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नपा में भारी टूट, 100 से ज्यादा पार्षदों ने दिया सामूहिक इस्तीफा

कोलकाता। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के भीतर आंतरिक संकट और बगावत का दौर गहराता जा रहा है। राज्य की कई महत्वपूर्ण नगरपालिकाओं में पार्षदों के इस्तीफों की बाढ़ आ गई है और अब तक पार्टी छोड़ने वाले पार्षदों का आंकड़ा 100 के पार पहुंच चुका है। इस बड़ी टूट के बीच असंतुष्ट पार्षद अब खुलकर पार्टी नेतृत्व और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर मॉडल पर सवाल उठाने लगे हैं। इसके साथ ही राजनीतिक गलियारों में कई टीएमसी सांसदों और विधायकों के भी पाला बदलने की अटकलें तेज हैं, जिससे राज्य की सत्ता संरचना पूरी तरह चरमराती दिख रही है।

इस विद्रोह का सबसे बड़ा असर खुद अभिषेक बनर्जी के संसदीय क्षेत्र में आने वाली डायमंड हार्बर नगरपालिका में देखने को मिला, जहां कुल 16 बोर्ड सदस्यों में से 8 ने एक साथ अपने पदों से इस्तीफा दे दिया है। नगरपालिका के अध्यक्ष प्रणब दास ने भी स्थिति की गंभीरता को स्वीकार करते हुए माना है कि बोर्ड कभी भी भंग हो सकता है। इस्तीफा देने वाले पार्षदों का गंभीर आरोप है कि विकास के दावों वाले डायमंड हार्बर मॉडल की आड़ में पूरे इलाके में अराजकता फैल रही थी। पार्षदों का कहना है कि जब भी उन्होंने स्थानीय स्तर पर फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की, उन्हें पुलिसिया उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। वार्ड नंबर 7 से इस्तीफा देने वाले पार्षद तमल हल्दर के अनुसार, स्थानीय प्रशासन और नगरपालिका के कामकाज पर पुलिस का जरूरत से ज्यादा नियंत्रण था, जो पूरी तरह ऊपरी आदेशों पर काम कर रही थी। इस प्रशासनिक तानाशाही की शिकायत कई बार शीर्ष नेतृत्व से की गई, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।

पार्टी के भीतर यह असंतोष केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है, बल्कि कई अन्य नगरपालिकाओं में भी सामूहिक रूप से सामने आया है। आंकड़ों के मुताबिक, उत्तर बैरकपुर नगरपालिका के 20 मौजूदा पार्षदों में से चेयरमैन सहित 15 ने पद छोड़ दिया है। गरुलीया में 21 में से 18, हलीशहर में 23 में से 16 और कांचरापाड़ा में 24 में से 14 पार्षदों ने इस्तीफा दे दिया है। टीएमसी को सबसे करारा झटका भाटपारा में लगा है, जहां 35 में से 30 पार्षदों ने एक साथ सामूहिक इस्तीफा सौंप दिया है। इसके अलावा कांथी नगरपालिका में भी 17 में से 12 पार्षद पार्टी से पीछे हट चुके हैं।

राज्य सरकार के आधिकारिक सूत्रों के अनुसार, पश्चिम बंगाल नगरपालिका अधिनियम 1993 के तहत यदि किसी बोर्ड के दो-तिहाई से अधिक पार्षद इस्तीफा दे देते हैं, तो सरकार के पास उस बोर्ड को भंग करने की शक्ति होती है। ऐसी आपात स्थिति में नगरपालिकाओं का दैनिक कामकाज सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार द्वारा आगामी चुनाव होने तक किसी विशेष प्रशासक की नियुक्ति की जा सकती है। आंतरिक कलह और जन प्रतिनिधियों के इस सामूहिक विद्रोह ने चुनाव हार चुकी तृणमूल कांग्रेस की मुश्किलें बेहद बढ़ा दी हैं।

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