Shopping cart
Your cart empty!
Terms of use dolor sit amet consectetur, adipisicing elit. Recusandae provident ullam aperiam quo ad non corrupti sit vel quam repellat ipsa quod sed, repellendus adipisci, ducimus ea modi odio assumenda.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Sit amet consectetur adipisicing elit. Sequi, cum esse possimus officiis amet ea voluptatibus libero! Dolorum assumenda esse, deserunt ipsum ad iusto! Praesentium error nobis tenetur at, quis nostrum facere excepturi architecto totam.
Lorem ipsum dolor sit amet consectetur adipisicing elit. Inventore, soluta alias eaque modi ipsum sint iusto fugiat vero velit rerum.
Do you agree to our terms? Sign up
चार वेद में मूलभूत भूल थी है जिसमें व्यासजी जैसे ऋषि-मुनियों ने चार वेद का दोहन करके अपने अपने विरोधाभासी मत दर्शाकर मतभेद खड़े किये है और खट-पट बढ़ गई है। नेति नेति का हार्द समझें बिना ही अनंत ब्रह्मांड मेंकार के स्वरुप में सर्वव्यापक प्रकाश ब्रह्म है जो सृष्टि के सर्जनहार का परम प्रकाश ब्रह्म है। उस सर्जनहार की विश्व में कोई यथार्थ खोज नहीं कर पाया इसलिए चार वेद से चली आई भूल दिन दूना रात चौगुना बढ़ती ही गई जो थमने का नाम नहीं रही है। हररोज एक नया भगवान और देवी पैदा होती ही रहती है। क्यों कि कवियों की काल्पनिक मनगढ़ंत तथ्यहीन रसिक कविताओं और वाणीयों रुप वाणी विलास में जगत फंस गया है। जगत में आज तक न किसी को निज चौतन स्वरुप अंश का यथार्थ बोध है और न सृष्टि के सर्जनहार का बोध है, फिर भी च्युंइगम की तरह वाणी विलास के नशे में चबाते हुए सब मस्त है जैसे कि उनको परमपद की प्राप्ति अभी इसी वक्त हो गई हो। जब भीतर ही परमात्मा का बोध दृढ़ हो जाए, तब भय मिट जाता है क्योंकि रक्षक और रक्षित का भेद ही नहीं रहता कृ वही शरण, वही शरणागत हो जाता है। बुद्धि से आगे कि यात्रा के लिए प्रेम ही सहारा है। संसारीक पदार्थों से विरक्ति होने पर प्रेम कि शुरुआत होती है। भोगों का दमन नहीं करा जा सकता क्योंकि मन द्वारा उत्पन्न सृष्टि का भोक्ता मन ही है। ये ऐसा ही है जैसे चित्रकार कागज को भुलाकर उसमें बने हुए चित्रों को ही भोग रहा है रू परिवार है समाज है कुटुंब इत्यादि है धन सम्पत्ति मान मर्यादा इतना सब जीवन भर मेहनत करके जोड़ा उसका त्याग सरल नहीं होता है रू शरीर और संसार में अहं भाव है ही नहीं। अहं है कहां किसमें जानने मानने में है। अनजाने में भी है। ज्ञान अज्ञान में भी। जनाइये मैं कौन हूं हूं भाव कौन सवाल मैं संकेत मात्र हूं या नहीं भाव हैं। अहं न देह में है न संसार में, वह केवल जानने वाले मैं हूँ के स्फुरण में है कृ और जब यह स्फुरण भी किसमें उठ रहा है यह देखो, तो मैं केवल साक्षी का संकेत मात्र रह जाता है, भाव नहीं।! रू राम कथा के तेई अधिकारी । जिन्ह के सत संगति अति प्यारी।। सत्संग श्रवण कीजिए सब कुछ ठीक हो जाएगा। एक मृत शरीर है और एक जीवित शरीर है दोनों ही पर सुर्य का प्रकाश पड रहा है एक शांत है और दुसरे में प्राण है। सुर्य कि दृष्टि से दोनों ही सुर्य के विषय है और सुर्य दोनों का विषयेता । तीनो ही सतय बनकर स्थित है ये बुद्धि का विचार है धारणा है मन का निश्चय है। यदि अचानक से पता चले कि ये जो कुछ भी देखा वो स्वप्न में देखा तो कोई एक सत्ता ऐसी भी हैं जो सुर्य को भी प्रकाशित कर रही है। अब एक मृत शरीर है एक जीवित शरीर है एक बुद्धि है एक सुर्य है और एक वो सत्ता भी है जो इन सबको स्वप्न में एक क्षण में रच लेती है रू आजकल तत्त्वदर्शी तत्त्ववेत्ता केवल एक ही पूरे विश्व में है और वह राजनीति में कृष्ण की तरह से है।वह उत्तर भारत में प्राप्त है उसके प्रवचन फोटो भी इस साइट पर आए हैं। परन्तु उसके बारे में जानकारी देने वाले उचित-अनुचित से अनभिज्ञ हैं। जिस महात्मा के बारे में जानकारी दी गई है उसके चेले उचित-अनुचित से अनभिज्ञ हैं मैंने पहले ही बता दिया है। चेले को यह साफ़ साफ़ स्पष्ट रूप से देखें जा सकते हैं कि उन्होंने क्या सीखा है? और उस महापुरुष को अपने स्वभाव से ख़राब करते रहते हैं। एक उपले रखने के लिए बरसात में बटिहा जिसमें उपले सूखें रहें बनाया जाता है। तब उसमें से उपले ही निकलते हैं उसी तरह से कुछ महात्माओं के चेले निम्न श्रेणी के फंसे हुए रहते हैं और वह उस महापुरुष को अपने स्वभाव से बदनाम करते रहते हैं। इतना समय हो गया उस महापुरुष का शिष्य यहां पर किसी का भी समाधान नहीं कर सका है जबकि वह बड़े बड़े लेख लिखने से अपने को महात्मा रूप में व्यक्त करता है गुरु को कभी नहीं। कैसा कलियुग आ गया है।अन्त में राम नाम सत्य है का स्मरण करने का कारण यह है कि जब मनुष्य अंतिम समय में होता है तो बहुत ज्यादा कष्ट में होता क्योंकि वो माया की जाल में जकड़ा रहता है और जैसे ही प्राण त्याग देता है तब जो मनुष्य अपने जीवन काल में जितना गलत करता है उतना उस आत्मा को गुस्सा आती है और इसलिए किसी किसी के मरते वक़्त शरीर कभी डरावना या चेहरा गुस्से में आंख जीभ निकला हुआ रहता है जो सत्य कर्म करते हैं उसका शरीर अंतिम समय एक शांत सा गहरी निद्रा में दिखाई देता है मरने के बाद आत्मा शरीर के पास ही रहती है जिसे कई वैज्ञानिकों ने यन्त्र से देखा है लेकिन वो शरीर में इसलिए नहीं जाती क्योंकि उसे अपने जीवन में किये गए गलत कार्यों से नफरत होता और फिर जब राम नाम सत्य है का उद्घोष होता है तो आत्मा में चेतना होती है अतः वह पुनः भगवान राम की खोज में निकल पड़ता है और जब सभी बुरे कर्मों का कष्ट भोगता है तो धीरे धीरे राम के प्रकाश जो पुरी दुनिया कों रोशनी देता है उसकी ओर चलकर पुनः शरीर कों प्राप्त करता है यदि भटकाव 36 करोड़ योनियों से होकर जाता है जो संत होते हैं वो प्रभु का स्मरण करते करते शरीर त्याग कर समाधि लगा लेते हैं और उसी के आसपास रहते हैं जो हमें किसी ने बताया जब एक समाधि स्थल पर गया कि यहाँ हवन पूजा होती है और बाबा रात में कई कों दिखे हैं और कल्याण करते हैं इसकी सच्चाई मुझे मालूम नहीं है लेकिन एक चीज जो रामायण में सुना है कि अहिल्या जब मुनि के श्राप से पत्थर बन गईं थी बाद में भगवान राम ने उसे पुनः जीवन दिया इससे मैं ऐ समझता हूँ कि पहले जब पत्थर बनी तो चेतना चली गईं और निर्जीव हो गईं ठीक उसी प्रकार मनुष्य मरा और निर्जीव हो गया बाद में जब राम नाम सत्य है का उद्घोष हुआ तो आत्मा पुनः जीवन पाने के लिए भगवान राम की शरण में जाने हेतु संघर्ष से सामना यानि अनेक योनि में भटकाव हुआ और बाद में करुणामई भगवान राम ने पुनः उसे जीवन दिया। अतः सृष्टि के सर्जनहार प्रकाश ब्रह्म भगवान राम हैं इसमें क़ोई संशय नहीं है।
Leave a Comment