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प्रधानमंत्री ने भारत नवीकरणीय ऊर्जा शिखर सम्मेलन एवं एक्सपो 2026 का किया उद्घाटन

 स्वच्छ ऊर्जा के वैश्विक नेतृत्व की ओर भारत की निर्णायक उड़ान,निवेश, नवाचार और तकनीकी आत्मनिर्भरता के त्रिकोण से विकसित भारत का ऊर्जा संकल्प, वैश्विक सहयोग को नई दिशा देने की तैयारी ऊर्जा किसी भी राष्ट्र की आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विकास और सामाजिक समृद्धि का आधार होती है। आधुनिक युग में किसी देश की विकास क्षमता का आकलन केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद या औद्योगिक उत्पादन से नहीं, बल्कि इस बात से भी किया जाता है कि वह अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं को किस सीमा तक सुरक्षित, सुलभ और पर्यावरण के अनुकूल बना सकता है। जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव, जीवाश्म ईंधन की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितताओं ने दुनिया को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों की ओर गंभीरता से सोचने के लिए विवश किया है। ऐसे समय में भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा को अपनी विकास नीति और ऊर्जा सुरक्षा का प्रमुख आधार बनाया है। इसी दिशा में नई दिल्ली के भारत मंडपम में 2 से 5 नवंबर 2026 तक आयोजित भारत नवीकरणीय ऊर्जा शिखर सम्मेलन एवं एक्सपो 2026 महत्त्वपूर्ण वैश्विक पहल के रूप में सामने आया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2 नवंबर को इस चार दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। ‘निवेश करें, नवाचार करें, प्रेरित करें’ इसकी केंद्रीय थीम है। यह आयोजन भारत की उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखने के साथ स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश, तकनीकी साझेदारी और औद्योगिक विकास की नई संभावनाएँ खोलने का मंच बन रहा है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने आज के आधिकारिक वक्तव्य में भारत के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन की गति और सौर ऊर्जा की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया है। प्रधानमंत्री ने कहा, “भारत का स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन गति पकड़ रहा है और देश की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने में सौर ऊर्जा की भूमिका बढ़ रही है।” उन्होंने छतों पर सौर ऊर्जा संयंत्रों के विस्तार, ऊर्जा भंडारण और पारेषण में निवेश के महत्त्व को भी रेखांकित किया। प्रधानमंत्री के अनुसार यह परिवर्तन बिजली के बिल कम करने, रोजगार के अवसर पैदा करने और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने में सहायक है। उन्होंने यह टिप्पणी केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी और माइक ब्लूमबर्ग के उस आलेख को साझा करते हुए की, जिसमें भारत की सौर ऊर्जा यात्रा और स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र की संभावनाओं का उल्लेख है। यह कथन भारत की ऊर्जा नीति के तीन महत्त्वपूर्ण पक्षों को सामने लाता है। पहला, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार; दूसरा, आम नागरिकों को उसका लाभ; और तीसरा, ऊर्जा क्षेत्र में निवेश तथा रोजगार के अवसरों का निर्माण।

वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भागीदारी भारत नवीकरणीय ऊर्जा शिखर सम्मेलन की व्यापकता इसकी अंतरराष्ट्रीय भागीदारी से स्पष्ट होती है। इसमें 130 से अधिक देशों के प्रतिनिधियों, 40 से अधिक मंत्रियों, नीति-निर्माताओं, निवेशकों, वित्तीय संस्थानों और उद्योग जगत के प्रमुख व्यक्तियों की भागीदारी हो रही है। ऑस्ट्रेलिया, डेनमार्क, यूरोपीय संघ, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड, नॉर्वे, स्वीडन और ब्रिटेन भागीदार देशों के रूप में शामिल हैं। भारत के 13 राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश आंध्र प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, दिल्ली, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल अपनी ऊर्जा क्षमता, निवेश संभावनाओं तथा विनिर्माण संबंधी उपलब्धियों को प्रस्तुत कर रहे हैं। एक्सपो में 400 से अधिक प्रदर्शक सौर एवं पवन ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन, ऊर्जा भंडारण और अन्य उभरती प्रौद्योगिकियों का प्रदर्शन कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि भारत स्वच्छ ऊर्जा को केवल पर्यावरणीय आवश्यकता नहीं, बल्कि भविष्य के उद्योग और वैश्विक आर्थिक सहयोग के बड़े क्षेत्र के रूप में देख रहा है।

308 गीगावाट से 500 गीगावाट तक का लक्ष्य - -झभारत की नवीकरणीय ऊर्जा यात्रा को समझने के लिए गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित विद्युत क्षमता के आँकड़े महत्त्वपूर्ण हैं। नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के अनुसार देश की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित विद्युत क्षमता 308 गीगावाट तक पहुँच चुकी है। भारत ने वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित क्षमता हासिल करने का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए वर्ष 2027 से 2030 के बीच लगभग 220 अरब अमेरिकी डॉलर के निवेश की आवश्यकता का अनुमान है। जुलाई 2024 से जून 2026 के बीच भारत के नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में 63.7 अरब अमेरिकी डॉलर का निवेश हुआ है। भारत नवीकरणीय ऊर्जा और सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता में विश्व में तीसरे तथा पवन ऊर्जा क्षमता में चौथे स्थान पर है। ये आँकड़े भारत की प्रगति को रेखांकित करते हैं, परंतु भविष्य की चुनौती इससे कहीं बड़ी है। बढ़ती बिजली माँग, उद्योगों की आवश्यकताओं और आधुनिक तकनीकी ढाँचे के विस्तार के अनुरूप उत्पादन तथा वितरण व्यवस्था को मजबूत करना होगा।

सौर ऊर्जा से घर-घर तक विकास का लाभ - -झप्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना ने सौर ऊर्जा को आम परिवारों तक पहुँचाने की दिशा में नई संभावनाएँ पैदा की हैं। घरों की छतों पर सौर संयंत्र स्थापित होने से उपभोक्ता अपनी बिजली की आवश्यकता का एक हिस्सा स्वयं पूरा कर सकते हैं। इससे बिजली बिल में राहत के साथ अतिरिक्त ऊर्जा उत्पादन की संभावना भी बढ़ती है। प्रधानमंत्री ने अपने आधिकारिक वक्तव्य में रूफटॉप सौर ऊर्जा के विस्तार को विशेष महत्त्व दिया है। यह पहल ऊर्जा उत्पादन के पारंपरिक केंद्रीकृत मॉडल से आगे बढ़कर नागरिकों को ऊर्जा व्यवस्था का सहभागी बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण है। इसी प्रकार पीएम-कुसुम योजना किसानों को सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई और कृषि उपयोग के लिए प्रोत्साहित करती है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यदि किसान अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए सौर संसाधनों का उपयोग बढ़ाते हैं, तो इससे कृषि लागत घटाने, सिंचाई व्यवस्था को अधिक सुविधाजनक बनाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। सौर ऊर्जा का वास्तविक सामाजिक प्रभाव तभी दिखाई देगा, जब छोटे किसानों, मध्यम वर्गीय परिवारों और ग्रामीण क्षेत्रों तक इसका लाभ सहज रूप से पहुँचे।

ऊर्जा भंडारण और पारेषण की चुनौती - - झसौर और पवन ऊर्जा की उपलब्धता प्राकृतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है। सूर्यास्त के बाद सौर ऊर्जा उत्पादन बंद हो जाता है और हवा की गति में परिवर्तन से पवन ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होता है। इसलिए केवल उत्पादन क्षमता बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। ऊर्जा को संग्रहित करने और आवश्यकता के समय उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है। बैटरी ऊर्जा भंडारण, पम्प्ड स्टोरेज परियोजनाएँ और आधुनिक विद्युत पारेषण नेटवर्क इस दिशा में निर्णायक भूमिका निभाएँगे। प्रधानमंत्री ने भी ऊर्जा भंडारण और पारेषण में निवेश को स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन का महत्त्वपूर्ण आधार बताया है। भारत को ऐसे विद्युत ग्रिड विकसित करने होंगे, जो अलग-अलग राज्यों में उत्पादित सौर और पवन ऊर्जा को आवश्यकता वाले क्षेत्रों तक प्रभावी ढंग से पहुँचा सकें। इसके लिए तकनीकी उन्नयन, निवेश, भूमि उपलब्धता और परियोजनाओं के समयबद्ध क्रियान्वयन पर ध्यान देना होगा। ऊर्जा भंडारण की लागत कम करना भी एक बड़ी प्राथमिकता है।

हरित हाइड्रोजन से औद्योगिक परिवर्तन

भारत नवीकरणीय ऊर्जा सम्मेलन के साथ अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन की नौवीं सभा और हरित हाइड्रोजन पर चौथा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन भी आयोजित किया जा रहा है। इन तीनों आयोजनों का एक मंच पर आना भारत की व्यापक ऊर्जा दृष्टि को दर्शाता है। हरित हाइड्रोजन भविष्य में इस्पात, उर्वरक, रसायन, भारी परिवहन और अन्य ऊर्जा-गहन उद्योगों के लिए स्वच्छ ईंधन का विकल्प बन सकता है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन के माध्यम से भारत इस क्षेत्र में उत्पादन, तकनीकी विकास और निवेश की संभावनाएँ तलाश रहा है। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा की पर्याप्त उपलब्धता, इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण, भंडारण और परिवहन की व्यवस्था विकसित करनी होगी। यदि भारत इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी उत्पादन लागत हासिल कर लेता है, तो घरेलू उद्योगों के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी नए अवसर पैदा हो सकते हैं।

तकनीकी आत्मनिर्भरता और रोजगार का नया आधार 

ऊर्जा परिवर्तन की सफलता के लिए घरेलू विनिर्माण क्षमता का विस्तार अनिवार्य है। सौर पैनल, बैटरी, इनवर्टर, पवन टरबाइन, इलेक्ट्रोलाइजर और ऊर्जा नियंत्रण प्रणालियों के निर्माण में भारत को अपनी तकनीकी क्षमता बढ़ानी होगी। केवल आयातित उपकरणों के सहारे दीर्घकालीन ऊर्जा आत्मनिर्भरता संभव नहीं है। अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप और उद्योगों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना होगा। सम्मेलन में आयोजित तकनीकी प्रदर्शनियों, उद्यमी संवादों और नवाचार संबंधी गतिविधियों से नए विचारों को औद्योगिक परियोजनाओं में बदलने का अवसर मिलेगा। स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में इंजीनियरों, तकनीशियनों, अनुसंधानकर्ताओं और कुशल श्रमिकों के लिए रोजगार की नई संभावनाएँ भी विकसित होंगी। इस दृष्टि से कौशल विकास और प्रशिक्षण को ऊर्जा नीति का अभिन्न हिस्सा बनाना आवश्यक है।

वैश्विक दक्षिण के लिए सहयोग का अवसर - -झ स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन केवल विकसित अर्थव्यवस्थाओं का विषय नहीं है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के अनेक विकासशील देश ऊर्जा की बढ़ती माँग और वित्तीय संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं। भारत का अनुभव इन देशों के लिए उपयोगी हो सकता है। अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन के माध्यम से सौर ऊर्जा के विस्तार, वित्तीय सहयोग और संस्थागत क्षमता निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है। भारत की भूमिका केवल तकनीक और उपकरण उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि विकासशील देशों को उनकी परिस्थितियों के अनुरूप समाधान विकसित करने में भी सहयोग देना चाहिए। इसके लिए वित्तीय संस्थानों, बहुपक्षीय संगठनों और निजी कंपनियों की साझेदारी जरूरी है। स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में तकनीकी सहयोग और निवेश का लाभ व्यापक मानव समुदाय तक पहुँचना चाहिए।

विकसित भारत की ऊर्जा सुरक्षा का संकल्प

भारत की अर्थव्यवस्था का विस्तार, शहरीकरण, डिजिटल सेवाओं का विकास, इलेक्ट्रिक वाहनों का प्रसार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित डेटा केंद्रों की बढ़ती संख्या आने वाले वर्षों में बिजली की माँग को और बढ़ाएगी। इसलिए ऊर्जा नीति में स्वच्छता के साथ विश्वसनीयता और किफायत भी सुनिश्चित करनी होगी। नवीकरणीय ऊर्जा के साथ परमाणु ऊर्जा, जलविद्युत और अन्य गैर-जीवाश्म स्रोतों की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण बनी रहेगी। ऊर्जा उत्पादन के साथ वितरण कंपनियों की आर्थिक स्थिति, विद्युत ग्रिड की क्षमता और उपभोक्ताओं तक निर्बाध बिजली पहुँचाने की व्यवस्था में सुधार करना होगा। केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय तथा निजी क्षेत्र की भागीदारी से ही निर्धारित लक्ष्यों को समय पर पूरा किया जा सकेगा।भारत ने वर्ष 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह लक्ष्य आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करने की दीर्घकालीन प्रतिबद्धता को दर्शाता है। भारत नवीकरणीय ऊर्जा शिखर सम्मेलन एवं एक्सपो 2026 इस दिशा में वैश्विक सहयोग और निवेश को गति देने का अवसर है। इसकी सफलता का वास्तविक पैमाना केवल प्रदर्शित तकनीकों, आयोजित बैठकों या देशों की भागीदारी नहीं होगा, बल्कि यह होगा कि कितनी परियोजनाएँ धरातल पर उतरती हैं, कितना निवेश आता है, कितने रोजगार पैदा होते हैं और आम नागरिकों को स्वच्छ ऊर्जा का कितना लाभ मिलता है। प्रधानमंत्री का संदेश कि भारत का स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन गति पकड़ रहा है, इसी व्यापक बदलाव की ओर संकेत करता है। अब आवश्यकता है कि निवेश, नवाचार और प्रेरणा को ठोस क्रियान्वयन से जोड़ा जाए। भारत यदि अपनी प्राकृतिक संपदा, युवा प्रतिभा, तकनीकी क्षमता और वैश्विक साझेदारी का प्रभावी उपयोग करता है, तो वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने के साथ विश्व के स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन में भी महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। यही विकसित भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता और सतत विकास का मार्ग है।



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