Shopping cart
Your cart empty!
Terms of use dolor sit amet consectetur, adipisicing elit. Recusandae provident ullam aperiam quo ad non corrupti sit vel quam repellat ipsa quod sed, repellendus adipisci, ducimus ea modi odio assumenda.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Do you agree to our terms? Sign up
गर्मियों की भीषण तपिश से इन दिनों पूरा उत्तर भारत झुलस रहा है। सच तो यह है कि प्रचंड गर्मी ने जनजीवन को बेहाल कर दिया है। वास्तव में,ऐसे मौसम में मनुष्य को भोजन से अधिक पानी की आवश्यकता होती है। आखिर जल ही जीवन है, प्राण है। विज्ञान मानता है कि मानव शरीर का अधिकांश भाग भी जल से निर्मित है, किंतु विडंबना यह है कि आज वही पानी बोतलों में कैद होकर बाज़ार की वस्तु बन गया है। आरओ और आधुनिक वाटर फिल्टरों के इस दौर में कभी भारतीय जीवन का अभिन्न हिस्सा रही ‘प्याऊ’ की परंपरा लगभग विलुप्तप्राय हो चुकी है। सरल शब्दों में कहें तो आज अधिकांश घरों में आरओ और आधुनिक वाटर फिल्टरों का उपयोग बढ़ गया है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार अत्यधिक शुद्धिकरण की प्रक्रिया में पानी के कई आवश्यक प्राकृतिक खनिज-जैसे कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटैशियम भी कम हो जाते हैं। इसके विपरीत मिट्टी के घड़े का पानी प्राकृतिक रूप से ठंडा, स्वादिष्ट और अपेक्षाकृत संतुलित माना जाता है। घड़ा पानी को केवल शीतल ही नहीं करता, बल्कि उसकी प्राकृतिक गुणवत्ता को भी काफी हद तक सुरक्षित रखता है। यही कारण है कि भारतीय परंपरा में घड़े का पानी स्वास्थ्य और प्रकृति दोनों के अधिक निकट माना गया है।
पाठक जानते हैं कि प्राचीन भारत में जगह-जगह पानी की प्याऊ लगाना केवल सेवा नहीं, बल्कि लोकधर्म और पुण्य का कार्य माना जाता था। विशेषकर राजस्थान के रेगिस्तानी इलाकों में आज भी कहीं-कहीं यह परंपरा जीवित दिखाई देती है, जहां गंगासागर-अर्थात पीतल या तांबे के नलनुमा पात्र से राहगीरों, पथिकों और थके-हारे यात्रियों को प्रेमपूर्वक पानी पिलाया जाता है। गांवों में खेतों के किनारे पशुओं के लिए ‘खेली’ बनाई जाती थी, कुएं, कुंड और परंपरागत जल-स्रोतों की व्यवस्था रहती थी, किंतु अब ये दृश्य विरले ही दिखाई देते हैं।सच तो यह है कि प्यास बुझाने को पुण्य मानने वाली भारतीय संस्कृति धीरे-धीरे स्मृतियों में सिमटती जा रही है।
भारतीय परंपरा में ‘प्याऊ’ अथवा ‘प्रपा’ सामाजिक संवेदना और मानवीय करुणा का प्रतीक रही है। भीषण गर्मी में राहगीरों और जरूरतमंदों को निःशुल्क शीतल जल उपलब्ध कराना सदियों पुरानी परोपकारी परंपरा थी। भारतीय शास्त्रों विशेषकर भविष्योत्तर पुराण और स्कंद पुराण में ‘प्रपा दान’ अर्थात जलदान को स्वर्णदान और गोदान के समान पुण्यदायी बताया गया है। पाठकों को बताता चलूं कि इसे कई स्थानों पर ‘पौशाला’ भी कहा जाता था। राजा, सेठ-साहूकार, व्यापारी तथा सामान्य लोग चौराहों, बाज़ारों और मार्गों पर प्याऊ लगवाते थे। बुजुर्ग बताते हैं कि कहीं राहगीरों को पानी के साथ गुड़, बताशे या भुने चने भी प्रेमपूर्वक दिए जाते थे। वास्तव में भारतीय संस्कृति में यह परंपरा केवल मनुष्यों तक सीमित नहीं थी। लोग अपने घरों की छतों पर पक्षियों के लिए मिट्टी के सकोरे रखते थे और पेड़ों के नीचे पशुओं के लिए पानी के पात्र भरकर रखते थे। जल-संरक्षण और जीवों के प्रति करुणा भारतीय जीवनशैली का स्वाभाविक हिस्सा थी। इतना ही नहीं, कई स्थानों पर प्याऊ पर पानी पिलाने के लिए विधवा महिलाओं अथवा जरूरतमंद लोगों को नियुक्त किया जाता था और उन्हें सम्मानपूर्वक मानदेय भी दिया जाता था। इस प्रकार से प्याऊ सेवा, संवेदना और रोजगार तीनों का माध्यम थी। आज भी कहीं कहीं रेलवे स्टेशनों पर हमें प्याऊ देखने को मिल जातीं हैं।
सदियों सदियों से उत्तर भारत में वैशाख और ज्येष्ठ के महीनों में राहगीरों की प्यास बुझाने के लिए जल-प्याऊ लगाई जाती रहीं हैं। लोग स्वयं खड़े होकर राह चलते व्यक्तियों को ठंडा पानी या शर्बत पिलाते थे, क्योंकि भारतीय संस्कृति में प्यासे को पानी पिलाना सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। एक समय था जब शहरों में लगभग हर एक-दो किलोमीटर पर पेड़ों की छांव में पानी से भरे मिट्टी के घड़े रखे दिखाई देते थे। राहगीर स्वयं पानी निकालकर पीते और अपनी प्यास बुझाते थे। संपन्न और प्रतिष्ठित लोग गर्मियों में प्याऊ खुलवाते थे, जहां सेवाभावी लोग पुकार लगाते- पानी पी लीजिए, पानी पी लीजिए।आइए शीतल जल पीजिए और मन तथा आत्मा दोनों को तृप्त कीजिए। वास्तव में, यह दृश्य केवल आतिथ्य का ही प्रतीक नहीं था, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा था जिसमें जल को जीवन, धर्म और पुण्य-तीनों का आधार माना गया है।आज से लगभग सत्तर-अस्सी वर्ष पहले तक सेठ-साहूकार धर्म और लोकहित के नाम पर कुएं, बावड़ियां और तालाब खुदवाते थे। जल-संरक्षण समाज की सामूहिक जिम्मेदारी समझी जाती थी। किंतु आधुनिकता और उपभोक्तावादी जीवनशैली के प्रभाव में यह परंपरा धीरे-धीरे समाप्त होती चली गई। अब बाजार में पानी और तरह-तरह के शर्बतों तथा शीतल पेयों की छोटी-बड़ी बोतलें सहज उपलब्ध हैं। घरों की छतों पर मिट्टी के पात्र रखना, पशुओं के लिए पानी भरना, कुओं की सफाई करना-ये सब कभी मई-जून के महीनों में धार्मिक और सांस्कृतिक अनुशासन का हिस्सा हुआ करते थे, किंतु आधुनिक विकास मॉडल ने इस जीवन-दृष्टि को लगभग विस्मृत कर दिया है।
भारतीय संस्कृति में जल का महत्व अत्यंत गहरा और व्यापक रहा है। ऋग्वेद से लेकर पुराणों तक जल को पवित्रता, जीवन और चेतना का प्रतीक माना गया है। नदियों को मां, सरोवरों को तीर्थ और वर्षा को ईश्वर की कृपा समझा गया है। धार्मिक मान्यताओं में जल आत्मिक शुद्धि का माध्यम भी रहा है। यही कारण है कि दान की अनेक परंपराओं में जलदान को सर्वाेच्च स्थान प्राप्त हुआ। सिख धर्म में भी गर्मियों के दिनों में राहगीरों को मीठा शर्बत पिलाने की ‘छबील’ परंपरा इसी मानवीय संवेदना का सुंदर उदाहरण है।
लेकिन विडंबना यह है कि जो देश कभी प्यासे को पानी पिलाने को सबसे बड़ा पुण्य मानता था, वही आज गंभीर जल संकट की ओर बढ़ रहा है। आज के समय में भूजल स्तर निरंतर नीचे जा रहा है। अनेक बड़े शहर गर्मियों में ‘डे-जीरो’ जैसी भयावह चेतावनियों का सामना कर रहे हैं। यह हमारे समय का सबसे बड़ा विरोधाभास है कि सामाजिक रूप से पानी का संकट गहराता जा रहा है, जबकि व्यावसायिक रूप से पानी हर जगह उपलब्ध है। पानी अब सेवा नहीं, व्यापार बनता जा रहा है। हालांकि, यह बात अलग है कि पिछले कुछ वर्षों में जल-संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अनेक गांवों में वर्षा जल संचयन, तालाबों के पुनर्जीवन और पारंपरिक जल-संरचनाओं को पुनर्स्थापित करने के प्रयास हो रहे हैं। यह इस बात का संकेत है कि भारतीय समाज अपनी पुरानी सांस्कृतिक बुद्धिमत्ता की ओर लौटना चाहता है। किंतु उपभोक्तावाद और कारोबार की अंधी दौड़ इस चेतना को बार-बार कमजोर कर देती है।
यदि जल को पुनः जीवन, लोकधर्म और मानवीय संवेदना से जोड़ना है, तो भारतीय परंपरा की जल-संस्कृति को फिर से जीवित करना होगा। केवल जल-संरक्षण की योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि समाज में जल के प्रति सम्मान, करुणा और साझेदारी की भावना भी पुनर्जीवित करनी होगी। जब तक जल केवल बाजार की वस्तु बना रहेगा, तब तक उसकी आत्मा मरती रहेगी। आवश्यकता इस बात की है कि हम आधुनिकता के साथ-साथ अपनी उस सांस्कृतिक विरासत को भी बचाएं, जिसने जल को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का पवित्र आधार माना था।
Leave a Comment