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शातिर सत्ताधीशों की सियासत का शिकार गोवंश

भाजपा शासित राजस्थान में जैसलमेर में घटी एक अत्यंत संवेदनशील घटना ने देश के गौ भक्त समाज को झकझोर कर रख दिया। यहां के डंपिंग यार्ड में 500 से अधिक गायों के सड़े-गले शव और हड्डियां खुले में बिखरे हुए मिले पाये गये। इस जगह का दृश्य इतना भयावह व भीषण दुर्गंध पूर्ण था कि स्थानीय लोग और गौ-प्रेमी स्वभाविक रूप से इसे देखकर क्रोधित व विचलित हो गए। बताया जाता है कि इनमें से कई गायों की मौत ज़हरीला कचरा या पॉलीथिन खाने से हुई। जबकि इनमें बड़ी संख्या में ऐसी गायों के शव भी थे जिन्हें मृत पशुओं का निस्तारण करने वाले ठेकेदार ने इसी डंपिंग यार्ड में लाकर फेंक दिया था। भाजपा शासित राजस्थान में घटी इस दर्दनाक व शर्मनाक घटना ने सरकार व निजी गौ रक्ष संगठनों के गौ-रक्षा के दावों और प्रशासनिक व्यवस्थाओं दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्योंकि यह केवल किसी की लापरवाही मात्र का नहीं बल्कि मानवता और हिन्दू आस्था दोनों के ही अपमान से जुड़ा मामला है।

ग़ौरतलब है कि पिछले एक दशक से देश में मुस्लिम समाज के सैकड़ों लोगों को गौरक्षा के नाम पर मारा जा चुका है। मुहम्मद अख़लाक़ और पहलू ख़ान जैसे अनेक लोगों की हत्या की ख़बरें देश विदेश के मीडिया में प्रसारित होकर देश की बदनामी का कारण भी बन चुकी है। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2016-17 में इन्हीं कथित गौरक्षकों के संदर्भ में यह कह भी चुके हैं कि गोरक्षा के नाम पर गुंडागर्दी करने वाले 70-80 प्रतिशत लोग फ़र्ज़ी हैं, जो रात में ग़ैर-क़ानूनी काम करते हैं और दिन में गोरक्षक का चोला पहन लेते हैं। मोदी ने कहा था कि उन्हें उन लोगों पर बहुत ग़ुस्सा आता है जो गोरक्षा के नाम पर अपनी दुकानें खोलकर बैठ गए हैं। उन्होंने राज्य सरकारों से ऐसे लोगों की पृष्ठभूमि की जांच करने और उनका डोज़ियर तैयार करने को भी कहा था। उस समय मोदी ने गोरक्षा के नाम पर हो रही हत्याओं की कड़ी निंदा भी की थी। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि गौ भक्ति के नाम पर लोगों की हत्या स्वीकार्य नहीं है। किसी को भी क़ानून अपने हाथ में लेने का हक़ नहीं है। उन्होंने असली गोरक्षकों को सलाह दी थी कि उन्हें गायों को प्लास्टिक खाने से बचाने के लिए काम करना चाहिए, क्योंकि कटने से ज़्यादा गायें प्लास्टिक और कचरा खाने से मरती हैं। 

                 गाय को लेकर बने देश के इसी तनावपूर्ण वातावरण में देश के मुस्लिम समाज ने उच्च स्तर पर कहीं फ़तवों से तो कहीं दिशा निर्देश जारी कर भारत के मुसलमानों को यह हिदायत जारी की है कि वे गाय की हत्या व गोमांस भक्षण यदि कहीं किया जा रहा है तो उससे पूरी तरह बाज़ आयें। यहाँ तक कि देश में गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग को लेकर अनेक प्रमुख मुस्लिम उलेमाओं और संगठनों ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की वकालत की है। इनके अनुसार ऐसा करने से देश में नफ़रत और मॉब लिंचिंग जैसी घटनाओं पर रोक लगेगी, और बहुसंख्यक समाज की आस्था का सम्मान होगा। कई इस्लामी विद्वानों और मौलानाओं का तो स्पष्ट मत है कि इस्लाम में गौ मांस खाने को सख़्ती से मना किया गया है। पैग़ंबर मोहम्मद साहब के कथनों का हवाला देते हुए मौलानाओं द्वारा यह बताया गया है कि गाय के मांस में बीमारी है और उसके दूध में शिफ़ा अर्थात राहत है। अनेक मुस्लिम संगठनों ने भी गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग उठाई है, ताकि गाय को लेकर होने वाली सांप्रदायिक राजनीति पर पूर्ण विराम लग सके। 

परन्तु हिंदूवादी संगठनों द्वारा गौ हत्या को लेकर केवल मुसलमानों पर निशाना साधने वालों को इसी सिक्के के दूसरे पहलू को समझना भी ज़रूरी है। इस सन्दर्भ में पिछले दिनों हुए असम चुनावों के दौरान राज्य के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का वह बयान क़ाबिल -ए -ग़ौर है जिसमें उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार लोगों के घर के अंदर गोमांस खाने अर्थात निजी खान-पान पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाती। उन्हें इसे खाने से कोई मनाही नहीं है, लेकिन इसे सार्वजनिक तौर पर खाने के बजाय अपने घरों के अंदर खाना चाहिए। लेकिन सार्वजनिक रूप से या धार्मिक स्थलों के आसपास इसका सेवन क़ानूनन और सामाजिक भावनाओं के खि़लाफ़ है। सवाल यह है कि जब गोवध होगा तभी तो गोमांस घरों में भी खाया जा सकेगा ? दूसरे यह कि केवल मुसलमान ही नहीं बल्कि अन्य धर्मों व जातियों के लोगों द्वारा भी बड़ी संख्या में गौमांस भक्षण किया जाता है तभी वोट बैंक के मद्देनज़र यह बयान मुख्यमंत्री द्वारा दिया गया। इसी तरह अप्रैल 2017 में केरल के मल्लापुरम लोकसभा उपचुनाव के दौरान भाजपा उम्मीदवार एन. श्रीप्रकाश ने मतदाताओं से वादा किया था कि यदि वे चुनाव जीतते हैं तो क्षेत्र में अच्छी गुणवत्ता वाले बीफ़ की आपूर्ति सुनिश्चित करेंगे और साफ़-सुथरे बूचड़ख़ाने खुलवाएंगे। जबकि अभी पिछले दिनों बंगाल में सत्ता में आई भाजपा सरकार की मंत्री अग्निमित्रा पॉल ने कहा कि पश्चिम बंगाल में क़ानूनन केवल उसी गोवंश (गाय) का वध नहीं किया जा सकता जिसकी उम्र 14 वर्ष से कम हो। इस कुतर्क के अनुसार क्या 14 वर्ष से ऊपर की गाय गौ माता  की श्रेणी से बाहर हो जाती है? 

भारत सरकार में संसदीय कार्य व अल्पसंख्यक कार्य मंत्री किरेन रिजिजू का 2015 में दिया गया वह बयान पूरे देश को याद ही होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि मैं अरुणाचल प्रदेश से हूँ और गोमांस खाता हूँ। क्या कोई मुझे ऐसा करने से रोक सकता है? उनका तर्क था कि भारत एक लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष देश है। पूर्वाेत्तर के राज्यों में बहुत से लोग बीफ़ खाते हैं और किसी के खान-पान की आदतों या जीवनशैली को उन पर थोपा नहीं जा सकता। साथ ही उसी समय उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि भारत विविधताओं का देश है। जहां हिंदू बहुसंख्यक हैं, वहां उनकी आस्था और भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। गोरक्षा पर राजनीति करने वाली सरकार किरेन रिजिजू जैसे गौ मांस भक्षक को मंत्री बनाकर किस आधार पर गोरक्षा की बात कर सकती है ? उधर यही भारतीय जनता पार्टी इलेक्टोरल बांड के ज़रिए भारत की सबसे बड़ी बीफ़ निर्यातक कंपनियों से लगभग प्रत्येक चुनावों में करोड़ों का चंदा वसूलती है। इसी सत्ता संरक्षण की वजह से 2014 के बाद यानी भाजपा के शासनकाल में भारत का कुल बीफ़ निर्यात काफ़ी बढ़ चुका है। परन्तु स्वयंभू गोरक्षकों को गोहत्या को बढ़ावा देने व इसके पक्ष में तर्क देने वालों से कोई शिकायत नहीं है बल्कि आश्चर्य है कि इनकी सारी दुश्मनी व शिकायत केवल मुसलमानों से ही है ? समझा जा सकता है कि गोवंश की सुरक्षा किसी धर्म जाति से जुड़ा विषय नहीं बल्कि वास्तव में गोवंश शातिर सत्ताधीशों की सियासत का शिकार है।

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