Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles
Advertisement
Advertisement Banner

छठ महापर्व का अभिन्न प्रसाद ठेकुआ

नई दिल्ली। बिहार की संस्कृति और आस्था से गहरे जुड़ा ठेकुआ सिर्फ एक पकवान नहीं, बल्कि राज्य की पहचान बन चुका है। विशेष रूप से छठ महापर्व का अभिन्न प्रसाद होने के कारण, ठेकुआ बिहार की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस स्वादिष्ट महाप्रसाद का नाम कैसे पड़ा और इसका इतिहास कितना पुराना है? आइए जानते हैं ठेकुआ के नामकरण और उसके दिलचस्प इतिहास की कहानी। इस व्यंजन के नामकरण के पीछे ठोकना या दबाना शब्द की प्रक्रिया मानी जाती है। ठेकुआ बनाते समय आटे की लोई को नक्काशीदार सांचे पर रखकर हथेलियों से ज़ोर से ठोका या दबाया जाता है, जिससे उस पर खूबसूरत आकृतियाँ उभर आती हैं। इसी पारंपरिक तरीके से इसका नाम ठेकुआ पड़ा।

ठेकुआ के सटीक इतिहास के बारे में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है, लेकिन इसके उद्भव को लेकर कई दिलचस्प मान्यताएं प्रचलित हैं। कुछ लोग हजारों साल पुराना मानते हुए ऋग्वेद में वर्णित अपूप नामक पकवान से जोड़ते हैं, जिस गुड़ और आटे से घी में बनाया जाता था। एक अन्य मान्यता के अनुसार, बिहार एक कृषि प्रधान राज्य होने के कारण, जब गेहूं और गन्ने की नई फसल आती थी, तब सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए गेहूं और गुड़ से ठेकुआ बनाना शुरू हुआ। इसके अलावा, यह भी कहा जाता है कि पुराने समय में लंबी यात्राओं के दौरान बिना खराब हुए पेट भरने वाले भोजन की आवश्यकता से ठेकुआ का जन्म हुआ, क्योंकि यह बिना फ्रिज के भी कई दिनों तक ताज़ा रहता है और ऊर्जा देता है।

छठ पूजा में ठेकुआ का महत्व अतुलनीय है। यह महापर्व सूर्य देव को अर्घ्य देने का मुख्य प्रसाद है और इसके बिना छठ पूजा अधूरी मानी जाती है। मौसमी फलों के साथ अर्घ्य में ठेकुआ भी शामिल होता है, जिसे प्रसाद में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। ठेकुआ बनाने में शुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता है, और पारंपरिक रूप से इसे मिट्टी के चूल्हे पर ही पकाया जाता रहा है। हालांकि, आधुनिकता के साथ अब गैस चूल्हे का प्रयोग भी होने लगा है। ठेकुआ आज भी बिहार की पहचान, आस्था और संस्कृति का स्वादिष्ट प्रतीक बना हुआ है।

Comments (0)

Leave a Comment