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सुप्रीम कोर्ट ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों की अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर जल्द फैसला लेने का निर्देश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपेक्षा जताई है, जल्द से जल्द इस मामले में स्पीकर फैसला करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कोई समय सीमा तय नहीं की। यह जरूर कहा, सुप्रीम कोर्ट लोकसभा अध्यक्ष को निर्देश नहीं दे सकती है। जल्द से जल्द मामला निपटाने की याद जरूर दिला सकती है। ऐसी याद दिलाने का कोई असर नहीं होता है। जब भय ही नहीं होगा, तो इस तरह के निर्देश का कभी पालन भी नहीं होगा। टीएमसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता और सांसद कल्याण बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा घ्कि नोटिस के बावजूद भी सांसदों ने कोई जवाब नहीं दिया। सलिस्टर जनरल तुषार मेहता ने कहा, लोकसभा अध्यक्ष नोटिस जारी कर चुके हैं। वहीं बाकी सांसदों कि ओर से पेश वकीलों ने कहा, वह चार सप्ताह के अंदर नोटिस का जवाब दाखिल कर देंगे। कुल मिलाकर तारीख पर तारीख का यह खेल कोई नई बात नहीं है। दल-बदल कानून के अंतर्गत दल बदलने वाले सांसदों और विधायकों की अयोग्यता को लेकर महाराष्ट्र से जो खेल शुरू हुआ था, सारे देश ने उसका हश्र देख लिया है। महाराष्ट्र के मामले में भी इसी तरह से तारीख पर तारीख का खेल चला था। विधानसभा अध्यक्ष ने कई महीनों तक फाइल को अपने पास दबा के रखा था। इसी बीच चुनाव आयोग भी एक-दूसरे की मदद कर रहे थे। चुनाव आयोग, सुप्रीमकोर्ट और विधानसभा/ लोकसभा अध्यक्ष के बीच में इसी तरह का खेल कई बार पहले भी खेला जा चुका है। समय निकलने के बाद इस तरह की याचिकाओं का कोई मतलब नहीं रह जाता है। यह फैसला इसी तरह का हुआ, जब आदमी मर गया, तब उसके मामले में फैसला आया। उसके मरने के कारण फाइल बंद कर दी गई? लेकिन उसे समय पर न्याय नहीं मिला। महाराष्ट्र की लंबित दल-बदल याचिकाओं पर कानूनी बहस सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। यह धारणा बनती चली जा रही है। दलबदल जैसे संवेदनशील मामले में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट विवाद और दबाव से बचने के लिए तारीख पर तारीख का खेल खेलते हैं। विशेष रूप से उन मामलों में जहां लाभान्वित पक्ष भाजपा हो। तेलंगाना में एक विधायक के दलबदल मामले में तेलंगाना हाईकोर्ट ने फटाफट फैसला सुना दिया है। विधायक की सदस्यता निरस्त कर दी है। वहीं पिछले 4 महीने से टीएमसी के सांसद अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष के यहां जो याचिका दायर कर कार्यवाही की मांग की थी। मानसून सत्र भी निकल गया। लोकसभा अध्यक्ष के यहां से तारीख पर तारीख का खेल खेला जा रहा है। इससे व्यथित होकर टीएमसी ने सुप्रीम कोर्ट की शरण ली। सुप्रीम कोर्ट ने भी तारीख पर तारीख का खेल खेलना शुरू कर दिया है। फैसला कब होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता है। सॉलिसिटर जनरल भी इस मामले में सरकार की ओर से खड़े होकर बागी सांसदों और विधायकों की मदद कर रहे हैं। दल-बदल कानून को लेकर पिछले 4 वर्षों में जिस तरह से हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जाने के बाद भी जब कोई निर्णय प्राप्त नहीं होता है। महाराष्ट्र विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो गया, दलबदलू वहां विधायक और मंत्री बने रहे। दोबारा चुनाव लड़ लिया। फैसला अभी तक नहीं आया। रही सही कसर चुनाव आयोग ने पूरी कर दी। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शिवसेना का चुनाव चिन्ह सीज करके नया चुनाव चिन्ह दे दिया। कुछ इसी तरह की कार्यवाही चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में की है। जिसके कारण देश में संवैधानिक संस्थाओं को लेकर जो विश्वास आमजनों के मन में था, वह विश्वास खत्म होता जा रहा है। अब यह धारणा बनने लगी है, न्यायपालिका सहित अन्य संवैधानिक संस्था जिसमें चुनाव आयोग भी शामिल है। सब सत्तारुड दल भाजपा की सुविधा को ध्यान में रखते हुए, या तो मामले को टालते हैं या ऐसा निर्णय देते हैं, जिससे क्षेत्रीय पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे और शरद पवार की राकपा के साथ यही हुआ। अब पश्चिम बंगाल में टीएमसी के साथ यही सब हो रहा है। आम आदमी और राजनीतिक दल इस खेल को अच्छे तरीके से समझने लगे हैं। जिसके कारण सड़कों पर आकर विरोध करना और संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ जिस तरह का वातावरण बन रहा है, यह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए कहीं से भी ठीक नहीं है। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को सभी संवैधानिक संस्थाओं और सभी सरकारों के कार्यों की समीक्षा का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट संविधान के अनुसार यदि समय पर सुनवाई नहीं करती हैं या समय पर निर्णय नहीं करती हैं। जबकि उन्हें समीक्षा करने के बाद आदेश देने का पूर्ण अधिकार है। पिछले कुछ वर्षों से संवैधानिक संस्थाओं के साथ-साथ हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जिस तरह से तारीख पर तारीख का खेल खेला जा रहा है। अंतिम फैसला करने के स्थान पर अंतरिम आदेश देकर मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इसका फायदा त्वरित रूप से सत्तारूड़ पार्टी को मिलता है। पीड़ित पक्ष इंतजार करता रह जाता है। संवैधानिक संस्थाओं की यह ट्रिक साँप भी मर जाए और लाठी भी नहीं टूटे। इस हालत को देखते हुए अब लोगों के सब्र का बांध टूटने लगा है। हाल ही में केंद्रीय चुनाव आयोग में जो विद्रोह देखने को मिल रहा है, वह इसी का परिणाम है। यदि समय रहते न्याय नहीं होगा, तो देश में अराजकता की स्थिति निर्मित होगी। लोकतंत्र कमजोर होगा। संवैधानिक संस्थाओं को अपनी जिम्मेदारी और जवाबदेही को समझना होगा। सुप्रीम कोर्ट जब अपने आपको असमर्थ और कमजोर मानने लगेगी, ऐसी स्थिति में अराजकता की स्थिति ही उत्पन्न होगी। संविधान ने न्याय पालिका को सर्वाेच्च स्थान दिया है। उसकी समीक्षा के दायरे में सभी हैं।
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