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पहलगाम पर जन-तंत्र ’सब मौन?’

14 फरवरी 2019 के पुलवामा हमले में आरडीएक्स लाने वाला मुख्य हैंडलर (आतंकवादी) की गिरफ्तारी अभी तक नहीं हो पाई है। फलतः हमले की पीड़ा अभी पूरी तरह भरी भी नहीं थी कि, 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम स्थित ‘‘बायसरन घाटी’’ में हुई आतंकी घटना ने देश की आत्मा को एक बार फिर झकझोर दिया। यह हमला केवल निर्दोष नागरिकों की हत्या नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता, अखंडता और सांप्रदायिक सौहार्द पर सीधा प्रहार था। धर्म पूछकर 26 निर्दोषों जिसमें 24 हिंदू, एक ईसाई व एक स्थानीय मुसलमान शामिल थे, की नृशंस हत्या ने न केवल इंसानियत को शर्मसार किया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया कि आतंकवाद का असली चेहरा कितना क्रूर और विभाजनकारी है।

सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया।

घटना के 24 घंटे के भीतर ही केंद्र सरकार ने “जीरो टॉलरेंस नीति” के तहत कई कठोर कदम उठाए-

सिंधु जल संधि का निलंबन,

अटारी-वाघा सीमा बंद,

पाकिस्तानी नागरिकों के प्रवेश पर रोक,

वीजा निरस्त कर 48 घंटे में देश छोड़ने का निर्देश,

राजनयिक स्तर पर निष्कासन।

ये कदम “आग का जवाब आग से” देने की नीति का संकेत थे, जिनसे यह संदेश गया कि भारत अब आतंकवाद के प्रति “ढुलमुल रवैया” नहीं अपनाएगा।

‘‘ऑपरेशन महादेव और सिंदूर’’।

आंतरिक स्तर पर, आतंकियों की खोज के लिए “ऑपरेशन महादेव” और बाहरी मोर्चे पर ‘‘प्रहार’’ के लिए “ऑपरेशन सिंदूर” चलाए गए। जहाँ एक ओर घटना के लिए जिम्मेदार मास्टरमाइंड सुलेमान शाह (हाशिम मूसा) सहित तीन आतंकी मार डाले गए। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान और ‘‘पीओके’’ में 9 बड़े आतंकी ठिकानों को नष्ट कर पाकिस्तान को माकूल जवाब देकर सबक सिखाया गया। लेकिन यहाँ प्रश्न उठता है, क्या यह कार्रवाई “नौ दिन चले अढ़ाई कोस” जैसी तो नहीं रही? क्योंकि बाद के महीनों में भी घटी घटनाएँ इस बात का संकेत देती हैं कि आतंकवाद की जड़ें अभी पूरी तरह नहीं कटीं।

इस प्रकार ‘‘ऑपरेशन सिंदूर’’ के द्वारा आग लगाकर तमाशा देखने वाले पाकिस्तान को ‘‘घुटने टेकने’’ के लिए मजबूर कर दिया गया। ऐसी स्थिति में जहां ‘‘मजबूर पाकिस्तान’’ से ‘‘पीओके’’ वापिस लेने के लिए ‘‘मजबूत भारत’’ दबाव डालकर फायदा उठा सकता था।

‘‘मोदी ट्रंप को जवाब नहीं दे पाए’’।

भारत-पाकिस्तान के बीच अचानक युद्ध विराम की घोषणा अमेरिकन राष्ट्रपति, 5.33 बजे, इसके तुरंत बाद अमेरिका के विदेश मंत्री ने फिर पाकिस्तान के विदेश मंत्री 5.38 को की। वहीं भारत ने उक्त घोषणाओं के बाद 6.30 अर्थात लगभग 27 मिनट बाद घोषणा की। द्विपक्षीय युद्ध विराम के भारत के दावा के विपरीत अमेरिका के युद्ध विराम करवाने के दावे को ट्रम्प द्वारा 27 मिनट पूर्व की गई घोषणा से बल मिलता है? जहां ट्रम्प ने यह श्रेय लेने का एक बार नहीं लगभग 90 से अधिक बार दावा किया। वहीं भारत की ओर से विदेश मंत्रालय ने इस दावे का खंडन किया। अमेरिकन राष्ट्रपति ट्रंप यह कथनानुसार प्रधानमंत्री मोदी पर टैरिफ दबाव को हथकंडा बनाकर युद्ध विराम कराया। वहीं प्रधानमंत्री एक बार भी ट्रंप का नाम लेकर अमेरिका की मध्यस्थता का स्पष्ट खंडन नहीं कर पाए। जबकि प्रधानमंत्री मोदी की प्रेसिडेंट ट्रंप से इन 12 महीने में कम से कम तीन बार टेलीफोन पर चर्चा और चार बार सोशल मीडिया एक्स ट्वीट किया जिसमें हर बार उन्होंने ट्रंप को माय फ्रेंड ट्रंप विभिन्न कारणों से बधाइयां दी।

अनुत्तरित प्रश्नः।

1.‘‘सुरक्षा चूक की जिम्मेदारी व जवाबदेही’’।

इतने संवेदनशील पर्यटन स्थल पर आतंकी कैसे पहुँचे?

क्या खुफिया तंत्र “आँखों पर पट्टी बाँधकर बैठा था” या संकेतों को नजरअंदाज किया गया?

इस सुरक्षा असफलता पर सांप जाने के बाद लकीर पीटने के अलावा क्या कार्रवाई की गई?

2.‘‘लोकल नेटवर्क की भूमिका’’।

एलओसी पार कर 100-120 किमी तक घुसपैठ और स्थानीय सहयोग। यह केवल बाहरी हमला नहीं, बल्कि अंदरूनी कमजोरी का भी संकेत है। क्या इस नेटवर्क की पूरी सच्चाई सामने आई?

3 ‘‘ऑपरेशन सिंदूर की वास्तविक सफलता’’।

क्या यह केवल “तुरंत संतोष” था या दीर्घकालिक समाधान?

ऑपरेशन सिंदूर चालू आहे, स्थगित या समाप्त। आप स्वतंत्र है अपने अनुसार निष्कर्ष निकालने के लिए ।

4 ‘‘पीड़ित परिवारों का न्याय’’।

मुआवजा मिला, लेकिन क्या नौकरी सहित अन्य वादे पूरे हुए?

“जख्म पर मरहम” पर “जख्म भरना” दोनों में फर्क होता है।

‘सांप निकल गया, लकीर पीटते रह गए?’

विदेश नीतिः अवसर या चूक?

‘‘ऑपरेशन सिंदूर’’ के बाद जो स्थिति बनी, उसमें भारत के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत दबाव बनाने का स्वर्षित अवसर था। लेकिन युद्धविराम की घोषणा और उसके श्रेय को लेकर उठे सवाल यह संकेत देते हैं कि “आधी छोड़ पूरी को धावे, आधी रहे न पूरी पावे” जैसी स्थिति बन गई। एक ओर भारत ने वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित करवाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाएं, जो असफल हो गये। 59 सदस्य सर्वदलीय संसदीय प्रतिनिधि मंडल 7 डेलिगेशन के रूप में 32 राष्ट्रों व यूरोपीय संघ में भेजा जाकर पाकिस्तान जनित प्रायोजित पहलगाम नृशंस आतंकी घटना के ‘‘डोजियर’’ प्रस्तुत किए गए। यद्यपि दुनिया भर से उक्त आतंकी घटना की कड़ी आलोचना की गई व श्रंद्धाजलि दी गई। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, यूरोपीय संघ, एससीओ, क्वाड़, एफएटीएफ, यूएससीआईआरएफ आदि संगठनों ने हमले की निंदा की। तथापि ओआईसी ने बयान जारी कर भारत के मुसलमानों के खिलाफ नफरत व हिंसा पर चिंता जतायी। वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान इन 12 महीनों में अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर पाकिस्तान ने अपनी स्थिति में इतना बदलाव लाया कि ईरान-अमेरिका युद्ध से उत्पन्न विश्व के तनाव को शांत करने के लिए दोनों देशों के बीच युद्ध विराम करवाने में एक महत्वपूर्ण ‘‘मध्यस्थ’’ की भूमिका अदा कर ‘‘शांति दूत’’ बनकर ‘‘नोबेल पुरस्कार’’ पाने का दावा तक कर डाला। जो भूमिका वास्तव में भारत को अदा करनी चाहिए थी, क्योंकि स्थिति उससे ज्यादा अनुकुल थी। लेकिन यहां हमारी विदेश नीति की असफलता ने भारत से उक्त भूमिका को छीन लिया, जिससे भारत व मोदी वास्तव में विश्व गुरु बन सकते थे।

क्या हमारी कूटनीति “ढाक के तीन पात” साबित हुई? आवश्यकता है एक ऐसी रणनीति की जो केवल प्रतिक्रिया न हो, बल्कि पूर्व-नियोजित, दूरदर्शी और निर्णायक हो।

निष्कर्षः-

पहलगाम की पहली बरसी केवल श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी समय है। प्रधानमंत्री द्वारा श्रद्धांजलि देना सम्मानजनक है, लेकिन “सवालों से मुंह मोड़ना” समाधान नहीं। लोकतंत्र में सरकार की जवाबदेही ही उसकी सबसे बड़ी ताकत होती है। यदि इन प्रश्नों के उत्तर नहीं मिले, तो यह मानने में संकोच नहीं होना चाहिए कि कहीं न कहीं “जनतंत्र की आवाज धीमी पड़ गई है”।

अंतिम बात।

शहीदों की स्मृति केवल शब्दों से नहीं, बल्कि ठोस नीति, पारदर्शिता और जवाबदेही से जीवित रहती है। वरना इतिहास यही कहेगा,-हमने सीखा कुछ नहीं, और समय ने हमें सिखाना छोड़ दिया।”


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