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सिद्धारमैया जाएंगे राज्यसभा, डीके शिवकुमार बन सकते हैं मुख्यमंत्री

बेंगलुरु। कर्नाटक कांग्रेस में लंबे समय से जारी सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार गुट की खींचतान अब एक निश्चित समाधान की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पार्टी आलाकमान ने राज्य में सत्ता संतुलन और नेतृत्व परिवर्तन को लेकर एक नया फॉर्मूला तैयार कर लिया है। इस समझौते के तहत मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को राज्यसभा की सुरक्षित सीट देकर राष्ट्रीय राजनीति में भेजा जाएगा और संगठन में बड़ी भूमिका सौंपी जाएगी। इसके साथ ही, उनके बेटे डॉ. यतींद्र सिद्धारमैया को राज्य की नई सरकार के मंत्रिमंडल में शामिल कर मंत्री पद दिया जा सकता है। इस व्यवस्था के बाद वर्तमान उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता पूरी तरह साफ हो जाएगा।

इस बड़े सियासी बदलाव को अमलीजामा पहनाने के लिए दिल्ली में आलाकमान की एक मैराथन बैठक आयोजित की गई थी। इस उच्चस्तरीय बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार, महासचिव केसी वेणुगोपाल और कर्नाटक प्रभारी रणदीप सुरजेवाला ने करीब सात घंटे तक राज्य के मौजूदा राजनीतिक हालातों और गतिरोध को समाप्त करने पर गहन चर्चा की। हालांकि, सार्वजनिक तौर पर पार्टी नेताओं ने किसी भी तरह के नेतृत्व परिवर्तन की बात से इनकार किया है, लेकिन अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि सिद्धारमैया जल्द ही अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं।पार्टी नेतृत्व ने सिद्धारमैया को स्पष्ट कर दिया है कि देश के सबसे सम्मानित और बड़े पिछड़ा वर्ग चेहरों में से एक होने के नाते आगामी 2029 के लोकसभा चुनावों के मद्देनजर केंद्र की राजनीति में उनकी मौजूदगी बेहद जरूरी है। सूत्रों का कहना है कि वे इसी सप्ताह गुरुवार को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे सकते हैं। इस समझौते के तहत सत्ता के सुचारू हस्तांतरण के लिए डीके शिवकुमार भी राज्य कांग्रेस अध्यक्ष (केपीसीसी) पद छोड़ देंगे। उनकी जगह अनुसूचित जनजाति समुदाय से आने वाले सतीश जारकीहोली को नया प्रदेश अध्यक्ष बनाया जा सकता है, जिससे राज्य के जातीय और क्षेत्रीय समीकरणों को साधा जा सके। इस नए राजनीतिक समझौते से कर्नाटक सरकार और संगठन के भीतर का गतिरोध पूरी तरह समाप्त होने की उम्मीद है। सिद्धारमैया के दिल्ली स्थानांतरित होने और डीके शिवकुमार के कमान संभालने से जहां एक ओर राज्य में नया नेतृत्व स्थापित होगा, वहीं दूसरी ओर दोनों शीर्ष नेताओं की आकांक्षाओं को संतुलित कर पार्टी के भीतर असंतोष को भी पूरी तरह खत्म किया जा सकेगा।

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