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असहमति से असहमत होती सामाजिक व्यवस्था

किसी लोकतान्त्रिक समाज में असहमति का अधिकार समाज की प्रगतिशीलता का द्योतक होता है। किसी प्रचलित विचार, नीति या सामाजिक मान्यताओं के समर्थन में जितने लोग खड़े होते हैं उसकी बजाय विरोध में बेहद कम होते हैं। ये बेहद कम लोग ही सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तन के उत्प्रेरक बनते हैं। किसी सत्ता को निरंकुश होने से बचाने हेतु असहमति एक जरूरी तत्त्व है। उच्चतम न्यायालय ने इसीलिए असहमति को लोकतंत्र में सुरक्षा वाल्व बताया है। असहमति की आवाज को सुने बिना समाज स्थिर और जड़ हो जाता है।

किसी भी लोकतान्त्रिक समाज में असहमति और आलोचना जरूरी है। इन दोनों का समाज से गहरा और गतिशील संबंध होता है। असहमति विरोध करना भर नहीं होकर स्थापित मान्यताओं, विचारधाराओं और व्यवस्था के बारे में प्रश्न करना होता है। आलोचना केवल कमियाँ निकालना भर नहीं होकर मूल्यान्वेषण की प्रक्रिया है। किसी समाज, उसकी तात्कालिक परिस्थितियों और जीवन मूल्यों के मध्य संबंधों को आलोचना ही परिभाषित करती है। इस तरह वह समाज को सचेत करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।असहमति समाज को एक स्वयंभू सत्ता नहीं मानकर प्रत्येक व्यक्ति के प्रति जवाबदेह मानकर चलती है। इस जवाबदेही से नैतिक और सामाजिक मूल्य बनते हैं। असहमति के बिना समाज और लोकतंत्र दोनों के लिए खतरे की स्थिति बनती है।

असहमत होना मानवीय गुण है। आजकल हो रहे 

विरोध प्रदर्शनों के बीच असहमति के अधिकार पर पुनर- प्रश्न छिड़ गया है। जिस तरह प्रदर्शनकारियों को दिमागी नक्सली, अराजकतावादी और असामाजिक तत्त्व कहा जा रहा है उससे लोकतंत्र की मर्यादा सवालों के घेरे में आ गई है। किसी भी प्रगतिशील लोकतंत्र में राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को बदलने में स्वतंत्र नागरिक की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। लोकतंत्र के इतिहास में सदैव से शांतिपूर्ण प्रतिरोधों ने देशों के सामाजिक-राजनीतिक ताने-बाने में आमूल-चूल परिवर्तन लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बेंजामिन फ्रेंकलिन के अनुसार, सरकार से प्रश्न पूछना प्रत्येक नागरिक का प्रथम दायित्व है। जब इस दायित्व को पूरा करने के लिए नागरिक को दण्ड दिया जाने लगता है तब लोकतान्त्रिक प्रक्रिया स्वयं सवालों के घेरे में आ जाती है।

जब समाज में रह रहे अलग-अलग वर्ग एक-दूसरे के बारे में सोचना छोड़ देते हैं तभी लोकतंत्र में असली संकट पैदा होता है। इस संकट के बीज मनुष्य के, मनुष्य से अलगाव में निहित है। इसी अलगाव को भुनाकर, सत्ता नागरिकों को परस्पर विरोधी बनाकर खड़ा करने में समर्थ होती है। मनुष्य और मनुष्य के मध्य दूरी बढ़ने से ऐसी स्थितियाँ आम होती जा रही है। मनुष्य अब दूसरे मनुष्य के लिए जीता जगता इंसान नहीं रहकर वस्तु मात्र बन गया है। यही वह सोच है जो सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे लोगों को एक अव्यवस्था की तरह दिखाती है। यह दृष्टि सहानुभूति से उनकी मांगों पर गौर करने की बजाय उन्हें महसूस कराती हैं कि उनकी आवाज का कोई मूल्य नहीं है। 

शिक्षा का प्रयोजन यदि मनुष्य में प्रश्न पैदा करना है तो ये प्रश्न केवल बाहरी व्यवस्थाओं, दर्शन और राजनीति के बारे में ही नहीं होते, स्वयं मनुष्य के बारे में भी होते है। मैं कौन हूँ, इसी प्रश्न से सभी प्रश्न शुरू होते हैं, दूसरों और सभ्यता के बारे में सभी सवाल दरअसल मनुष्य की वास्तविक स्थिति की पहचान से जुड़े होते हैं। मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है जो अपना आत्म-अन्वेषण कर सकता है। मनुष्य अपनी आलोचना से सीख सकता है और स्वयं में सुधार कर सकता है। जहाँ एक लोकतान्त्रिक राष्ट्र के रूप में सहिष्णुता का विकास आवश्यक है वहीं एक शिक्षित समाज का मूल्यांकन उसकी असहमति और प्रतिरोध को पचाने की क्षमता से होना चाहिए।

साहित्यिक विधा के रूप में आलोचना के लुप्त होते जाने के बारे में काफी चर्चाएं होती हैं। साहित्य अपनी संस्कृति और समाज से ही संस्कार ग्रहण करता है। क्या एक व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के रूप में हमारे भीतर रचनात्मक आलोचना के लिए जगह निरंतर कम नहीं होती गई है ? आभासी समाज ने औपचारिक तारीफ के लिए जैसा माहौल बनाया है क्या उसी अनुपात में हम असहमति और आत्म-लोचन के प्रति असहिष्णु नहीं होते गए हैं? व्यक्तिगत और सामाजिक विकास के लिए आत्म-मूल्यांकन सबसे बुनियादी आवश्यकता रहा है। असहमति इस मूल्यांकन के लिए आधार का काम करती रही हैं। आलोचना की सार्थकता समाज को निरंतर प्रश्नों के लिए तैयार रहने में है। वहीं असहमति इन प्रश्नों के लिए आधारभूमि बनती है। जब कोई समाज अपनी व्यवस्था को अंतिम मान लेता है तो वह मानवीय सत्ता पर स्वयंभू सत्ता बनने की कोशिश करता है। रचनात्मक आलोचना हमें बताती है कि कोई सत्य अंतिम नहीं होता और कोई व्यवस्था मनुष्य से बड़ी नहीं हो सकती है। आलोचना इस बुनियादी चीज को केन्द्र बनाकर चलती है कि मानव प्राथमिक है और मानव में निरंतर सुधार किया जा सकता है, मानव की क्षमताओं को बढ़ाया जा सकता है। जब हम दूसरे विचार को सुनना बंद कर देते हैं तो स्वयं भी उस विचारधारा के कैदी होकर रह जाते हैं, जिसके लिए बाक़ी सब कुछ को दांव पर लगाया होता है। आलोचना हमारी दृष्टि को ही विस्तृत नहीं करती, वह हर आवाज को सुने जाने लायक बनाकर मानवीय गरिमा की भी रक्षा करती है। शत्रुता और वैचारिक टकराव के अंतर की समझ हममें होनी चाहिए। मजबूत व्यक्ति और समाज असहमतियों से टकराकर और आलोचनाओं से तपकर ही निकलते हैं।

किसी समाज के बौद्धिक, मानसिक और भौतिक विकास के लिए उसकी सामूहिक चेतना में असहमति की स्वीकार्यता जरूरी है। असहमति से ही आलोचना पैदा होती है जो समाज को जड़ होने से बचाती है, इतिहास गवाह है कि समाज के सभी सुधार उसकी खामियों पर की गई टिप्पणियों से ही शुरू हुए हैं। स्वस्थ आलोचना राजनीति और प्रशासन को ही नहीं किसी समाज की शक्तियों के दुरूपयोग को भी सीमित करती है। कला ने सदैव मनुष्य को केन्द्र में रखते हुए व्यवस्थाओं के अमानवीयकरण को निशाना बनाया है इसलिए वह हर युग में सामाजिक आलोचना के लिए बड़ा हथियार रही है। जब हम अपनी दृष्टि में दूसरे की दृष्टि भी मिलाते हैं तो सदैव कुछ अधिक देखने-समझने में समर्थ होते हैं। लेकिन क्या हम इन मायनों में एक लोकतान्त्रिक समाज बन पाए हैं? बोलने की आजादी को हम केवल अपने बोलने तक सीमित करते हैं, दूसरे के बोलने को उसमें सम्मिलित नहीं करना चाहते। मनुष्य निरपेक्ष प्राणी नहीं है, कोई भी स्वतन्त्रता दूसरे को स्वतंत्र किए बिना स्वयं बंदिश बन जाती है। स्वतन्त्रता के अर्थ में दूसरे की स्वतन्त्रता अनिवार्यत निहित है, उसके बिना स्वतन्त्रता का हर दावा झूठा होता है।

लोकतंत्र सिर्फ शासन चलाने की बहुमत आधारित प्रणाली भर नहीं है, यह व्यक्ति के सम्मान, स्वतन्त्रता और गरिमा की अवधारणा पर आधारित है। संविधान में मूल अधिकारों का प्रावधान इसीलिए किया गया कि कोई भी व्यवस्था बहुमत के नाम पर किसी व्यक्ति की बुनियादी स्वतन्त्रता का अपहरण न कर सके।लोकतंत्र का अर्थ सत्ता में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी से बनता है। ये भागीदारी केवल सहमति से नहीं बनती इसमें असहमति भी शामिल होती है। पिछले सालों में देखा जा रहा है कि असहमति को लगातार शत्रुता की तरह परिभाषित किया जाने लगा है। किसी के कुछ भी कहने को व्यक्तिगत प्रश्न बनाकर छोड़ दिया जाता है। व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक हर समस्या आखिर संबंधों की समस्या ही होती है। संबंध व्यक्ति से हो, परिवार से या राजनीति और कानून से। जब किसी समाज में असहमति की जगह नहीं रहती तो सहमति एक मूल्य या जीवन-दर्शन नहीं रहकर विवशता बनकर रह जाती है। 

दरअसल कोई भी प्रश्न व्यक्तिगत नहीं होता, वह किसी व्यक्ति के माध्यम से आकार लेता है इसलिए शुरुआत में वह व्यक्तिगत लगता है। लेकिन हर व्यक्तिगत प्रश्न अंततः सामाजिक-सांस्कृतिक प्रश्न ही होता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है इसलिए मनुष्य के बारे में हर सवाल में समाज की अदृश्य भूमिका होती है। जब कोई समाज अपनी भूमिका को मूल्यांकित करने की बजाय व्यक्तिगत असहमति को अपने स्वाभिमान का प्रश्न बनाने लगता है तब वह अपनी जवाबदेही से बचने की कोशिश करता है। समाज यदि एक ही प्रकार के मूल्यों को मानने वाले लोगों से बना समुदाय है तो समाज के लिए जरूरी है कि व्यक्ति की समस्याओं और संकटों का अपने स्तर पर समाधान करने की कोशिश करे। यह तभी सम्भव होगा जब समाज में असहमति और आलोचना के लिए जगह बनेगी। सच्चे अर्थों में समाज संवाद से ही बनता है। सार्वजनिक संवाद की संभावना के सिकुड़ने पर धीरे-धीरे संस्कृति और परम्परा जीवंत रहने की बजाय रीति-रिवाज का रूप ले लेते हैं। किसी समाज में असहमति और आलोचना की गुंजाइश खत्म होने पर वह समाज बौद्धिक रूप से जर्जर होने लगता है। असहमति और आलोचना का जीवंत रहना समाज के स्वास्थ्य और उसकी संस्कृति की जीवंतता की बुनियादी शर्त है।


 


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