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हिमालय के ग्लेशियर और हिमस्खलन

हिमालय केवल भारत, नेपाल, भूटान, चीन और पाकिस्तान की भौगोलिक सीमा नहीं है, बल्कि यह एशिया की जलवायु, नदियों, जैव-विविधता और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। पिछले तीन दशकों में विकास के नाम पर जिस तेजी से पहाड़ों को काटा गया, जंगलों को कम किया गया, नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में हस्तक्षेप हुआ और अत्याधिक निर्माण किया गया, उसके परिणाम अब इनक्रीसिंगली दिखाई देने लगे हैं। ग्लेशियरों का सिकुड़ना, हिमस्खलन, अचानक बाढ़, बादल फटना और पहाड़ों का दरकना अब अलग-अलग घटनाएं नहीं रह गई हैं, बल्कि एक बड़े पर्यावरणीय संकट की चेतावनी हैं। 

हिमालय की पारिस्थितिकी अत्यंत संवेदनशील है। यहां सड़क, सुरंग, बांध, होटल, रिसॉर्ट और अन्य निर्माण यदि वैज्ञानिक क्षमता और स्थानीय भौगोलिक परिस्थितियों को नजरअंदाज करके किए जाएं तो उनका प्रभाव केवल उस क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। एक पहाड़ का कमजोर होना पूरी घाटी के जलप्रवाह को बदल सकता है। मलबा नदी में पहुंचकर उसका मार्ग रोक सकता है। देखते ही देखते शांत नदी विनाशकारी बाढ़ का रूप ले सकती है। कहीं नदी का रास्ता बदल जाता है तो कहीं मलबे और चट्टानों का नया पहाड़ खड़ा हो जाता है। सबसे गंभीर चिंता जलवायु परिवर्तन की है। वैश्विक तापमान में वृद्धि का सीधा प्रभाव हिमालय के ग्लेशियरों पर पड़ रहा है। ग्लेशियरों का पीछे हटना केवल बर्फ के कम होने की कहानी नहीं है। यही ग्लेशियर सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी विशाल नदी प्रणालियों को पानी उपलब्ध कराते हैं। यदि हिमनदों का संतुलन बिगड़ता है तो आने वाले समय में एक तरफ अचानक बाढ़ और दूसरी तरफ जल-संकट दोनों का खतरा बढ़ सकता है। इस संकट का असर केवल मनुष्य पर नहीं होगा। हिमालय हजारों वनस्पतियों, पशु-पक्षियों और सूक्ष्म जीवों का घर है। तापमान और वर्षा के पैटर्न में बदलाव से जैविक संरचना बदल रही है। कुछ प्रजातियां ऊंचाई की ओर जाने को मजबूर होंगी, कुछ के लिए ऐसा करना संभव नहीं होगा। जंगलों की संरचना बदलेगी और उसके साथ पूरी खाद्य-श्रृंखला प्रभावित हो सकती है। प्रकृति का कोई भी हिस्सा अलग-थलग नहीं है। एक परिवर्तन दूसरे परिवर्तन को जन्म देता है।

दुर्भाग्य यह है कि पर्यावरणीय चेतावनियां वैज्ञानिक वर्षों से दे रहे हैं, लेकिन विकास की हमारी परिभाषा अभी भी सड़क, पुल, भवन और ऊर्जा परियोजनाओं की संख्या से तय होती है। सवाल यह नहीं है कि विकास होना चाहिए या नहीं। सवाल यह है कि क्या ऐसा विकास होना चाहिए जो आने वाली पीढ़ियों के अस्तित्व को ही खतरे में डाल दे? भारत, नेपाल, चीन और पाकिस्तान के लिए हिमालय साझा प्राकृतिक व्यवस्था है। राजनीतिक सीमाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन ग्लेशियर, नदियां, हवा और मौसम सीमाओं को नहीं मानते। नेपाल में होने वाली हिमालयी आपदा का प्रभाव भारत तक पहुंच सकता है और हिमालय में होने वाला पर्यावरणीय परिवर्तन पूरे दक्षिण एशिया की जल-सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसलिए अब इन देशों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर साझा हिमालय नीति बनानी होगी। ग्लेशियरों की लगातार निगरानी, वैज्ञानिक आधार पर निर्माण, संवेदनशील क्षेत्रों में निर्माण पर प्रतिबंध, जंगलों की रक्षा, नदी के प्राकृतिक मार्गों को सुरक्षित रखना और आपदा की पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करना समय की आवश्यकता है। 

अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं को भी केवल सम्मेलन और घोषणाओं तक सीमित रहने के बजाय उत्सर्जन और पर्यावरण संरक्षण के लक्ष्यों के वास्तविक पालन की निगरानी करनी होगी। प्रकृति को जीतने की वस्तु समझना मानव सभ्यता की सबसे बड़ी भूल है। ब्रह्मांड एक है, धरती एक है, उसकी प्राकृतिक व्यवस्था भी एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। सीमाएं मनुष्य ने बनाई हैं, प्रकृति ने नहीं। यदि धन, सत्ता और सुविधा के लिए हम हिमालय जैसे प्राकृतिक सुरक्षा कवच को लगातार कमजोर करते रहे तो आने वाली पीढ़ियां हमें विकास का निर्माता नहीं, बल्कि विनाश की नींव रखने वाली पीढ़ी के रूप में याद करेंगी। समय अभी भी हमारे हाथ में है। हिमालय को बचाना केवल पहाड़ों को बचाना नहीं है। यह पानी, मौसम, जैव-विविधता, अर्थव्यवस्था और मानव सभ्यता के भविष्य को बचाना है। इसके लिए जिम्मेदारी और बेहतर सोच तथा समन्वय की जरूरत है। 

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