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भारतीय राजनीति में कुछ नेता ऐसे होते हैं जिन्हें समय के साथ लोग भूल नहीं पाते, बल्कि उनकी याद और मजबूत हो जाती है। देश के पहले प्रधानमंत्री स्वतंत्रता सेनानी पंडित जवाहरलाल नेहरू एक ऐसा ही नाम हैं। आज उन्हें गुजरे 60 साल से ज्यादा का समय हो चुका है, फिर भी देश की राजनीति उन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती है। सच तो यह है कि आज उनके विरोधी भी सुबह से शाम तक नेहरू का नाम लिए बिना अपनी राजनीति नहीं चमका पाते। नफरत या विरोध के बहाने ही सही, नेहरू को लगातार याद करना उनकी इसी बड़ी ताकत को दिखाता है।
दूसरी तरफ आज देश की सत्ता पर काबिज पीएम नरेंद्र मोदी हैं, अक्सर उनके समर्थक और उनकी पीआर टीम उनकी तुलना नेहरू से करने की कोशिश करती है। ऐसे में एक बड़ा सवाल उठता है - क्या आज से 60 साल बाद कोई उन्हें इस तरह याद करेगा? क्या खुद उनकी अपनी पार्टी भाजपा उन्हें उस आदर के साथ याद रखेगी जो स्थान कांग्रेस में हमेशा नेहरू का रहा है? राजनीति का एक कड़वा सच है कि जो साख केवल सत्ता और डर पर टिकती है, वह कुर्सी जाते ही खत्म हो जाती है। आज भाजपा के भीतर अंदरूनी लोकतंत्र खत्म हो चुका है। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे बड़े नेताओं को मार्गदर्शक मंडल के नाम पर घर बैठा देना इसका सीधा सबूत है। जब पूरी राजनीति सिर्फ एक चेहरे के भरोसे चलती है, तो उसे सम्मान नहीं बल्कि तानाशाही रवैया कहा जाता है। आज पार्टी के नेता सम्मान की वजह से नहीं, बल्कि टिकट कटने या किनारे किए जाने के डर से चुप रहते हैं।
इतिहास गवाह है कि सत्ता की धमक खत्म होते ही ऐसा डर और तिलस्म बिखर जाता है। पंडित नेहरू और आज के नेतृत्व के बीच सबसे बड़ा फर्क संस्थाओं को देखने का था। नेहरू ने देश को सिर्फ चलाया नहीं, बल्कि उसे अपने हाथों से बनाया।
उन्होंने आईआईटी आईआईएम , इसरो, भेल गेल, सेल की नींव रखने वाली संस्था इनकोसपार और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर जैसी वैज्ञानिक संस्थाएं खड़ी कीं। उन्होंने चुनाव आयोग को पूरी आजादी दी। नेहरू के समय संसद में तीखे सवाल पूछने वाले विपक्ष की बात सुनी जाती थी। एक बार विपक्ष के युवा नेता अटल बिहारी वाजपेयी का शानदार भाषण सुनकर नेहरू ने खुले दिल से कहा था कि यह लड़का एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। इसे कहते हैं बड़ा दिल और लोकतंत्र का असली आदर। इसके ठीक उलट, आज के दौर में सभी सरकारी संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के चार बड़े जजों की ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर चुनाव आयोग के फैसलों तक, हर जगह पक्षपात साफ दिखता है। सीबीआई और ईडी जैसी केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल केवल राजनीतिक विरोधियों को डराने के लिए हो रहा है। संसद में एक ही सत्र के भीतर 140 से ज्यादा सांसदों को सस्पेंड कर देना, पार्टियां तोड़ देना, चुनी हुई सरकारें अस्थिर करना, बिना किसी बहस के कृषि कानूनों जैसे बड़े नियम थोप देना और बाद में विरोध के डर से उन्हें वापस लेना - यह दिखाता है कि यहाँ बातचीत की जगह केवल एकतरफा फैसले लिए जा रहे हैं।
एक और बड़ी बात यह है कि नेहरू केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थे। वे देश को आजाद कराने वाले एक बड़े क्रांतिकारी थे। उन्होंने अपनी जिंदगी के सबसे कीमती 9 साल अंग्रेजों की जेलों में काटे। अल्मोडा और अहमदनगर किला जैसी जेलों की अंधेरी कोठरियों में बैठकर उन्होंने डिस्कवरी ऑफ इंडिया जैसी महान किताबें लिखीं। उन्होंने लाठियां खाईं और महात्मा गांधी के साथ मिलकर देश को आजादी दिलाई। उनकी यह कुर्बानी उन्हें एक ऐसा नैतिक बल देती थी जो केवल पीआर एजेंसियों या चुनाव जीतने से नहीं मिलता। राजनीति में अमर होने के लिए केवल सत्ता का घमंड काफी नहीं होता। इतिहास गवाह है कि जनता के दिलों पर राज करने के लिए संस्थाओं को मजबूत करना पड़ता है, उन्हें बौना नहीं बनाया जाता। जब पूरी राजनीति केवल एक चेहरे पर सिमट जाती है, तो सत्ता हटते ही उसका पतन तय है। यही वजह है कि 60 साल बाद भी नेहरू अमर हैं, जबकि आज की डराने वाली राजनीति भविष्य के इतिहास में केवल सत्ता के अहंकार के रूप में दर्ज होने की कगार पर खड़ी है, लेकिन सवाल वही है क्या मोदी नेहरू के बराबर हो जाएंगे?? क्या 60 साल बाद कोई याद करेगा?
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