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समाज परिवर्तन के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो मंचों की चकाचौंध, प्रचार के कोलाहल और सम्मान की आकांक्षाओं से दूर रहकर भी अपने कार्यों से युग की दिशा बदल देते हैं। वे न तो प्रसिद्धि के भूखे होते हैं, न राजनीतिक शक्ति के प्रदर्शन के इच्छुक। उनका जीवन ही उनका संदेश बन जाता है और उनका मौन कर्म ही उनकी पहचान। ऐसे ही व्यक्तित्व हैं गणि राजेन्द्र विजयजी, जिन्होंने आदिवासी समाज के उत्थान, अहिंसक चेतना के प्रसार और संस्कार आधारित सामाजिक पुनर्निर्माण के माध्यम से एक ऐसी परिवर्तन-धारा प्रवाहित की है, जो आज अनेक क्षेत्रों में आशा की नई किरण बनकर उभर रही है। आज जब समाज का बड़ा हिस्सा प्रदर्शन, प्रचार और शक्ति-प्रदर्शन की मानसिकता से प्रभावित है, तब गणि राजेन्द्र विजयजी का कार्य हमें यह विश्वास दिलाता है कि बिना शोर किए भी इतिहास रचा जा सकता है। उन्होंने अपने जीवन को आदिवासी समाज के पुनर्जागरण के लिए समर्पित कर दिया। यह समर्पण केवल भाषणों या घोषणाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि धरातल पर उसके ठोस परिणाम दिखाई देते हैं। गुजरात, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ और राजस्थान के अनेक आदिवासी क्षेत्रों-कंवाट, बलद, रंगपुर, बोडेली और अन्य अंचलों में सामाजिक परिवर्तन की जो नई तस्वीर दिखाई देती है, वह इसी तप, त्याग और दूरदर्शिता का परिणाम है।
आदिवासी समाज को अक्सर विकास की मुख्यधारा से दूर माना गया है। इतिहास गवाह है कि इस समाज को लंबे समय तक उपेक्षा, अभाव, शोषण और विस्थापन का सामना करना पड़ा। उनके संसाधनों का उपयोग तो हुआ, पर उनके जीवन में समृद्धि नहीं पहुंची। उनके जंगल, जल और जमीन पर अधिकारों की लड़ाइयां चलती रहीं, लेकिन उनके आंसुओं को समझने वाले बहुत कम मिले। ऐसे समय में यदि कोई संत उनके बीच जाकर उन्हें आत्मविश्वास, शिक्षा, संस्कार और अहिंसा का मार्ग दिखाए, तो वह केवल सेवा नहीं बल्कि सामाजिक पुनर्जन्म का कार्य है। गणि राजेन्द्र विजयजी ने यही किया। उन्होंने आदिवासी समाज को दया का पात्र नहीं माना, बल्कि क्षमता और संभावनाओं से भरे समुदाय के रूप में देखा। उन्होंने उनमें आत्मसम्मान जगाया, जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टि विकसित की और यह विश्वास पैदा किया कि वे भी राष्ट्र निर्माण के सक्रिय भागीदार बन सकते हैं। उनके प्रयासों का एक महत्वपूर्ण आयाम है-“सुखी परिवार अभियान”। परिवार केवल रक्त संबंधों का समूह नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली पाठशाला है। यदि परिवार टूटते हैं तो समाज बिखरता है और यदि परिवार मजबूत होते हैं तो राष्ट्र मजबूत होता है। इसी सोच के साथ सुखी परिवार फाउंडेशन द्वारा वर्ष 2006 से संचालित यह अभियान समाज में संस्कार, संवाद और समरसता का वातावरण निर्मित कर रहा है।
मुझे इस अभियान से प्रारंभ से जुड़ने और संस्थापक महामंत्री से लेकर वर्तमान में अध्यक्ष के रूप में कार्य करने का अवसर मिला, यह मेरा सौभाग्य है। इस यात्रा में मैंने निकट से देखा है कि गणिजी परिवार को समाज परिवर्तन की मूल इकाई मानते हैं। उनका स्पष्ट विचार है कि यदि माता-पिता संस्कारवान होंगे, तो बच्चों में स्वतः चरित्र, अनुशासन और नैतिकता का विकास होगा। आज समाज के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक संकट की है। भौतिक उपलब्धियां बढ़ रही हैं, लेकिन संवेदनाएं घट रही हैं। शिक्षा का विस्तार हुआ है, पर संस्कारों का क्षरण भी तेज हुआ है। आधुनिकता की दौड़ में परिवारों का संवाद टूट रहा है और बच्चे दिशाहीनता की ओर बढ़ रहे हैं। यदि बाल पीढ़ी संस्कारों से वंचित हो गई, तो उसका प्रभाव केवल परिवार तक सीमित नहीं रहेगा; वह पूरे समाज और राष्ट्र के चरित्र को प्रभावित करेगा। यही कारण है कि गणि राजेन्द्र विजयजी बच्चों और युवाओं के चरित्र निर्माण को सर्वाेच्च प्राथमिकता देते हैं। वे मानते हैं कि भारत का भविष्य केवल तकनीकी विकास से सुरक्षित नहीं होगा, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण से ही सशक्त बनेगा।
आज भारत को केवल आर्थिक क्रांति नहीं, बल्कि सांस्कृतिक क्रांति की आवश्यकता है। यह कार्य केवल सरकारी तंत्र के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। सरकारें सड़कें, भवन और योजनाएं बना सकती हैं, लेकिन संस्कारों का निर्माण समाज और परिवार ही कर सकते हैं। वास्तविक शिक्षा वही है जो व्यक्ति को मनुष्य बनाए, उसमें संवेदना जगाए, जिम्मेदारी का बोध कराए और उसे जीवन के प्रति नैतिक दृष्टि दे। केवल डिग्रियां समाज को महान नहीं बनातीं, चरित्र बनाता है। यदि शिक्षा के साथ संस्कार नहीं जुड़े, तो ज्ञान भी विनाश का कारण बन सकता है। आदिवासी क्षेत्रों में गणि राजेन्द्र विजयजी द्वारा किए गए प्रयास इसी दिशा में एक उज्ज्वल प्रयोग हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि यदि समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों तक प्रेम, शिक्षा और अवसर पहुंचाए जाएं, तो वे हिंसा से अहिंसा और निराशा से विकास की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
विशेष रूप से यह उल्लेखनीय है कि जिन क्षेत्रों में कभी हिंसा, संघर्ष, भय और वैमनस्य की स्थितियां बनी रहती थीं, वहां आज संवाद, सहयोग और शांति का वातावरण विकसित हुआ है। यह परिवर्तन किसी प्रशासनिक दबाव या राजनीतिक हस्तक्षेप से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक शक्ति और मानवीय विश्वास से संभव हुआ। कई अवसर ऐसे आए जब विभिन्न विरोधी समूह हिंसक संघर्ष की स्थिति में थे। वातावरण तनावपूर्ण था और जनहानि की आशंका थी। ऐसे समय में गणि राजेन्द्र विजयजी ने केवल मध्यस्थ की भूमिका नहीं निभाई, बल्कि अपने आध्यात्मिक प्रभाव, विश्वास और संवाद की शक्ति से विरोधी पक्षों को एक मंच पर लाने में सफलता प्राप्त की। यह कार्य साधारण नहीं है। जहां हथियार बोलते हों, वहां प्रेम की भाषा स्थापित करना किसी चमत्कार से कम नहीं। हिंसा से घिरे क्षेत्रों को अहिंसा की दिशा में मोड़ देना वास्तव में सामाजिक क्रांति है।
आज देश के सामने नक्सलवाद, माओवाद, आतंकवाद और अलगाववाद जैसी अनेक चुनौतियां हैं। इन समस्याओं के समाधान प्रायः राजनीतिक दृष्टिकोण से खोजे जाते हैं, लेकिन अनुभव यह बताता है कि केवल राजनीतिक उपाय पर्याप्त नहीं होते। जब तक अभाव, उपेक्षा और असमानता समाप्त नहीं होगी, तब तक समस्या की जड़ बनी रहेगी। हिंसा की भूमि अक्सर भूख, बेरोजगारी और उपेक्षा से तैयार होती है। जब व्यक्ति की मूल आवश्यकताएं अधूरी रहती हैं, तब उसके भीतर असंतोष जन्म लेता है। ऐसे में केवल सिद्धांत या भाषण समाधान नहीं बन सकते। जब किसी को रोटी चाहिए, तब उसे दर्शन नहीं, पहले भोजन चाहिए। जब जीवन में सम्मान और अवसर नहीं हों, तब आदर्शों की बातें खोखली लगने लगती हैं। इसलिए सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत मनुष्य की मूल आवश्यकताओं और उसकी गरिमा से होनी चाहिए। गणि राजेन्द्र विजयजी ने इस सत्य को समझा। उन्होंने आदिवासी समाज को केवल उपदेश नहीं दिए, बल्कि उन्हें जीवन जीने का आधार दिया-प्यार, करुणा, आत्मविश्वास और सहारा।
वास्तव में आदिवासी समाज के भीतर अपार संभावनाएं हैं। उनके जीवन में प्रकृति से जुड़ाव है, श्रम की संस्कृति है, सामूहिकता की भावना है और जीवन के प्रति सहज दृष्टि है। लेकिन बाहरी शक्तियों ने कई बार उनके उजालों को छीनने का प्रयास किया। आज भी उनके सामने बाहरी चुनौतियों से अधिक भीतरी संकट हैं-हिंसा, अलगाव, नशा, अशिक्षा और सामाजिक विघटन। इन चुनौतियों का समाधान केवल कानून या राजनीति नहीं कर सकती। इसके लिए समाज के भीतर प्रकाश जगाने की आवश्यकता है। गणि राजेन्द्र विजयजी का कार्य उसी प्रकाश का अवतरण है। उन्होंने आदिवासी उत्थान को अपने जीवन का संकल्प ही नहीं, अपनी साधना बना लिया है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि यदि सेवा में समर्पण हो, दृष्टि में करुणा हो और लक्ष्य में मानवता हो, तो परिवर्तन अवश्य संभव है।
आज आवश्यकता है कि ऐसे प्रयोगों को व्यापक बनाया जाए। देश के अन्य हिंसाग्रस्त और उपेक्षित क्षेत्रों में भी इस मॉडल को अपनाया जाए, जहां विकास केवल योजनाओं से नहीं, बल्कि मनुष्यता के स्पर्श से हो। वास्तविक राष्ट्र निर्माण संसदों में कम और समाज की आत्मा में अधिक होता है। जब परिवार संस्कारित होंगे, समाज अहिंसक होगा और उपेक्षित वर्ग सम्मान के साथ खड़े होंगे, तभी भारत अपने वास्तविक स्वरूप में विकसित और शक्तिशाली बन सकेगा। सचमुच, आदिवासी अंचल में एक नई रोशनी उतर रही हैकृयह रोशनी केवल गांवों को नहीं, बल्कि पूरे समाज की दिशा को आलोकित करने की क्षमता रखती है।प्रेषकः
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