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जिसको प्यार करना नहीं आता, वही तो शासक बनता है

नेपोलियन बोनापार्ट फ्रांस का महान सेनापति और बाद में सम्राट बना, जिसने अपनी सैन्य प्रतिभा और महत्वाकांक्षा के बल पर यूरोप के बड़े भूभाग पर अपना प्रभाव स्थापित किया। अनेक युद्धों में विजय प्राप्त कर उसने इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया, लेकिन उसकी निजी ज़िंदगी में प्रेम और पारिवारिक संबंध उतने सरल नहीं रहे। योसेफ़ीन के साथ उसका संबंध इसी विरोधाभास को सामने लाता है,एक ऐसा विजेता जो संसार पर अधिकार कर सका, लेकिन प्रेम के संसार में अपने ही मनुष्यत्व से जूझता रहा।

          नेपोलियन को जंग जीतने से फ़ुर्सत नहीं हुआ करती थी। उसके सामने हर दिन कोई नया युद्ध, कोई नया क़िला और कोई नया भूभाग जीतने की चुनौती होती थी। तलवार उसके हाथ में थी और विजय जैसे उसके जीवन की आदत बन चुकी थी। वह एक के बाद एक लड़ाइयाँ जीतता गया और उसके साम्राज्य की सीमाएँ फैलती चली गईं। लेकिन इस महान विजेता के जीवन में एक ऐसा संसार भी था, जहाँ तलवार और विजय की कोई उपयोगिता नहीं थी  वह था प्रेम का संसार। योसेफ़ीन बोनापार्ट फ्रांस के सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट की पहली पत्नी थीं। दोनों का विवाह 1796 में हुआ। नेपोलियन योसेफ़ीन से गहरा प्रेम करते थे। उनके संबंध में आकर्षण, प्रेम, ईर्ष्या, तनाव और भावनात्मक जुड़ाव, सब कुछ था। नेपोलियन अपनी विजयों के बीच योसेफ़ीन को चिट्ठियाँ लिखा करता था। उन पत्रों में वह अपने मन की बातों से अधिक अपनी विजयों का उल्लेख करता, “योसेफ़ीन, आज मैंने फलाँ क़िला हासिल किया, ढिकाँ लड़ाई जीती।” शायद उसके लिए अपनी विजय का समाचार ही प्रेम की अभिव्यक्ति था। उसे लगता था कि दुनिया पर उसकी जीत योसेफ़ीन के हृदय में भी उसके लिए जगह को और मज़बूत करती जाएगी। लेकिन प्रेम की अपनी भाषा होती है। वहाँ क़िले नहीं जीते जाते, वहाँ किसी को पराजित नहीं किया जाता। प्रेम को समय चाहिए, निकटता चाहिए, किसी की ख़ामोशी को सुनने की क्षमता चाहिए। नेपोलियन युद्ध के मैदान में जितना सफल था, संभव है प्रेम के इस मौन व्याकरण को समझने में उतना ही असफल रहा हो। वह संसार को अपनी इच्छा के अनुसार बदल सकता था, लेकिन किसी दूसरे मनुष्य के हृदय को अपनी इच्छा के अनुसार नहीं बदल सकता था।

धीरे-धीरे योसेफ़ीन नेपोलियन की उन आदतों और हरकतों से भीतर तक ऊबने लगी थी, जिनमें कभी उसे आकर्षण दिखाई देता था। जिस नेपोलियन को उसने कभी अपने हृदय से चाहा था, वही नेपोलियन अब उसके प्रेम का विषय नहीं, उसकी उदासी का कारण बनता जा रहा था। नेपोलियन को युद्धों से लगाव था, विजय से प्रेम था और नए-नए भूभाग जीतने का जुनून था; लेकिन योसेफ़ीन को इन सबसे कोई मतलब नहीं था। उसे नेपोलियन की विजयों से नहीं, नेपोलियन से प्रेम था। वह चाहती थी कि नेपोलियन उसके पास बैठकर उसके मन की सुने, उसकी आँखों में छिपे प्रश्नों को पढ़े और उसके साथ कुछ ऐसे क्षण बिताए जिनमें न कोई युद्ध हो, न कोई विजय, न कोई साम्राज्य। लेकिन नेपोलियन जब भी उससे दूर होता, उसके पास अपने मन की गर्माहट नहीं, अपनी विजयों की खबर भेजता—आज यह क़िला जीत लिया, आज वह युद्ध जीत लिया। नेपोलियन के लिए ये पत्र प्रेम की अभिव्यक्ति थे, लेकिन योसेफ़ीन के लिए वे धीरे-धीरे इस बात की पीड़ा बन गए कि उसका प्रिय व्यक्ति उसके साथ होकर भी उससे कितना दूर है।

एक समय आया जबनेपोलियन के पत्रों की प्रतीक्षा करने वाला वही हृदय उन पत्रों से थक गया। जिन पत्रों को कभी वह उत्सुकता से खोलती होगी, वे अब उसके लिए बोझ बन गए। धीरे-धीरे उसने नेपोलियन के पत्रों को पढ़ना भी छोड़ दिया और वे बिना खोले ही रद्दी की टोकरी में जाने लगे। यह केवल पत्रों का कूड़ेदान में जाना नहीं था; मानो नेपोलियन की हर नई विजय के साथ योसेफ़ीन के हृदय में उसके लिए बचा हुआ प्रेम थोड़ा-थोड़ा मरता जा रहा था। नेपोलियन दुनिया जीतता रहा, लेकिन जिस स्त्री का हृदय वह अपने नाम करना चाहता था, उसके भीतर वह हारता चला गया। उसे देर से समझ में आया कि प्रेम को विजयों की खबर नहीं, प्रेमी की उपस्थिति चाहिए; उसे क़िलों की नहीं, धड़कनों की भाषा समझनी होती है। और जब तक नेपोलियन यह समझ पाता, योसेफ़ीन उससे बहुत दूर जा चुकी थी।यह भी कहा जाता है कि योसेफ़ीन ने नेपोलियन के एक सेनापति से प्रेम करना शुरू कर दिया। इतिहास इस प्रसंग की हर बात की पुष्टि करे या न करे, किंवदंती का यह रूप अपने भीतर एक गहरी विडंबना लिए हुए है। नेपोलियन दुनिया जीत रहा था, लेकिन जिस हृदय को वह अपना समझना चाहता था, वहाँ उसकी विजय सुनिश्चित नहीं थी। और फिर उनके संबंध के सामने एक और कठोर वास्तविकता खड़ी थी। योसेफ़ीन से नेपोलियन को कोई संतान नहीं हुई। साम्राज्य के लिए उत्तराधिकारी की आवश्यकता और अपनी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने की चिंता ने नेपोलियन को अंततः प्रेम और सत्ता के बीच चुनाव करने के लिए विवश किया। 1809 में दोनों का विवाह-विच्छेद हुआ और बाद में नेपोलियन ने ऑस्ट्रिया की राजकुमारी मैरी-लुईज़ से विवाह किया। प्रेम समाप्त हुआ या नहीं, यह अलग प्रश्न है, लेकिन सत्ता की आवश्यकता ने उनके वैवाहिक जीवन पर अपना निर्णय अवश्य सुना दिया। सत्ता का स्वभाव है कि वह सामने वाले से समर्पण चाहती है; प्रेम का स्वभाव है कि वह सामने वाले को स्वतंत्र देखना चाहता है और स्वयं समर्पित होना चाहता है।

युद्ध भले ही विजित भू-भाग, सत्ता और संपत्ति पर अधिकार कर ले, लेकिन उसकी विजय के पीछे मनुष्य की पीड़ा छिपी रहती है। युद्ध की आग में केवल सैनिक ही नहीं जलते, घरों के चूल्हे बुझते हैं, आँगन सूने होते हैं और असंख्य परिवार अपने किसी प्रिय की प्रतीक्षा में जीवन गुजार देते हैं। किसी माँ की गोद सूनी हो जाती है, किसी बच्चे के बचपन से पिता का साया उठ जाता है और किसी स्त्री की आँखों में जीवन भर लौटकर न आने वाले कदमों की प्रतीक्षा ठहर जाती है। युद्ध की विजय इतिहास में दर्ज हो जाती है, लेकिन उसके आँसू इतिहास के पन्नों में अक्सर दिखाई नहीं देते। युद्ध भूमि जीतता है, लेकिन उस विजय की कीमत मनुष्य का सुख और प्रेम चुकाता है।प्रेम की प्रकृति इसके बिल्कुल विपरीत है। प्रेम किसी भू-भाग, सत्ता या संपत्ति पर अधिकार नहीं माँगता; वह मनुष्य के भीतर एक ऐसी जगह बनाता है जहाँ अधिकार से अधिक विश्वास और पाने से अधिक देने का महत्व होता है। प्रेम किसी से कुछ छीनकर बड़ा नहीं होता, बल्कि अपने होने से दूसरे के जीवन को थोड़ा अधिक सुंदर बना देता है। जहाँ युद्ध बिछोह की स्मृतियाँ छोड़ जाता है, वहाँ प्रेम साथ बिताए क्षणों को जीवन की सबसे मूल्यवान निधि बना देता है। युद्ध की शक्ति के सामने हथियार होते हैं, लेकिन प्रेम की शक्ति के सामने केवल एक सच्चा हृदय पर्याप्त होता है। युद्ध मनुष्य को झुका सकता है, प्रेम मनुष्य को अपने भीतर से जोड़ सकता है।

इसीलिए युद्ध और प्रेम की तुलना केवल शक्ति की दृष्टि से नहीं, बल्कि उनके परिणामों की दृष्टि से करनी चाहिए। युद्ध की विजय बाहर दिखाई देती है—विजित भूमि, सत्ता और संपत्ति के रूप में; प्रेम की विजय भीतर अनुभव होती है—विश्वास, आत्मीयता और स्मृति के रूप में। युद्ध के बाद विजेता के पास बहुत कुछ हो सकता है, फिर भी किसी खोए हुए व्यक्ति की कमी उसके जीवन से कभी पूरी नहीं होती; प्रेम में कभी-कभी पाने को कुछ भी भौतिक नहीं होता, फिर भी एक प्रिय हृदय का साथ जीवन को पूर्ण बना देता है। युद्ध पीड़ा देकर विजय प्राप्त करता है, प्रेम बिना पीड़ा दिए अपना संसार रचता है। युद्ध धरती का एक हिस्सा जीत सकता है, लेकिन प्रेम मनुष्य के हृदय में वह स्थान बना सकता है जिसे कोई सत्ता, कोई संपत्ति और कोई विजय छीन नहीं सकती। सत्ता अपनी बात मनवाती है, लेकिन प्रेम सामने वाले की इच्छा से उसे अपने साथ रखता है। सत्ता भय, अनुशासन और अधिकार के सहारे अपना संसार बनाती है; प्रेम विश्वास, समानता और अपनत्व से अपना संसार रचता है। इसलिए जो व्यक्ति जीवन के हर रिश्ते में अपने अधिकार की भाषा बोलता है, वह प्रेम की भाषा को धीरे-धीरे खो देता है। प्रेम में किसी को जीतना नहीं होता, स्वयं को किसी के सामने खोलना होता है।

नेपोलियन ने क़िले जीते, सेनाओं को पराजित किया, राजाओं को झुकाया और अपने समय की राजनीति पर अपनी छाप छोड़ी; लेकिन प्रेम के संसार में सत्ता, पद और विजय किसी काम नहीं आई। जिस स्त्री को वह अपने जीवन का हिस्सा समझता था, उसके मन पर उसका अधिकार नहीं था। संसार पर शासन किया जा सकता है, किसी मनुष्य के हृदय पर शासन नहीं किया जा सकता।

शायद यही कारण है कि इतिहास के बड़े विजेताओं की निजी ज़िंदगी में कई बार ऐसी हार दिखाई देती है, जिसे कोई इतिहास की पुस्तक विजय के आँकड़ों में दर्ज नहीं करती। साम्राज्य की सीमा कितनी भी बड़ी हो, मनुष्य का हृदय उससे बड़ा होता है। तलवार किसी ज़मीन पर अधिकार दिला सकती है, सत्ता किसी पद पर बैठा सकती है, लेकिन किसी के भीतर अपने लिए प्रेम पैदा नहीं कर सकती।

जहाँ सत्ता समाप्त होती है, वहीं से प्रेम की असली परीक्षा शुरू होती है, क्योंकि प्रेम में सामने वाला आपका प्रजा नहीं, बराबर का मनुष्य होता है। सत्ता अपने सामने झुका हुआ सिर चाहती है; प्रेम अपने सामने उठी हुई आँखें। सत्ता चाहती है कि दूसरा आपकी इच्छा से चले; प्रेम चाहता है कि दूसरा अपनी इच्छा से आपके साथ चले।

और शायद यहीं मनुष्य की सबसे बड़ी विडंबना छिपी है। जो व्यक्ति पूरी दुनिया को अपने सामने झुका सकता है, वह कभी-कभी उस एक व्यक्ति के सामने असहाय हो जाता है, जिसे वह सचमुच अपना बनाना चाहता है। इतिहास के महान विजेताओं की सबसे बड़ी हार कभी युद्धभूमि में नहीं होती; वह उस क्षण होती है, जब वे समझते हैं कि सत्ता से शरीरों को झुकाया जा सकता है, दिलों को नहीं।

जिसको प्यार करना नहीं आता, वही तो शासक बनता है। क्योंकि शासक को आज्ञा चाहिए, प्रेमी को स्वीकृति। शासक को अधीनता चाहिए, प्रेमी को अपनापन। शासक दूसरों पर अधिकार स्थापित करता है, प्रेमी स्वयं को दूसरे के सामने समर्पित करता है। शायद इसीलिए इतिहास में ऐसे अनेक शासक मिल जाते हैं जिन्होंने महाद्वीपों पर अपना झंडा फहराया, लेकिन अपने ही जीवन में किसी एक हृदय को हमेशा के लिए अपना नहीं बना सके।

जिसको प्यार करना नहीं आता, वही तो शासक बनता है।

शासक सब कुछ जीत लेते हैं, प्यार हार जाते हैं।

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