Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles
Advertisement
Advertisement Banner

क्या हैं आध्यात्मिक होने का अर्थ

यह प्रश्न किसी भी जिज्ञासु के मन में उठ सकता है कि हमें ठीक-ठीक ऐसा क्या करना चाहिए ताकि वह जो परम है, जो परमेश्वर है, वह मेरे जीवन में घटित हो सके? सदगुरु इसका उत्तर देते हैं कि अध्यात्म भीगी बिल्लियों के लिए नहीं है, क्या तुम समझ रहे हो? तुम अपने जीवन में और कुछ भी नहीं कर सकते हो, लेकिन सोचते हो कि मैं आध्यात्मिक हो सकता हूँ, ऐसा नहीं है। अगर तुम इस संसार के किसी भी काम को अपने हाथ में लेकर कर सकते हो, फिर तुम्हारे आध्यात्मिक होने की एक संभावना पैदा हो सकती है, अन्यथा नहीं। अगर तुम्हारे पास इस संसार के किसी भी काम को लेकर और अच्छी तरह से करने की शक्ति और साहस है, तब तुम संभवतरू आध्यात्मिक हो सकते हो।   

यह उन लोगों के लिए नहीं है, जो कुछ भी नहीं कर सकते। अभी, पूरे देश के मन में यही बैठा हुआ है, संभवतरू पूरे संसार के मन में, कि वे निकम्मे और नालायक लोग, आध्यात्मिक लोग होते हैं, क्योंकि वे तथाकथित आध्यात्मिक लोग वैसे ही हो गए हैं। वे लोग जो किसी भी चीज को करने के लायक नहीं हैं, वे बस यही करते हैं कि एक गेरुआ वस्त्र पहन कर और किसी मंदिर के सामने बैठ जाते हैं; उनका जीवन सँवर जाता है। यह अध्यात्म नहीं है, यह वर्दी पहनकर बस भीख माँगना है। अगर तुम्हें अपनी चेतना पर विजय प्राप्त करनी है, अगर तुम्हें अपनी चेतना के शिखर पर पहुँचना है, वहाँ एक भिखारी कभी नहीं पहुँच सकता। दो तरह के भिखारी होते हैं। गौतम बुद्ध तथा उस स्तर के लोग उच्चतम श्रेणी के भिखारी हैं। दूसरे सभी निपट भिखारी हैं। मैं तो कहूँगा कि एक सड़क का भिखारी तथा राजगद्दी पर बैठा हुआ एक राजा, दोनों ही भिखारी हैं। वे निरन्तर बाहर से कुछ माँग रहे होते हैं। सड़क का भिखारी हो सकता है कि पैसा, भोजन या आय माँग रहा हो। राजा हो सकता है कि किसी दूसरे राज्य पर विजय, खुशी या कुछ इस तरह की अनर्गल चीजें माँग रहा हो।  

क्या तुम देखते हो, हर व्यक्ति किसी न किसी चीज की भीख माँग रहा हैरू गौतम बुद्ध ने केवल अपने भोजन के लिए भिक्षा माँगी, शेष चीजों के लिए वे आत्मनिर्भर थे। दूसरे सभी लोग, बस एक ही चीज के लिए भीख नहीं माँगते, अपना भोजन भीख में नहीं माँगते, बाकी सभी चीजों के लिए भीख माँगते हैं। उनका पूरा जीवन ही भीख माँगना है। केवल भोजन अर्जित करते हैं। लेकिन एक आध्यात्मिक व्यक्ति, केवल भोजन के लिए भिक्षा माँगता है, अन्य सभी चीजें अपने भीतर से अर्जित करता है। जिस भी तरह से रहना तुम बेहतर मानते हो, उसी तरह से रहो। जिस भी तरह से रहने को तुम जीने का एक सशक्त ढंग मानते हो, उसी तरह से जिओ।  


Comments (0)

Leave a Comment