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श्रीहनुमानजी का लघुकथा प्रसंग

जिन्ह के रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड २४१-२

एक समय की बात है कि प्रभु श्रीराम सुबेल पर्वत पर पर्ण की शय्या पर विश्राम कर रहे थे सुग्रीव की गोद में श्रीराम का सिर था, अंगद-हनुमानजी उनके चरणों को दबा रहे थे, उनके धनुष और तूणीर पास ही रखे थे। लक्ष्मणजी बड़े ही धैर्यपूर्वक उनके पीछे वीरासन में बैठकर भगवान श्रीराम को देख रहे थे। श्रीराम अपने हाथ में बाण लिये उसे सहला रहे थे। चन्द्रमा आकाश में दिखाई दे रहा था। श्रीराम ने उसकी ओर देखकर पूछा आप सब अपनी बुद्धि-ज्ञान के अनुसार बताओ कि इस चन्द्रमा में श्यामलता कैसी दिखाई पड़ती है? सुग्रीव, विभीषण अंगद आदि ने अपने ज्ञानानुसार उसके कारण बताए। सबके बाद में हनुमानजी ने कहा प्रभो- चन्द्रमा तो आपका सेवक है। आपका भी उस पर अनन्य प्रेम है। अतरू आप ही चन्द्रमा के हृदय में श्यामवर्ण से सुन्दर सुशोभित हैं। यह उत्तर सुनकर श्रीराम हँसने लगे तथा सबको भी बहुत आनन्द आया-

कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हार प्रिय दास।

तव मूरति बिधु उर बसति सोइ श्यामता अभास।।

श्रीरामचरितमानस लंकाकाण्ड १२ (क)

हनुमानजी को तो सर्वत्र श्रीराम के दर्शन होते हैं। चन्द्रमा में उन्होंने भगवान के ही दर्शन कर ऐसा श्रीराम से कहा था। इसीलिए हनुमानजी को ज्ञान-गुण-सागर कहा गया है।


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