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इंदुमती की कहानी- शिव कुमार शर्मा (लेखक)
किशोरीलाल गोस्वामी द्वारा रचित '" इंदुमती "' (1900) की कहानी को हिंदी की पहली मौलिक कहानी माना जाता है, जो 'सरस्वती' पत्रिका में प्रकाशित हुई थी.अज की सहधर्मिणी इंदुमती की कहानी का रसपान करने से पूर्व, हमें महाराजा अज का परिचय प्राप्त करना होगा, जो प्रभु श्री राम के ही पूर्वज थे। यद्यपि विभिन्न धर्मग्रंथों एवं पुराणों में मतभिन्नता होने के कारण श्री राम की वंशावली का कोई एक सर्वमान्य या सटीक विवरण उपलब्ध नहीं होता है, तथापि रघुवंश के इतिहास में अज का स्थान अत्यंत गौरवशाली है.
यहाँ यह बताना आवश्यक होगा कि विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में रघु और राम के बीच की वंशावली समान रूप से नहीं मिलती और इसी कारण रघु से राम तक की पीढ़ियों की संख्या भी अलग-अलग दिखाई देती है। महर्षि वाल्मीकि की ‘रामायण’ में रघु के बाद अनेक राजाओं का उल्लेख मिलता है और इस वंश-परंपरा के अनुसार राम, रघु की 15वीं पीढ़ी में आते हैं। इसके विपरीत महाकवि कालिदास के ‘रघुवंश’ में दिलीप → रघु → अज → दशरथ → राम का क्रम मिलता है, जिसके अनुसार राम रघु की 4वीं पीढ़ी में हैं। इसी प्रकार ‘विष्णु पुराण’ और ‘श्रीमद्भागवत महापुराण’ की वंश-परंपरा में भी रघु के बाद अज, दशरथ और राम का क्रम मिलता है तथा श्रीमद्भागवत महापुराण के अनुसार भी राम रघु की 4वीं पीढ़ी में आते हैं। अतः अलग-अलग ग्रंथों में वर्णित वंश-परंपराओं को देखते हुए किसी एक संख्या को सभी प्राचीन ग्रंथों पर समान रूप से लागू करना उचित नहीं होगा; प्रत्येक ग्रंथ की अपनी वंश-परंपरा और वर्णन-परंपरा के संदर्भ में ही रघु से राम तक की पीढ़ियों की संख्या को समझना अधिक उचित है।
" इंदुमती " की कहानी और पौराणिक कथाओं के अनुसार, इंदुमती राजा अज की पत्नी, महाराज दशरथ की माता और भगवान श्री राम की दादी थीं। वे वास्तव में हरिणी नाम की एक अप्सरा थीं, जिन्हें एक ऋषि के शाप के कारण पृथ्वी पर विदर्भ के राजा भोज की पुत्री के रूप में जन्म लेना पड़ा था। इंदुमती का विवाह सूर्यवंशी राजा अज से हुआ और उनका वैवाहिक जीवन अत्यंत सुखद और प्रेमपूर्ण था। उनकी मृत्यु की कहानी अत्यंत अनोखी और मार्मिक है; कहा जाता है कि एक बार जब वे अपने महल की छत पर विहार कर रही थीं, तब आकाश मार्ग से गुजरते हुए देवर्षि नारद की वीणा से एक दिव्य पुष्पों की माला उनके ऊपर गिरी। उन दिव्य पुष्पों के स्पर्श मात्र से ही इंदुमती ने अपना शरीर त्याग दिया और शाप मुक्त होकर पुनः स्वर्ग लोक लौट गईं। उनके वियोग में राजा अज इतने दुखी हुए कि उन्होंने भी कुछ समय बाद सरयू नदी में समाधि ले ली. इस कहानी का जिकर कालिदास रचित 'रघुवंशम्' के आठवें सर्ग में इंदुमती की मृत्यु पर राजा अज का विलाप अत्यंत हृदयस्पर्शी है। जब आकाश से गिरी देव-माला के स्पर्श मात्र से रानी इंदुमती के प्राण पखेरू उड़ जाते हैं, तो महाराज अज शोक के सागर में डूब जाते हैं। वे करुण क्रंदन करते हुए कहते हैं कि :
" कुसुमं कृतवान् निमित्तं स यदि त्वामहरद्विधिः खलः।
ननु मारयितुं मृदून्यपि प्रहरत्येव विधिः सचेतनान्॥ "
अर्थ: "यदि उस दुष्ट विधाता (भाग्य) ने फूल को निमित्त बनाकर तुम्हारे प्राण हर लिए हैं, तो यह सिद्ध है कि जब मृत्यु का समय आता है, तब विधाता कोमल अस्त्रों से भी चेतनायुक्त प्राणियों का संहार कर सकता है।
अज कहते हैं कि: हे प्रिये! यदि सुकुमार फूलों का स्पर्श प्राण ले सकता है, तो विधाता के पास मारने के लिए और कौन सा कोमल अस्त्र शेष रह गया है? वे अपनी पत्नी को केवल जीवनसंगिनी ही नहीं, बल्कि 'गृहिणी, सचिवः, सखी और कलाओं की प्रिय शिष्या' कहकर पुकारते हैं, जिसके चले जाने से उनका सब कुछ लुट गया है। अज का यह विलाप एक सम्राट का नहीं, बल्कि एक विरही प्रेमी का है, जहाँ वे अपनी सुकुमार पत्नी के बिना महलों की सुख-सुविधाओं को व्यर्थ मानते हैं और अंततः उसी वियोग में अपने प्राण त्यागने का संकल्प कर लेते हैं।
हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध कवि मैथिलीशरण गुप्त जी ने अपने काव्य में मानवीय संवेदनाओं, विरह और करुणा को अत्यंत मार्मिक अभिव्यक्ति दी है। भारतीय काव्य की विलाप-परंपरा में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की ‘सरोज-स्मृति’ की तरह प्रियजन के वियोग की पीड़ा को शब्द देने वाली अनेक रचनाएँ मिलती हैं। इसी करुण परंपरा में राजा अज का इंदुमती-वियोग भी भारतीय काव्य-संवेदना का अत्यंत मार्मिक प्रसंग है, जहाँ प्रेम, स्मृति और असह्य विरह मिलकर हृदयविदारक करुणा का रूप धारण कर लेते हैं।
प्रस्तुत कविता उसी अज-विलाप की वेदना से प्रेरित एक मर्मस्पर्शी रचना है। इंदुमती के आकस्मिक निधन से अज का संसार एक ही क्षण में सूना हो जाता है; प्रिय के चले जाने के बाद उसके r व्यक्त करता है, जिसके सामने शब्द भी असहाय हो जाते हैं। यह कविता उसी टूटे हुए हृदय की करुण पुकार को स्वर देने का एक विनम्र प्रयास है।
अज का करुण विलाप
प्रिये! ठहर जाओ पल भर को, आँखें तो एक बार खोलो,
सदा हँसने वाली इंदुमती, आज इस तरह मौन न बोलो।
एक कल्पवृक्ष की माला ने, क्या प्राण तुम्हारे हर डाले?
सुकोमल अंगों पर विधाता ने, कैसे ये वज्र चला डाले?
तुम मेरी केवल वधू नहीं, गृहलक्ष्मी और सखी भी थीं,
मेरी एकांत की मंत्रदात्री, कलाओं में प्रिय शिष्या थीं।
निष्ठुर काल ने छीन लिया, मेरा सर्वस्व एक ही पल में,
अब कैसे जिऊँगा मैं जग में, डूबा हूँ शोक के जल में?
यह कंगन, यह हार तुम्हारा, अब मुझे कचोटने आते हैं,
उपवन के ये हंस और कोकिल, मेरी विरह-अग्नि बढ़ाते हैं।
यदि माला ही प्राण हरती है, तो मुझे क्यों न छू जाती है?
क्यों मौत केवल तुमको पाकर, मुझसे दूर भाग जाती है?
हा प्रिये! छोड़ यह मोह मुझे, तुम स्वर्ग सिधारने चली गईं,
मेरी खुशियाँ, मेरी दुनिया, तुम अपने साथ ही ले गईं।
रघुवंश का यह सूना आँगन, अब रो-रोकर तुम्हें बुलाएगा,
पर अज का यह व्याकुल जीवन, अब कभी न धीरज पाएगा।
इस घटना से प्रेरित होकर आधुनिक कवि नागार्जुन ने कालिदास से प्रशन किया है।
कालिदास, सच-सच बतलाना!
इंदुमती के मृत्युशोक से
अज रोया या तुम रोए थे?
कालिदास, सच-सच बतलाना!
शिवजी की तीसरी आँख से
निकली हुई महाज्वाला में
घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम
कामदेव जब भस्म हो गया
रति का क्रंदन सुन आँसू से
तुमने ही तो दृग धोए थे?
कालिदास, सच-सच बतलाना!
रति रोई या तुम रोए थे?
वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका
प्रथम दिवस आषाढ़ मास का
देख गगन में श्याम घन-घटा
विधुर यक्ष का मन जब उचटा
खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर
चित्रकूट से सुभग शिखर पर
उस बेचारे ने भेजा था
जिनके ही द्वारा संदेशा
उन पुष्करावर्त मेघों का
साथी बनकर उड़ने वाले
कालिदास, सच-सच बतलाना!
पर पीड़ा से पूर-पूर हो
थक-थक कर औ' चूर-चूर हो
अमल-धवलगिरि के शिखरों पर
प्रियवर, तुम कब तक सोये थे?
रोया यक्ष कि तुम रोए थे!
कालिदास, सच-सच बतलाना !
नागार्जुन की कालजयी कविता "कालिदास से सच-सच बतलाना" में कवि महाकवि कालिदास की सृजन प्रक्रिया और उनकी संवेदनशीलता को अत्यंत भावुक और आत्मीय प्रश्नों के माध्यम से कुरेदते हैं। इस कविता में नागार्जुन सिर्फ एक कवि से नहीं, बल्कि एक रचनाकार की आत्मा से यह जानना चाहते हैं कि क्या वास्तव में काव्य की रचना कल्पना के सुनहरे महलों में बैठकर होती है, या फिर रचनाकार को खुद वेदना की आग में तपना पड़ता है। नागार्जुन, कालिदास के सामने भावुक होकर सवाल रखते हैं कि जब इन्दुमती के शोक में राजा अज रो रहे थे, तो क्या उस करुण दृश्य को रचते समय सचमुच कालिदास की अपनी आँखें नहीं भीगी थीं? क्या रति का विलाप सुनते समय या मेघदूत के विरही यक्ष की पीड़ा को शब्द देते समय, वह वेदना, वह टीस, वह 'पर-पीड़ा' स्वयं कालिदास के हृदय में नहीं उठी थी?
"हे महाकवि कालिदास! आषाढ़ की पहली श्याम घटाओं को देखकर जब यक्ष का मन उचाट हुआ, और उसने विरह में तड़पकर बादलों से संदेशा भेजा, तो सच बताना, क्या उस बेबस यक्ष के आंसू सिर्फ कागजों पर गिरे थे या वो दर्द तुम्हारी आत्मा को भी चीर गया था? क्या अमल-धवल गिरि के शिखरों पर बैठे-बैठे, जब तुम काव्य रच रहे थे, तब सच में तुम भाव-शून्य थे? या पराई पीड़ा से चूर-चूर होकर, तुम भी यक्ष की तरह ही रोए थे? ओ प्रियवर, तुम कब तक अपनी भावुकता को उन ऊँचे शिखरों की शांति में छिपाकर सोते रहे? सच-सच बतलाना, कवि की पीड़ा, क्या सचमुच उसकी अपनी पीड़ा ही नहीं होती?
कविता का मूल उद्देश्य:
नागार्जुन यह स्थापित करना चाहते हैं कि सच्चा काव्य कल्पना से नहीं, बल्कि अनुभव और आत्मानुभूति से पैदा होता है। कवि रति, यक्ष या अज की पीड़ा का चित्रण तब तक नहीं कर सकता जब तक वह खुद उस पीड़ा से न गुजरे। यह कविता रचनाकार की संवेदनशीलता और उसकी सामाजिक पक्षधरता को उजागर करती है, जहाँ 'पर-पीड़ा' को अपनाकर ही एक महान कृति का जन्म होता है।
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