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महाराष्ट्र में ऑपरेशन टाइगर की पड़ताल

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति एक बार फिर दल-बदल और आंतरिक सत्ता संघर्ष के चरम पर है। उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना (यूबीटी) को लगातार झटके लग रहे हैं। लोकसभा के छह सांसदों के पाला बदलने के ठीक एक हफ्ते बाद, उद्धव सेना के वरिष्ठ नेता और विधान परिषद सदस्य (एमएलसी) सचिन अहीर ने भी पाला बदल लिया है। बुधवार को उन्हें सत्तारूढ़ शिवसेना यानी एकनाथ शिंदे गुट के उम्मीदवार के रूप में निर्विरोध विधान परिषद का उपसभापति चुना गया। आदित्य ठाकरे के बेहद करीबी माने जाने वाले सचिन अहीर का यह कदम उद्धव गुट के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका है, जिसने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की राजनीतिक ताकत को और मजबूत कर दिया है। राजनीतिक गलियारों में उद्धव सेना के सांसदों और नेताओं के इस सामूहिक दल-बदल को ऑपरेशन टाइगर का नाम दिया जा रहा है। इस ऑपरेशन के जरिए शिंदे न केवल राज्य की राजनीति में, बल्कि केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन के भीतर भी खुद को एक अपरिहार्य नेता के रूप में स्थापित करने में सफल रहे हैं।

महाराष्ट्र के राजनीतिक विश्लेषकों और अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, इस ऑपरेशन टाइगर के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण माने जा रहे हैं। पहला कारण संसद में दो-तिहाई बहुमत की रणनीति है। कहा जा रहा है कि इस ऑपरेशन को भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व की हरी झंडी मिली है, क्योंकि केंद्र सरकार को आने वाले समय में परिसीमन, एक राष्ट्र, एक चुनाव और महिला आरक्षण जैसे कुछ बेहद महत्वपूर्ण संवैधानिक संशोधन विधेयकों को संसद में पारित कराना है, जिसके लिए लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी। शिंदे की यह मुहिम इस बहुमत को जुटाने में मददगार साबित हो रही है। दूसरा कारण एकनाथ शिंदे की अपनी महत्वाकांक्षा है। साल 2024 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 132 सीटें मिली थीं, जबकि शिंदे की शिवसेना को 57 और एनसीपी (अजीत पवार) को 41 सीटें मिलीं, जिसके कारण मुख्यमंत्री पद देवेंद्र फडणवीस के पास चला गया और शिंदे को उपमुख्यमंत्री पद से संतोष करना पड़ा। शिंदे गुट का मानना है कि महायुति की चुनावी जीत उनकी सरकार की लाडकी बहिन योजना के कारण हुई थी, इसलिए सीएम पद न मिलने से शिंदे काफी समय से असहज थे। अब वे भाजपा के केंद्रीय आलाकमान के पसंदीदा नेताओं की सूची में आकर 2029 के चुनावों के लिए फिर से शीर्ष पद पर अपनी दावेदारी मजबूत कर रहे हैं।

इस पूरे घटनाक्रम का एक और दिलचस्प पहलू महायुति गठबंधन के भीतर का आंतरिक सत्ता संघर्ष है। गठबंधन के ही कुछ अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि शिंदे के राजनीतिक कद को जानबूझकर बढ़ावा देना एक रणनीतिक चाल भी हो सकती है, ताकि 2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों से पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित रखा जा सके।

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