रभावित होती है। ऐसे में सिनेमा की सामाजिक भूमिका पर्दे से बाहर भी दिखाई देती है।राष्ट्रपति ने भारतीय सिनेमा को भारत की विविध भाषाओं, परंपराओं, आकांक्षाओं और संघर्षों का प्रतिबिंब बताते हुए रचनात्मक क्षेत्र में काम करने वाले छोटे कलाकारों, सहायकों और संघर्षरत कर्मियों की गरिमा तथा सामाजिक सुरक्षा की आवश्यकता पर भी बल दिया। यह पहलू अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी फिल्म की सफलता के पीछे केवल अभिनेता, निर्देशक या निर्माता नहीं होते। पर्दे के पीछे काम करने वाले असंख्य तकनीशियन, सहायक कलाकार, लेखक, संपादक, कैमरामैन,मेकअप कलाकार और अन्य कर्मियों का योगदान भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। रचनात्मक अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए इस पूरे तंत्र को सम्मान और सुरक्षा देना आवश्यक है। महिलाओं की सभी निर्णायक मंडलियों में भागीदारी बढ़ाने का संदेश भी सिनेमा के बदलते स्वरूप और अधिक समावेशी रचनात्मक व्यवस्था की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत है।

एकता नगर में आयोजित यह समारोह अपने स्थान के कारण भी विशेष रहा। गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने दिल्ली से बाहर राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह आयोजित करने की परंपरा को महत्वपूर्ण बताते हुए इसे सरदार वल्लभभाई पटेल की राष्ट्रीय एकता की भावना से जोड़ा। एकता नगर स्वयं उस राष्ट्रीय एकता की स्मृति से जुड़ा स्थान है, जहाँ लौह पुरुष सरदार पटेल की विराट प्रतिमा देश की एकजुटता का संदेश देती है। ऐसे स्थान पर भारतीय सिनेमा का राष्ट्रीय सम्मान समारोह आयोजित होना इस तथ्य को रेखांकित करता है कि संस्कृति और सिनेमा भी देश को जोड़ने वाली शक्तियाँ हैं।इस मौके पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने सिनेमा को समाज का प्रतिबिंब और संस्कृति का वाहक बताते हुए कहा कि यह मानवीय भावनाओं को व्यक्त करने के साथ भारत की वैश्विक पहचान और सॉफ्ट पावर को मजबूत करने का प्रभावी माध्यम है। आज भारतीय फिल्में केवल देश के दर्शकों तक सीमित नहीं हैं। भारतीय कथानक, संगीत, अभिनय और सांस्कृतिक संवेदनाएँ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में दर्शकों तक पहुँच रही हैं। यही कारण है कि सिनेमा अब मनोरंजन उद्योग के साथ-साथ सांस्कृतिक कूटनीति और वैश्विक पहचान का महत्वपूर्ण माध्यम भी बन चुका है।इस वर्ष के पुरस्कारों में भारतीय सिनेमा की विविधता स्पष्ट रूप से दिखाई दी। सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार ममूटी को ‘ब्रमायुगम’ और कार्तिक आर्यन को ‘चंदू चौंपियन’ के लिए संयुक्त रूप से दिया गया। सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार ‘आर्टिकल 370’ के लिए यामी गौतम को मिला। संजय मिश्रा को ‘भक्षक’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता तथा सचाना नामीदास को ‘महाराजा’ और रोपाश्री वर्काडी को ‘मिथ्या’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री का सम्मान मिला। ‘आर्टिकल 370’ को सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म का पुरस्कार मिला, जबकि रणदीप हुड्डा को ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ के लिए निर्देशन की शुरुआत के लिए विशेष पहचान मिली। ‘कल्कि 2898 एडी’ को संपूर्ण मनोरंजन प्रदान करने वाली सर्वश्रेष्ठ लोकप्रिय फिल्म और ‘कैप्टन मिलर’ को राष्ट्रीय, सामाजिक तथा पर्यावरणीय मूल्यों को बढ़ावा देने वाली सर्वश्रेष्ठ फीचर फिल्म के रूप में सम्मानित किया गया। ‘अमरन’ के लिए राजकुमार पेरियासामी को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पुरस्कार मिला।राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक भाषाई विविधता है। इस बार भी यह विविधता स्पष्ट रूप से दिखाई दी। गढ़वाली भाषा की फिल्म ‘ढोली’ को सम्मान मिला, तुलु फिल्म ‘इम्बू’ को राष्ट्रीय पहचान मिली और संथाली फिल्म ‘आंगेन’, जिसके निर्देशक रवि राज मुर्मू हैं, को सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक की श्रेणी में सम्मानित किया गया। यह भारतीय सिनेमा के उस विस्तार को रेखांकित करता है जहाँ आठवीं अनुसूची से बाहर की भाषाएँ भी राष्ट्रीय मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। भारत की वास्तविक सांस्कृतिक शक्ति उसकी भाषाई विविधता में ही निहित है और सिनेमा इस विविधता को देश तथा दुनिया के सामने पहुँचाने का सबसे प्रभावी माध्यम बन सकता है।सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव ने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह को देश के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों तक ले जाने की पहल पर जोर दिया। इसका उद्देश्य केवल पुरस्कार समारोह का स्थान बदलना नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत और पर्यटन स्थलों को रचनात्मक उद्योग से जोड़ना भी है।यदि आने वाले वर्षों में ऐसे समारोह देश के अलग-अलग राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में आयोजित होते हैं तो स्थानीय संस्कृति, इतिहास,कला और पर्यटन को राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिल सकती है।इसी व्यापक दृष्टि में भारतीय फिल्म और टेलीविजन संस्थान तथा रचनात्मक शिक्षा से जुड़े नए प्रयास भी महत्वपूर्ण हैं। भारतीय सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अंतर्गत भारतीय जनसंचार संस्थान से जुड़े प्रशिक्षण और फिल्म शिक्षा के विस्तार के साथ इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव टेक्नोलॉजी में लगभग 380 विद्यार्थी 13 उद्योग आधारित पाठ्यक्रमों में अध्ययन कर रहे हैं। देशभर में 15 हजार क्रिएटिव लैब स्थापित करने की पहल युवा प्रतिभाओं को तकनीक, रचनात्मकता और नए मीडिया से जोड़ने की दिशा में बड़ा कदम है। छोटे शहरों और कस्बों में छिपी प्रतिभाओं को पहचानने, उन्हें प्रशिक्षित करने और राष्ट्रीय मंच देने की आवश्यकता भी इसी संदर्भ में सामने आती है।

आज भारतीय सिनेमा एक ऐसे दौर में प्रवेश कर रहा है जहाँ परंपरा और तकनीक का मेल दिखाई देता है। एक ओर अनंत नाग जैसे वरिष्ठ कलाकारों की दशकों लंबी साधना भारतीय अभिनय परंपरा की विरासत को आगे बढ़ाती है, वहीं दूसरी ओर छोटे शहरों, क्षेत्रीय भाषाओं और नई पीढ़ी के फिल्मकार नई कथाओं और नए प्रयोगों के साथ सामने आ रहे हैं। यही निरंतरता भारतीय सिनेमा को जीवंत बनाए रखती है।एकता नगर में 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों का आयोजन इसलिए भी स्मरणीय रहेगा कि यहाँ पुरस्कारों की चमक के साथ भारतीय सिनेमा की व्यापक जिम्मेदारी का संदेश भी सामने आया। सिनेमा को स्वस्थ समाज, पर्यावरण चेतना, प्रेम, भाईचारे, राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण से जोड़ने की अपेक्षा केवल कलाकारों के लिए संदेश नहीं है, बल्कि यह पूरे रचनात्मक समाज के लिए दिशा का संकेत है। भारत की विविधता को समझने, उसकी अनेक भाषाओं को सम्मान देने और उसकी बदलती आकांक्षाओं को अभिव्यक्ति देने में सिनेमा की भूमिका आने वाले समय में और बढ़ेगी। रुपहले पर्दे पर दिखाई देने वाली कहानियाँ जब भारत के गाँव, कस्बे, शहर, जनजातीय समाज, युवा पीढ़ी, महिलाएँ और संघर्षरत सामान्य नागरिक की आवाज बनती हैं,तब सिनेमा वास्तव में समाज का आईना बन जाता है। राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार उसी आईने में दिखाई देने वाली भारत की विविध, जीवंत और निरंतर बदलती तस्वीर को सम्मान देने का राष्ट्रीय अवसर है।


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