Search

Shopping cart

Saved articles

You have not yet added any article to your bookmarks!

Browse articles
Advertisement
Advertisement Banner

ग्लोबल वॉर्मिंग ने हिंद-प्रशांत महासागरों के बीच प्राकृतिक संबंध को किया कमजोर

नई दिल्ली। दुनिया के मौसम और जलवायु को प्रभावित करने वाले हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच पिछले करीब 400 सालों से बना प्राकृतिक तालमेल अब टूटता नजर आ रहा है। वुड्स होल ओशनोग्राफिक इंस्टीट्यूशन के वैज्ञानिकों की रिसर्च में इस बदलाव को लेकर चेतावनी जारी की गई है। एक अध्ययन के मुताबिक इंसानी गतिविधियों से बढ़ रही ग्लोबल वॉर्मिंग ने दोनों महासागरों के बीच उस प्राकृतिक संबंध को कमजोर कर दिया है, जिसके आधार पर दुनिया के कई हिस्सों में बारिश, सूखा और तूफानों के पैटर्न को समझा जाता रहा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के बीच वायुमंडलीय हवाओं का एक संबंध है, जिसे वॉकर सर्कुलेशन और क्लाइमेट कपलिंग के जरिए समझा जाता है। प्रशांत महासागर में अल नीनो या ला नीना जैसी घटनाएं होने पर उनका प्रभाव हिंद महासागर और उसके आसपास के मौसम पर भी पड़ता था। इसी संबंध का असर मानसून और दुनिया के कई क्षेत्रों में बारिश के स्वरूप पर दिखाई देता था।

वैज्ञानिकों ने बताया कि 1980 के दशक के बाद इस प्राकृतिक व्यवस्था में असामान्य बदलाव देखने को मिले। हिंद महासागर ने प्रशांत महासागर से मिलने वाले जलवायु संकेतों पर पहले की तरह प्रतिक्रिया देना कम कर दिया। समस्या यह थी कि आधुनिक मौसम संबंधी रिकॉर्ड केवल सीमित अवधि के हैं। इसलिए शोधकर्ताओं के लिए यह तय करना कठिन था कि बदलाव प्राकृतिक चक्र का हिस्सा है या किसी बड़े परिवर्तन का संकेत। इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए वैज्ञानिकों ने पेड़ों के छल्लों, प्राचीन मूंगों और गुफाओं में बने स्टैलेग्माइट्स जैसे पेलियोक्लाइमेट रिकॉर्ड का अध्ययन किया। इन प्राकृतिक अभिलेखों में सदियों पुराने तापमान और बारिश से संबंधित संकेत सुरक्षित रहते हैं। इनके आधार पर वैज्ञानिकों ने करीब 1600 से लेकर आधुनिक दौर तक दोनों महासागरों के व्यवहार की तुलना की।

अध्ययन में सामने आया कि पिछले 400 सालों में दोनों महासागरों का संबंध मुख्य रूप से स्थिर रहा। केवल 1810 से 1850 के बीच ज्वालामुखीय गतिविधियों के कारण यह संबंध अस्थायी रूप से कमजोर पड़ा था। ज्वालामुखियों से निकली राख और गैसों ने सूर्य की रोशनी को प्रभावित किया, जिससे वैश्विक तापमान में अस्थायी गिरावट आई। बाद में वातावरण साफ होने पर समुद्री जलवायु प्रणाली फिर सामान्य हो गई। वर्तमान स्थिति इससे अलग है। कोयला, तेल और गैस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल से बढ़ रही ग्रीनहाउस गैसों ने पृथ्वी को लगातार गर्म किया है। 

रिपोर्ट के मुताबिक इस बदलाव का असर मौसम की भविष्यवाणी पर भी पड़ सकता है। यदि पुराने समुद्री संबंध कमजोर हो गए हैं तो मानसून, अत्यधिक बारिश, सूखा और समुद्री तूफानों का अनुमान लगाने वाले मौजूदा मॉडलों को नई परिस्थितियों के अनुरूप ढालना होगा। इसका प्रभाव कृषि, जल प्रबंधन, बाढ़ नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा तक पहुंच सकता है। वैज्ञानिकों के लिए यह बदलाव इसलिए भी अहम है क्योंकि यह बताता है कि जलवायु परिवर्तन केवल तापमान बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पृथ्वी की जटिल प्राकृतिक प्रणालियों के बीच बने पुराने संतुलन को भी बदल रहा है।


Comments (0)

Leave a Comment