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पाकिस्तान कुछ आतंकवादी संगठनों के प्रति अपना सकता है नरम रुख?

काबुल। अफगानिस्तान में अपना पुराना असर कम होता देखकर पाकिस्तान अब एक बार फिर पुरानी रणनीति की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है। एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तान कुछ आतंकवादी संगठनों के प्रति नरम रुख अपना सकता है। इससे वह अफगानिस्तान पर अपना दबदबा बनाए रख सके। एक रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चर्चा इस्लामिक स्टेट खुरासान प्रोविंस यानी आईएसकेपी को लेकर है। रिपोर्ट के मुताबिक दावा किया जा रहा है कि आईएसकेपी का नेटवर्क पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में अब भी एक्टिव है। कुछ लोगों को पाकिस्तानी सिक्योरिटी सिस्टम के भीतर मौजूद तत्वों की मदद से नेटवर्क चलाने का मौका मिल रहा है। तालिबान और पाकिस्तान के रिश्ते पिछले कुछ समय से लगातार खराब हुए हैं। तालिबान का आरोप है कि पाकिस्तान अपनी जमीन पर आईएसकेपी को पनपने की इजाजत दे रहा है। रिपोर्ट में आईएसकेपी नेता सनाउल्लाह गफारी का भी जिक्र किया गया है।

तालिबान ने दावा किया कि गफारी पाकिस्तान में मौजूद आईएसकेपी से जुड़े ठिकानों पर आता-जाता रहा है। जून में तालिबान ने बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में आईएसकेपी से जुड़े बताए गए ठिकानों पर कार्रवाई करने का दावा भी किया था। पाकिस्तान की पुरानी रणनीति को अक्सर स्ट्रैटेजिक डेप्थ यानी रणनीतिक गहराई कहा जाता है। इसका मकसद अफगानिस्तान में ऐसी सरकार को समर्थन देना था, जो पाकिस्तान के हितों के मुताबिक काम करे। पाकिस्तानी रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि काबुल में अपने हिसाब से सरकार रहने से भारत के खिलाफ पाकिस्तान को रणनीतिक फायदा मिलेगा। उसकी पश्चिमी सीमा भी सुरक्षित रहेगी, लेकिन अगस्त 2021 में तालिबान के दोबारा सत्ता में आने के बाद कहानी बदल गई। पाकिस्तान को उम्मीद थी कि तालिबान डूरंड लाइन को मान लेगा और टीटीपी के खिलाफ कार्रवाई करेगा, लेकिन तालिबान ने अपनी स्वतंत्र नीति को प्राथमिकता दी। नतीजा यह हुआ कि दोनों देशों के रिश्ते लगातार तनावपूर्ण होते गए। सीमा पर झड़पों से लेकर हवाई हमलों और व्यापारिक दबाव तक, दोनों के बीच टकराव बढ़ता गया। तालिबान के लिए टीटीपी और आईएसकेपी दोनों सुरक्षा चुनौती हैं, लेकिन आईएसकेपी तालिबान का विचारधारा के आधार पर विरोधी है, साथ ही दोनों हिंसक विरोधी भी है। 

बता दें साल 2021 में तालिबान की सत्ता वापसी के बाद से आईएसकेपी के खिलाफ लगातार अभियान चलाए गए हैं। ऐसे में रिपोर्ट का दावा है कि अगर पाकिस्तान आईएसकेपी के प्रति नरमी दिखाता है, तो इससे तालिबान के खिलाफ उसका दबाव बढ़ सकता है। क्षेत्र में एक सक्रिय आतंकवादी नेटवर्क को मजबूती मिल सकती है। वाखान कॉरिडोर सबसे अहम कड़ी बनकर सामने आया है। अफगानिस्तान की जमीन का यह संकरा हिस्सा चीन के शिनजियांग क्षेत्र से जुड़ता है। रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान चीन की ओर एक सड़क बना रहा है। मई 2026 तक करीब 70 फीसदी काम पूरा होने की बात अफगान अधिकारियों ने कही थी।

रिपोर्ट में यह भी तर्क दिया गया है कि अगर वाखान कॉरिडोर में गड़बड़ पैदा होती है, तो चीन-अफगानिस्तान सीधी कनेक्टिविटी प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के पास चीन के सामने अपनी उपयोगिता बनाए रखने का एक और आधार रह सकता है। मामला सिर्फ पाकिस्तान और अफगानिस्तान की दुश्मनी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे चीन की कनेक्टिविटी, व्यापारिक रास्ते और पूरे क्षेत्र में बदलता रणनीतिक समीकरण भी जुड़ा हुआ है।

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