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तिब्बत में बन रहा मेडोग हाइड्रोपावर बांध भारत-बांग्लादेश के लिए भी है खतरा

बीजिंग। मेडोग बांध चीन का ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रहा दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट है इसको लेकर चीन के ही भूवैज्ञानिकों ने सवाल खड़े कर दिए है। चीन की सरकारी भूवैज्ञानिक संस्था से जुड़े वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में सामने आया है कि तिब्बत में बन रहा मेडोग हाइड्रोपावर स्टेशन एक सक्रिय फॉल्ट लाइन के ठीक ऊपर बना है। यह जगह अरुणाचल प्रदेश के साथ लगती चीन की सीमा से महज 50 किलोमीटर दूर है। इस खुलासे के बाद इस विशाल बांध की सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं पैदा हो गई है।

रिसर्च में साफ बताया गया है कि यारलुंग त्सांगपो नदी पर बन रहे मेडोग बांध के ठीक नीचे एक सक्रिय पाइझेन फॉल्ट मौजूद है। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यह फॉल्ट बांध की मजबूती को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। मेडोग हाइड्रोपावर स्टेशन तिब्बत के मेडोग काउंटी में यारलुंग त्सांगपो नदी पर बनाया जा रहा 60 हजार मेगावाट का रन ऑफ द रिवर हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट है। यह नदी पश्चिमी तिब्बत के अंग्सी ग्लेशियर से निकलती है और चीन के कब्जे वाले तिब्बत में 1,625 किलोमीटर का सफर तय करती है। नामचा बरवा चोटी के पास ग्रेट बेंड से गुजरने के बाद यह भारत में दाखिल होती है, जहां इसे ब्रह्मपुत्र कहा जाता है। भारत में यह नदी 918 किलोमीटर बहती है और फिर बांग्लादेश में 337 किलोमीटर तक बहती है, जहां इसे जमुना कहा जाता है। आखिर में यह बंगाल की खाड़ी में जाकर मिल जाती है।

इस प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत 1 ट्रिलियन युआन यानी करीब 137 अरब डॉलर है, जिससे यह दुनिया का सबसे बड़ा हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट है। इससे हर साल करीब 300 अरब किलोवाट घंटे बिजली बनेगी, जो थ्री गॉर्जेस डैम से करीब तीन गुना ज्यादा है। चीन ने इस प्रोजेक्ट को दिसंबर 2024 में मंजूरी दी थी और इसका निर्माण जुलाई 2025 में शुरू हुआ था। इसे 2033 तक पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य रखा है, लेकिन चीन के अपने ही सरकार समर्थित वैज्ञानिकों की मानें तो यह विशाल बांध एक भूगर्भीय टाइम बम के ऊपर बनाया जा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक पाइझेन फॉल्ट प्लीस्टोसीन युग से सक्रिय है. यह वह भूगर्भीय दौर है जो करीब वैज्ञानिकों ने लिखा है कि यह फॉल्ट लगातार सक्रिय बना हुआ है और इससे बांध, सड़कों, पुलों, सुरंगों और जलाशय क्षेत्र की मजबूती पर बड़ा असर पड़ सकता है। उन्होंने चेतावनी दी है कि भविष्य में फॉल्ट के हिलने से पूरे प्रोजेक्ट की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है। शोधकर्ताओं ने यह भी बताया कि जिस पाई गांव के इलाके में मेडोग बांध बन रहा है, वह चीन के सबसे ज्यादा भूकंप प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। वहां मिले पुराने झील के तलछट बताते हैं कि यह फॉल्ट करीब 9,500 साल पहले तक सक्रिय था। साल 2017 में इसी फॉल्ट के उत्तरी हिस्से में तिब्बत में आए 6.9 तीव्रता के भूकंप ने भी इसकी सक्रियता की पुष्टि की थी।

वैज्ञानिकों की टीम ने आगाह किया कि बांध के जलाशय के आसपास की जमीन ढीली और कमजोर बनावट वाली है। जब जलाशय पानी से भर जाएगा, तो लगातार पानी के भीगने, फॉल्ट की सक्रियता और भूकंप के मिले जुले असर से भूस्खलन और चट्टानें खिसकने का खतरा ज्यादा है। वैज्ञानिकों ने कहा है कि निर्माण और संचालन दोनों के दौरान ढलानों को मजबूत करने जैसे सुरक्षा उपाय बढ़ाने जरूरी हैं। इस पूरे मामले पर भारत और बांग्लादेश भी बारीकी से नजर रखे हुए हैं, क्योंकि इस प्रोजेक्ट का असर नीचे की ओर बहने वाली नदी पर भी पड़ सकता है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि असली चिंता यह नहीं है कि चीन पानी का बहाव रोक सकता है, बल्कि यह है कि इस जगह की भूगर्भीय स्थिति ही खतरनाक है। चीन का अपना ही सरकारी अध्ययन यह मान रहा है कि दुनिया का सबसे बड़ा बांध हिमालय के सबसे ज्यादा भूकंप प्रभावित इलाकों में से एक में एक सक्रिय फॉल्ट लाइन के ऊपर बनाया जा रहा है, तो असली सवाल यह नहीं है कि चीन ब्रह्मपुत्र के बहाव को रोक सकता है या नहीं. असली सवाल यह है कि अगर इतना बड़ा बांध और उसका विशाल जलाशय कभी टूट गया, तो इसके नतीजे कितने भयानक हो सकते हैं।

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