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श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट की लिखित तहरीर पर मंदिर के चढ़ावे में कथित अनियमितताओं के संबंध में प्राथमिकी दर्ज हुई, आठ छुटभैया ‘‘छोटी मछलियों की गिरफ्तारी हुई, एसआईटी का गठन हुआ और बाद में ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय तथा ट्रस्टी डॉ. अनिल मिश्रा ने नैतिक आधार पर अपने इस्तीफे सौंप दिए। यह घटनाक्रम देर से ही सही, लेकिन आगे बढ़ा है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या यह कार्रवाई पर्याप्त है अथवा अभी भी जांच की दिशा और दायरा अधूरा है?
विशिष्ट जांच व कार्रवाईयो पर अनेक प्रश्न?
स्थानीय कोतवाली में पहले से कई लिखित शिकायतें (तहरीर) उपलब्ध थीं। फिर प्राथमिकी दर्ज करने में विलंब क्यों हुआ? यदि एसआईटी केवल वही तथ्य संकलित कर रही थी, जिनके आधार पर बाद में मात्र गिनती में हुई गड़बड़ियों के लिए एफआईआर दर्ज हुई, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या यह प्रक्रिया आवश्यक थी अथवा इससे कार्रवाई टलती रही? देर आए दुरुस्त आए या फिर दाल में कुछ काला हैकृयह निर्णय अंततः जांच के निष्कर्ष ही करेंगे।
एसआईटी का कार्यकाल बढ़ा दिया गया, किंतु उसकी अंतरिम रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई। पारदर्शिता की दृष्टि से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जनता को कम-से-कम इतना अवश्य बताया जाए कि जांच की दिशा क्या है और किन बिंदुओं पर आगे कार्रवाई प्रस्तावित है। दूसरी ओर, कथित भूमि लेन-देन संबंधी आरोपों पर अब तक न तो कोई अलग प्राथमिकी दर्ज हुई है और न ही उस संबंध में एसआईटी ने जांच की ?
अन्य मामलों से तुलना
कानून की निष्पक्षता का आकलन प्रायः तुलनात्मक दृष्टि से किया जाता है
लखनऊ के भीषण अग्निकांड में घटना के तुरंत बाद प्राथमिकी दर्ज कर ली गई और उसके बाद विस्तृत जांच के लिए एसआईटी गठित की गई। केजरीवाल मामले में भी एक अभियुक्त के बयान के आधार पर बिना किसी प्राथमिकी जांच के एफआईआर दर्ज हो जाती है। अंततः न्यायालय अपराध का कोई प्रथम दृष्ट्या सबूत न मिलने पर केजरीवाल को आरोपों से मुक्त (डिस्चार्ज) कर देता है। इसी प्रकार अनेक चर्चित मामलों में प्रारंभिक उपलब्ध सामग्री के आधार पर पहले एफआईआर दर्ज हुई और बाद में जांच आगे बढ़ी। इसके विपरीत, श्रीराम मंदिर प्रकरण में कथित अनियमितताओं की चर्चा, शिकायतें, जांच और कथित बरामदगी जैसी बातें सामने आने के बावजूद प्राथमिकी दर्ज होने में समय लगा। ट्रस्ट व मंदिर से जुड़े व्यक्तियों की ‘‘असामान्य संम्पति होने के मामले में भी गबन के पैसे का दुरूपयोग कुछ हुआ हैं, के लिए ईडी, आयकर विभाग की जांच तक अभी प्रारंभ नहीं हुई है। यदि यही तथ्य हैं, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इस मामले में प्रक्रिया अलग क्यों रही? कानून की विश्वसनीयता तभी बनती है, जब न्याय केवल निष्पक्ष हो ही नहीं, बल्कि निष्पक्ष दिखाई भी दे।
आरोप नए नहीं हैं
राम मंदिर निर्माण से जुड़े आर्थिक प्रश्न पहली बार नहीं उठे हैं। 2015-2017 में निर्माेही अखाड़ा और अखिल भारतीय हिंदू महासभा ने विश्व हिंदू परिषद पर राम मंदिर निर्माण के नाम पर जमा 1400 करोड़ रुपये की हेराफेरी के आरोप लगाये थे। वर्तमान में चर्चा तब प्रांरभ हुई, जब पूर्व मंत्री पवन पांडे की शिकायत से अखिलेश ने इस मुद्दे को लपका। क्या भारत ‘‘घोटालों का देश बन गया है? जीप घोटाला (1948) से लेकर बोफोर्स (1987) से होता हुआ वर्तमान ‘‘चढ़ावा घोटाला? वर्तमान विवाद तब अधिक चर्चा में आया जब इस विषय को राजनीतिक स्तर पर अखिलेश यादव ने पूर्व मंत्री पवन पांडेय द्वारा एक दिन पूर्व की गई शिकायत के आधार पर उठाया इसके बाद ही प्रशासनिक कार्रवाई प्रारंभ हुई। ऐसे में प्रश्न केवल एक मंदिर या एक ट्रस्ट का नहीं है, बल्कि उन करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास का है, जिन्होंने अपनी श्रद्धा, भक्ति, आस्था से दान दिया है।
निष्पक्ष जांच के लिए नैतिक उत्तरदायित्व
श्रीराम मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र है। इसलिए यहां पारदर्शिता का मानक सामान्य संस्थाओं से भी अधिक होना चाहिए। जांच की समस्त गडबडियो तार्किक और निर्विवाद निष्कर्ष तक पहुँचने के लिए यह आवश्यक है कि इसकी निगरानी किसी स्वतंत्र न्यायिक व्यवस्था अथवा सक्षम न्यायिक पर्यवेक्षण में हो। इससे जांच की विश्वसनीयता और जन विश्वास दोनों सुदृढ़ होंगे।
ट्रस्ट के महामंत्री चंपत राय द्वारा बरती गई ‘‘सावधानी और सुरक्षा काबिले तारीफ है? विश्व सिंधी सेवा समागम के अंतर्राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. राजू मनवानी का कथन कि चंपत राय ने उनके द्वारा दी गई 200 चांदी की ईंटें की रसीद तुरंत न देकर चांदी की शुद्धता की जांच के बाद देने का कथन किया, जो आज तक बार-बार मांगने के बावजूद नहीं मिली। अनीता भारद्वाज ने भी चांदी का ‘‘कागभुशुण्डि की मूर्ति देने व रसीद न मिलने का सार्वजनिक बयान दिया है। आपके-हमारे द्वारा मंदिर में चढ़ावा देते समय न तो (नकली) नोटों की जांच होती है, न दिये गये सामग्री की जांच होती है। न ही मंदिर प्रशासक दान की वस्तु को वापिस करता है। अंबानी और बडे-बडे अभिनेता मंदिर में सोने-चांदी के दान देते हैं। क्या उनकी भी इस तरह की जांच की गई थी? उत्तर गर्भ में है? लेकिन जब एक व्यक्ति चंपत राय इतनी सतर्कता बरत रहे हैं, तब जांच में पारदर्शिता लाने के लिए क्या यह आवश्यक है कि समस्त आरोपियों को उनके पदों से हटा दिया जाए? यदि वे इस्तीफा नहीं देते है तो। ट्रस्ट के कोषाध्यक्ष पर कोई आरोप सीधे नहीं लगता है लेकिन कोषाध्यक्ष होने के नाते समस्त वैधानिक व नैतिक प्राथमिक जिम्मेदारी उन्हीं की होती है। सीज़र की पत्नी संदेह से भी परे होनी चाहिएकृयह सिद्धांत सार्वजनिक जीवन में आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आस्था की संस्थाओं के लिए तो यह और भी अधिक आवश्यक हो जाता है।
आस्था सर्वाेपरि, पारदर्शिता अनिवार्य
भगवान श्रीराम करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक हैं। इसलिए इस प्रकरण का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि श्रद्धालुओं का विश्वास किसी भी स्थिति में कमजोर भंग नहीं होना चाहिए।
कहा भी गया है
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
लेकिन मनुष्य का कर्तव्य भी उतना ही स्पष्ट है कि वह सत्य, ईमानदारी और पारदर्शिता का पालन करे।
इसी संदर्भ में कुछ प्रसिद्ध लोकोक्तियां स्वतः स्मरण हो आती हैं
मुख में राम, बगल में छुरी।
राम-राम जपना, पराया माल अपना।
राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट।
इनमें से कौन-सी उक्ति इस पूरे घटनाक्रम पर लागू होती है और कौन-सी नहीं, इसका निर्णय मैं पाठकों के विवेक पर छोड़ता हूँ।
निष्कर्ष
आस्था का संरक्षण केवल मंदिर निर्माण से नहीं, बल्कि उसके प्रबंधन की निष्कलंक पारदर्शिता से भी होता है। दूध का दूध और पानी का पानी होना ही इस मामले की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यदि ऐसा होता है, तभी भगवान श्री राम के नाम पर दिए गए प्रत्येक अंशदान का सम्मान भी सुरक्षित रहेगा और जनता का विश्वास भी अक्षुण्ण बना रहेगा।
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