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तो पीएम मोदी को सोना खरीदने से रोकना नहीं पड़ता

नई दिल्ली । भारत में सोने के आयात और बढ़ती तस्करी को लेकर एक बार फिर पुरानी कूटनीतिक और आर्थिक नीतियां चर्चा में आ गई हैं। वर्तमान में सरकार देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए सोने के आयात पर भारी ड्यूटी लगाने, टैक्स बढ़ाने और लोगों को जागरूक करने जैसे कदम उठा रही है। इस बीच देश के आर्थिक इतिहास के पन्नों को पलटते हुए 1968 के गोल्ड कंट्रोल एक्ट पर बहस छिड़ गई है, जिसे यदि 1990 के दशक में खत्म न किया गया होता, तो आज सोने की खरीद पर पाबंदियों की तस्वीर कुछ और होती। दरअसल, 1960 के दशक में कमजोर विदेशी मुद्रा भंडार को देखते हुए इंदिरा गांधी की सरकार ने 1968 में गोल्ड कंट्रोल एक्ट लागू किया था। इस कानून के तहत बिना लाइसेंस सोने का व्यापार गैरकानूनी घोषित कर दिया गया और घरों में सोना रखने की सख्त सीमा तय कर दी गई। इसके तहत विवाहित महिला के लिए 500 ग्राम, अविवाहित महिला के लिए 250 ग्राम और पुरुषों के लिए केवल 100 ग्राम सोना रखने की अनुमति थी।

सरकार का मानना था कि इससे सोने की मांग घटेगी, लेकिन इसके विपरीत बाजार पूरी तरह अंडरग्राउंड हो गया। भारत में सोने के प्रति पारंपरिक और भावनात्मक जुड़ाव के कारण मांग में कमी नहीं आई और दुबई व अन्य समुद्री रास्तों से सोने की तस्करी अत्यधिक बढ़ गई। मुंबई का अंडरवर्ल्ड इसी दौर में मजबूत हुआ और छोटे जौहरियों का व्यापार संकट में आ गया। अंततः 1991 के आर्थिक संकट के दौरान प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव और तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने देश को लाइंसेंस राज से बाहर निकालने का फैसला किया। वैश्वीकरण और उदारीकरण की नीतियों के तहत सरकार ने माना कि पाबंदियों से केवल कालाबाजारी बढ़ती है। इसके बाद गोल्ड कंट्रोल एक्ट को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया, जिससे सोने का आयात आसान हुआ और आभूषण उद्योग संगठित क्षेत्र में बदला। हालांकि, इस कानून के हटने के बाद से भारत का गोल्ड इम्पोर्ट लगातार बढ़ता चला गया है, जो आज भी सरकार के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती बना हुआ है।

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