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प्रेमलता बहन का यह सौभाग्य रहा कि उन्हें बचपन से ही ईश्वरीय ज्ञान मिलना शुरू हो गया था। वे बचपन से ही ब्रहमाकुमारीज संस्था से जुड़ गई थी। 18 जनवरी 1940 में जन्मी प्रेम लता बहन को सन 1952 में ईश्वरीय ज्ञान मिला और सन 1956 में वे इस ज्ञान के सागर में जीवनभर के लिए समर्पित ही गई। ब्रह्माकुमारी प्रेमलता के अंदर ब्रहमाकुमारीज संस्था के संस्थापकब्रहमा बाबा ने ईश्वर के प्रति मधुर मिलन की ललक देखी, तोउन्होंने उन्हें अपने सानिध्य में ले लिया। ब्रहमा बाबा चाहते थे, कि परमात्मा शिव का ईश्वरीय ज्ञान भक्ति मार्ग के साधु संतों को भी मिले।जिसके लिए उन्होंने ब्रहमाकुमारी प्रेमलता बहन को इस ईश्वरीय सेवा के लिए निमित्त बनाया और उन्हें हरिद्वार में जाकर साधू संतों को ईश्वरीय ज्ञान बांटने की सेवा दी।
निराकार परमपिता परमात्मा शिव के दिव्य ज्ञान एवं राजयोग शिक्षा को संत समाज व देवभूमि में फैलाने वाली प्रेमलता दीदी जी, न केवल ब्रह्मा कुमारी संगठन को, अपितु समग्र देवभूमि को, एक पिता परमात्मा और एक दिव्य परिवार मानकर वैशिक शांति, एकता, भाईचारा, सहयोग एवं वसुधैव कुटुम्बकम की भावना व आदर्शों को देश विदेश में खूब प्रचारित, प्रसारित और सुदृढ करती रही। प्रेमलता दीदी जी सभी वर्गों के लिए आध्यात्मिक सेवाओं का प्रावधान पूरी दिल से करती थी । हर वर्ष साधु संतों के लिए खास राजयोग शिविर, स्नेह मिलन, संगोष्टियां एवं सम्मेलन आदि कराकर वे सन्तो के बीच बेहद लोकप्रिय रही।उनका मानना था, संत समाज से ही सही जनजागृति, समाज, संस्कृति, प्रकृति, पर्यावरण एवं विश्व कल्याण सम्भव है। मूल्य निष्ठ, साकारात्मक एवं संवेदनशील आध्यात्मिकता मार्ग से ही संभव है।यही मार्ग शक्तिशाली उत्प्रेरक है, जो जन मानस व देश समाज को सही दिशा और दशा प्रदान कर सकता है। उनका कहना था, आध्यात्मिकता ही स्वच्छ, स्वस्थ, संतुलित, समृद्ध और सुखमय जीवन, समाज, संस्कृति व संसार निर्माण का आधार है। नैतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक उत्थान हेतु वे सदा तत्पर रहती थी।जीवन को स्वस्थ, सुखी, सात्विक, समृद्ध एवं संतुलित बनाने हेतु प्रेमलता दीदी जी संतो को आध्यात्मिक ज्ञान, राजयोग ध्यान, मानवीय मूल्य, सादा, स्वस्थ और सकारात्मक जीवन शैली अपनाने हेतु प्रेरित करती थी। देवभूमि उत्तराखंड में, समय - समय पर और जगह -जगह पर राजयोग मैडिटेशन शिविर लगवाकर वे जन मानस को स्वस्थ, नशामुक्त तथा व्यसन मुक्त रखने का हर संभव प्रयास करती रही। राजयोगिनी बीके प्रेमलता दीदी सन्तो के बीच जाकर पहले उनकी सुनती थी और फिर उन्हें बड़े सम्मान के साथ ईश्वरीय ज्ञान देने लगती। संत समाज के लोग भी प्रेम बहन के रूहानी आभामंडल में खोकर स्वयं को शिष्य समान समझने लगते और लगता जैसे प्रेम बहन हैड मास्टर के रूप में उन्हें धर्म और आध्यात्म का पाठ पढ़ा रही हो,वे कहती थी,आज भी हम परमात्मा शिव को पहचान नही पा रहे है।जबकि यह सच है कि कोई एक चेतन तत्व जिसे हम आत्मा कहते है, वह हमारे शरीर में रहकर शरीर की सभी गतिविधियों को संचालित
करता है। हमारी भृकुटि में रहने वाली आत्मा शरीर में जो कुछ भी होता है उससे सदा अप्रभावित रहती है। यह चेतन तत्व रूपी सदा ही इतिहास के परे का सच है। यदि चेतन तत्व यानि आत्मा का कनेक्शन परम तत्व यानि परमात्मा से जुड़ जाए तो यह तत्व संसार में जो कुछ भी हो रहा है उसे नियंत्रित तो नही कर सकता लेकिन दृष्टा अवश्य बन सकता है। शरीर की मृत्यु पर यही चौतन्यस्वरूप आत्मा वर्तमान शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण कर लेती है। जब यह प्रश्न मन मे उठता है कि मृत्यु के बाद मेरा क्या होगा? इस प्रश्न में मेरा शब्द उस शरीर की ओर संकेत कर रहा है, जो प्रति क्षण बदल रहा है। मेरी मृत्यु के बाद जो कुछ भी होगा, वह उसी शरीर का होगा जिसने मेरे जन्म के समय वह शरीर धारण किया था, जिसे मैं अपना शरीर कहता आया हूं। अगर हम अपने जन्म के पहले से उस तत्व को जान
लें तो फिर यह प्रश्न ही नहीं रहता कि मृत्यु के बाद मेरा क्या होगा?प्रेम बहन ने जीवनपर्यंत परमात्मा शिव से सकास लेकर दादा लेखराज यानि ब्रह्माबाबा के जीवन से सब कुछ सीखा। उनके आध्यात्मिक अनुभवों से अपनी आध्यात्मिक शक्तियों को जगाने का काम किया।उन्हें शत शत नमन।
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