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जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों भूस्खलन के लिहाज से बेहद संवेदनशील

नई दिल्ली। नेपाल में हाल में आई प्राकृतिक आपदा के बाद हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को लेकर चिंता बढ़ी है। इसी बीच जम्मू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के नए अध्ययन में जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों को भूस्खलन के लिहाज से अत्यधिक संवेदनशील बताया गया है। अध्ययन में डोडा, किश्तवाड़, पुंछ, राजौरी और रामबन जिलों को सबसे ज्यादा जोखिम वाले क्षेत्रों में शामिल किया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि यह किसी निश्चित घटना की भविष्यवाणी नहीं, बल्कि भूस्खलन की संभावना वाले क्षेत्रों की वैज्ञानिक पहचान है। शोधकर्ताओं ने करीब 43 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र का अध्ययन कर भूस्खलन संवेदनशीलता मानचित्र तैयार किया। अध्ययन के मुताबिक कुल क्षेत्रफल का करीब 24.4 फीसदी हिस्सा उच्च जोखिम वाले क्षेत्र में है, जबकि करीब 3.6 फीसदी इलाका अत्यधिक जोखिम वाले क्षेत्र में पाया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि इस मानचित्र के जरिए प्रशासन और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को पहले से तैयारी करने में मदद मिल सकती है। 

अध्ययन में पुराने 669 भूस्खलन मामलों का भी विश्लेषण किया गया। इनमें करीब 87 फीसदी घटनाएं उन क्षेत्रों में दर्ज हुईं, जिन्हें मानचित्र में उच्च या अत्यधिक जोखिम वाले जोन में रखा गया है। इससे तैयार किए गए जोखिम मानचित्र की उपयोगिता और वैज्ञानिक विश्वसनीयता को बल मिलता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक भूस्खलन का सटीक समय और स्थान पहले से बताना संभव नहीं है, लेकिन संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान कर नुकसान को कम करने की तैयारी की जा सकती है। डोडा, किश्तवाड़, पुंछ, राजौरी और रामबन जैसे जिलों में तेज ढलान और कई स्थानों पर कमजोर भूगर्भीय संरचना जोखिम बढ़ाती है। इसके अलावा सड़क निर्माण के लिए पहाड़ों की कटाई, वनस्पति में कमी और अन्य मानवीय गतिविधियां भी ढलानों की स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं। भारी और लगातार बारिश ऐसी पहले से कमजोर ढलानों के लिए बड़े ट्रिगर का काम कर सकती है। रिसर्च टीम ने अध्ययन के लिए उपग्रह चित्रों, फील्ड सर्वे और पुराने भूस्खलन रिकॉर्ड का उपयोग किया। 

वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में लगातार निगरानी, बारिश में विशेष सतर्कता, कमजोर ढलानों को स्थिर करने के उपाय और सड़क निर्माण में वैज्ञानिक मानकों का सख्ती से पालन किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्रों में आपदाओं को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन समय रहते जोखिम की पहचान और प्रभावी तैयारी से बड़े नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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