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क्या देश सविनय अवज्ञा जैसे आंदोलन की ओर बढ़ रहा है?
विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर देश की राजनीति गर्माती जा रही है। विपक्षी दलों ने एसआईआर प्रक्रिया को लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताते हुए, इसके खिलाफ साझा मोर्चा बना लिया है। विपक्ष का कहना है कि यदि सर्वाेच्च न्यायालय से शीघ्र राहत नहीं मिलती है, तो ऐसी स्थिति में महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन की तर्ज पर देशव्यापी जन आंदोलन शुरू किया जा सकता है। इसी उद्देश्य से विपक्षी दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को संयुक्त रूप से ज्ञापन सौंपकर एसआईआर प्रक्रिया पर तत्काल हस्तक्षेप करने की मांग की है। सुप्रीम कोर्ट ने जल्द ही इस मामले में फैसला नहीं किया, तो अगस्त माह से सारे देश में जन आंदोलन शुरू करने विपक्ष लामबंद हो रहा है। विपक्ष का आरोप है कि जिन राज्यों में एसआईआर लागू किया गया है, वहां बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। विपक्षी नेताओं का दावा है कि पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में करोड़ों मतदाता प्रभावित हुए हैं। उनका कहना है, मतदाता सूची से नाम हटने के कारण नागरिकों की सरकारी सेवाओं और सुविधाओं को खत्म किया जा रहा है। नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म किये जा रहे हैं। हालांकि, चुनाव आयोग इन आरोपों से सहमत नहीं है। चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य केवल मतदाता सूची को शुद्ध और सही करना है। प्रत्येक पात्र नागरिक को अपना पक्ष रखने और आवश्यक दस्तावेज प्रस्तुत करने का अवसर चुनाव आयोग द्वारा दिया जा रहा है। वहीं विपक्ष का आरोप है, मतदाताओं के नाम काटकर भाजपा को जिताने का षड्यंत्र किया जा रहा है। विपक्ष इस विवाद को लेकर 12 मार्च 1930 से शुरू हुए महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह आंदोलन की तर्ज पर आंदोलन करने जा रहा है। उस समय ब्रिटिश सरकार ने नमक के उत्पादन और बिक्री पर एकाधिकार स्थापित कर नमक पर कर लगाया था। इसके विरोध में गांधीजी ने साबरमती आश्रम से 78 स्वयंसेवकों के साथ दांडी यात्रा प्रारंभ की, जो आगे चलकर सविनय अवज्ञा आंदोलन में बदल गई। विपक्ष का मानना है, जिस प्रकार उस समय नमक आंदोलन प्रत्येक भारतीय के जीवन से जुड़ा विषय था, उसी प्रकार आज मतदान का अधिकार लोकतंत्र की आधारशिला है। यदि मतदाताओं के नाम जबरिया सूची से हटते हैं, तो इसका प्रभाव सीधे लोकतांत्रिक व्यवस्था एवं नागरिकों की स्वतंत्रता से जुड़ता है।
इसी बीच कर्नाटक में इस मुद्दे पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। राज्य सरकार नागरिकों के दस्तावेजों और पहचान से संबंधित व्यवस्था को मजबूत करने के उपायों पर विचार कर रही है। कर्नाटक की सरकार अपने स्तर पर नागरिक पहचान या प्रमाणन से जुड़ी नई व्यवस्था लागू करने पर गंभीरता से विचार कर रही है। इससे आगे चलकर केंद्र और राज्यों के बीच संवैधानिक तथा प्रशासनिक रिश्तों को लेकर बहस और तेज हो सकती है। एसआईआर का यह विवाद केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह गया है। बल्कि यह विवाद लोकतांत्रिक अधिकारों, संघीय ढांचे और संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका पर भी व्यापक बहस का विषय बन चुका है। एक ओर विपक्ष इसे मताधिकार और मौलिक अधिकार से जोड़ रहा है, वहीं चुनाव आयोग और केंद्र सरकार इसे मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने की नियमित संवैधानिक प्रक्रिया बता रहे हैं। प. बंगाल एवं बिहार सरकार ने मतदाता सूची को आधार बताकर पासपोर्ट भी बनाना बंद कर दिया है। अब विपक्ष की निगाहें सर्वाेच्च न्यायालय पर टिकी हैं। यदि न्यायालय इस मामले में कोई महत्वपूर्ण निर्देश देता है, तो इस विवाद को टाला जा सकता है। यदि न्यायापालिका से जल्द ही न्याय नहीं मिला, तो आने वाले समय में एसआईआर को लेकर देशभर में व्यापक जन आंदोलन और राजनीतिक संघर्ष देखने को मिल सकता है। इस स्थिति में लोकतांत्रिक संस्थाओं, राजनीतिक दलों और नागरिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि मतदाता सूची की पारदर्शिता और प्रत्येक पात्र नागरिक के मतदान अधिकार की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
अभी तक जिन राज्यों में एसआईआर हुई है। वहां के 6.50 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाये गये है। बिहार एवं प. बंगाल में जिनके नाम मतदाता सूची से कट गए है, उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ बंद किया जा रहा है। टेलीग्राफ अखबार के पूर्व संपादक का पासपोर्ट मतदाता सूची में नाम नहीं होने के कारण नवीनीकृत नहीं किया गया। चुनाव अधिसूचना जारी होने के पहिले जो मामले कोर्ट में गए उनका निराकरण हुए बिना चुनाव करा लिए गए। बिहार और प. बंगाल में चुनाव आयोग की भूमिका निष्पक्ष नहीं रही, विपक्ष का आरोप है, चुनाव आयोग भाजपा को लाभ पहुंचाने का काम कर रहा है। विपक्ष की शिकायतों पर कोई कार्यवाही नहीं होती। चुनाव आयोग विपक्ष को जानकारी नहीं देता है। विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर जो दस्तावेजी सबूत दिये, चुनाव आयोग ने कोई संज्ञान नहीं लिया। ऐसी स्थिति में जब करोड़ों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाये गये हैं, न्यायपालिका से त्वरित न्याय नहीं मिलने पर चुनाव प्रभावित हो रहे हैं। हाल ही में राज्यसभा चुनाव में जिस आधार पर कांग्रेस उम्मीदवार का पर्चा खारिज किया गया। उसके बाद विपक्ष के पास आप-पार की लड़ाई लड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। दिल्ली में विपक्षी नेताओं का मानना है, वर्तमान स्थिति को देखते हुए नमक आंदोलन की तर्ज पर आम जनता को जागृत करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। जिस तरह से 1930 में नमक आंदोलन देखते ही देखते सारे देश में फैल गया था। उस आंदोलन से जो जनजागृति अंग्रेजों के खिलाफ बनी थी। उसी के काराण अंग्रेजों को भारत छोड़कर जाना पड़ा। मौलिक अधिकार, लोकतंत्र एवं नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक बार फिर सारे देश को एकजुट करने की तैयारी में सारा विपक्ष लामबंद हो रहा है। जिस तरह की खबरें मिल रही है। अगस्त माह से बड़े स्तर पर राष्ट्रीय आंदोलन शुरू करने की तैयारी में विपक्ष एकजुट हो रहा है। सत्ता पक्ष के लिये भविष्य में यह बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ सकता है।
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