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नवजातों को मोबाइल की लत बहुत गलत?

नवजात को मोबाइल मत दीजिये, यह बहुत घातक है। मोबाइल की लत बहुत गलत है। आज का सबसे बड़ा तमाशा देखिए। बच्चा पैदा होते ही रोया भी नहीं कि उसकी फोटो खिंच गई। एक सेकंड में व्हाट्सएप पर, फेसबुक पर, इंस्टाग्राम पर। अस्पताल के बेड से ही स्टेटस लग गया - हमारे घर लक्ष्मी आई, हमारे घर गणेश आया। हमने सोचा हमने प्यार बांटा, पर हमने जन्म लेते ही नवजात को मोबाइल की घातक किरणों के सामने खड़ा कर दिया। जिस बच्चे को मां की गोद की गर्मी और मां का आंचल चाहिए था, उसे सबसे पहले कैमरे का फ्लैश और स्क्रीन की नीली रोशनी दे दी। और यहीं से लत की शुरुआत हो जाती है। हम खुद ही उसके जीवन की पहली लत के सौदागर बन जाते हैं।आज हर घर में यही है। 6 महीने का बच्चा गोद में है, हाथ में मोबाइल है। बच्चा रोया, मोबाइल। खाना नहीं खाया, मोबाइल। मां को रसोई का काम करना है, मोबाइल। पिता थक गए हैं, मोबाइल। हम समझते हैं बच्चा संभल गया, पर सच यह है कि हमने कच्ची मिट्टी जैसे बच्चे को घातक किरणों के हवाले कर दिया है। यह संभलना नहीं है, यह जड़ होना है।

मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली घातक किरणें सीधे उसकी नाजुक आंखों पर वार करती हैं। उसकी आंखें अभी बन रही हैं, परदे बहुत कोमल हैं। यह तेज नीली रोशनी उसकी आंखों के परदे को जला रही है। आंखों की मांसपेशियां कमजोर हो रही हैं। तभी तो आज 2-2 साल के बच्चों को मोटा चश्मा लग रहा है। डॉक्टर के क्लिनिक में बच्चों की लाइन लगी है। पहले बच्चे मोतियाबिंद बुढ़ापे में सुनते थे, आज बच्चे बचपन में ही आंखों की बीमारी के शिकार हो रहे हैं। यही किरणें उसकी नींद छीन लेती हैं। मोबाइल की रोशनी दिमाग को दिन-रात का फर्क भूलवा देती है। मेलाटोनिन हार्माेन बनना बंद हो जाता है। बच्चा रात भर जागता है, दिन भर चिड़चिड़ा रहता है, रोता रहता है और मां-बाप समझ ही नहीं पाते कि बच्चा क्यों रो रहा है।

सबसे बड़ा घात उसके दिमाग और बोलने पर हो रहा है। जिस उम्र में उसे मां की लोरी, पिता की आवाज, दादी की कहानी, नानी की थाप सुननी चाहिए, उस उम्र में वह मोबाइल के तेज रंग और तेज शोर में कैद है। वह देखता नहीं, सम्मोहित होता है। कार्टून तेजी से भागते हैं, आवाजें चीखती हैं, उसका छोटा दिमाग उस रफ्तार को पकड़ नहीं पाता। इसीलिए वह चुप हो जाता है और हम मूर्खों की तरह खुश होते हैं कि देखो, हमारा बच्चा कितना समझदार है, बिना रोये मोबाइल देख रहा है। पर यह समझदारी नहीं, जड़ता है। यह शांत होना नहीं, सन्न होना है। इसका सीधा नतीजा है कि बच्चे देर से बोल रहे हैं। 3 साल का बच्चा है पर मां नहीं बोल पाता। लोगों से घुल-मिल नहीं रहे, आंख से आंख नहीं मिलाते, अकेले बैठे रहते हैं, छोटी बात पर जमीन पर लोट-लोट कर भड़क जाते हैं। बड़े-बड़े बाल रोग विशेषज्ञ और मनोचिकित्सक साफ कह रहे हैं, छोटे बच्चों में ऑटिज्म, एडीएचडी और बोलने में देरी का एक बड़ा कारण यह मोबाइल ही है। हम अपने हाथों से अपने बच्चे को बीमार बना रहे हैं।

पहले बच्चा रोता था तो घर के दस हाथ उसे संभालने आते थे। दादी लोरी गाती थी, नानी कहानी सुनाती थी, बुआ गोद में लेती थी, पिता कंधे पर घुमाता था। चाचा उंगली पकड़ कर चलाता था। उससे रिश्ते बनते थे, संस्कार बनते थे, बच्चा सामाजिक बनता था। आज रोते ही एक ही हाथ आता है, मोबाइल वाला। न लोरी रही, न कहानी, न दादी का प्यार, न नानी का दुलार। बच्चा परिवार से नहीं, स्क्रीन से जुड़ गया। वह मां को नहीं पहचानता, मोबाइल को पहचानता है। यह कितनी बड़ी त्रासदी है।

और उसका खेलना-कूदना, भागना-दौड़ना तो खत्म ही हो गया। जो बच्चा मिट्टी में खेलता था, मिट्टी से ही उसका शरीर मजबूत होता था, इम्यूनिटी बनती थी। जो भागता था, गिरता था, उठता था, उससे उसकी हड्डियां मजबूत होती थीं। वही बच्चा अब एक कोने में बैठा, गर्दन झुकाए, आंखें गड़ाए मोबाइल घिस रहा है। न धूप लग रही है, न हवा। शरीर कमजोर, हड्डियां कमजोर, आंखें कमजोर और बचपन सबसे ज्यादा कमजोर। बचपन तो रहा ही नहीं।  हम कहते हैं, मिट्टी मत खा, बीमार हो जाएगा। धूल में मत जा, बीमार हो जाएगा। बाहर का मत खा, बीमार हो जाएगा। हम इतने सजग हैं। पर बच्चा रोज घंटों तक स्क्रीन का मानसिक जहर खा रहा है, उसका दिमाग सड़ रहा है, उससे नहीं डरते। यह कौन सी सजगता है?

सोशल मीडिया पर फोटो डालने की होड़ ने तो हद ही कर दी है। बच्चे का हर रोना, हर हंसना, हर नहाना, हर खाना हमने दुनिया को दिखा दिया। हमने कभी सोचा कि उस फोटो के साथ कितनी घातक किरणें, कितनी बुरी नजरें, कितना डेटा उस बच्चे से चिपक रहा है? वह बच्चा अभी इस दुनिया को समझा भी नहीं और हमने उसे पूरी दुनिया के सामने परोस दिया। उसकी सुरक्षा, उसकी मासूमियत, सब खतरे में डाल दी। एक घंटे का सुकून पाने के लिए आप उसके जीवन भर की एकाग्रता, उसकी आंखें, उसकी जुबान और उसका बचपन दांव पर लगा रहे हैं। वह एक घंटा आपको आराम देगा, पर वह बच्चा जीवन भर आपको परेशान करेगा, क्योंकि आपने उसकी नींव ही कमजोर कर दी।

अभी संभलने का समय है, कहीं देर न हो जाये। ताउम्र पछताओगे, सिर पटकोगे जब बच्चे अपंग होंगे, आंखों की बीमारी होगी, दिमाग कमजोर होगा और बोलने में पिछड़ जाएंगे। इसलिए हाथ जोड़कर कह रहा हूं - जन्म लेते ही उसकी फोटो सोशल मीडिया पर डालना बंद कीजिए। उसकी नजर उतारने से पहले ही दुनिया की नजर में लाना बंद कीजिए। कम से कम पहले 5 साल तक तो उसे मोबाइल से दूर रखिए। उसे कहानी सुनाइए, लोरी सुनाइए, मिट्टी में खेलने दीजिए, पेड़ दिखाइए, चिड़िया दिखाइए। रोये तो गोद में लीजिए, मोबाइल मत दीजिए। और नवजात के हाथ में तो बिल्कुल मोबाइल मत दीजिए। यह खिलौना नहीं, बहुत घातक लत है।


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