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आरक्षण को लेकर फिर तेज हुई बहस और विरोध की आवाज़ें

 नई दिल्ली। देश में जाति-आधारित आरक्षण को लेकर एक बार फिर राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज होती नजर आ रही है। हाल के दिनों में सोशल मीडिया अभियानों, कई संगठनों के प्रदर्शनों और सार्वजनिक बयानों के चलते आरक्षण व्यवस्था पर चर्चा नए सिरे से केंद्र में आ गई है। इस बीच कुछ संगठनों ने आरक्षण नीति में बदलाव की मांग उठाई है, जबकि अन्य पक्ष मौजूदा व्यवस्था को सामाजिक न्याय के लिए जरुरी बता रहे हैं। हाल के सप्ताहों में सोशल मीडिया पर आरक्षण संबंधी कई अभियान तेजी से चर्चा में आए हैं। इन्हीं में एक रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन नामक अभियान भी शामिल है, जिसने ऑनलाइन माध्यमों पर बड़ी संख्या में समर्थकों को आकर्षित करने का दावा किया है। इस अभियान से जुड़े लोग जाति-आधारित आरक्षण की समीक्षा और मेरिट आधारित व्यवस्था की वकालत कर रहे हैं। अभियान के समर्थकों ने हाल ही में महाराष्ट्र के नागपुर में विरोध प्रदर्शन भी किया।

इसी क्रम में नीट परीक्षा और शिक्षा व्यवस्था पर हुई बहस में आरक्षण के मुद्दे पर मुखर हुए कुछ युवाओं ने भी सोशल मीडिया पर अपनी सक्रियता बढ़ाई है। इनमें हर्ष दुबे का नाम भी चर्चा में है, जिन्होंने नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की अनुमति के लिए आवेदन किया है। राजस्थान की राजधानी जयपुर में राजपूत करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने भी आरक्षण और यूजीसी के जाति समानता संबंधी प्रस्तावित नियमों को लेकर प्रदर्शन किया। प्रदर्शन में पुलिस के साथ झड़प की घटनाएं सामने आईं। संगठन के नेताओं ने स्थानीय निकाय चुनावों में बीजेपी को समर्थन नहीं देने की घोषणा की। आरक्षण पर चल रही इस बहस में शिक्षाविदों, लेखकों, पत्रकारों और सोशल मीडिया कंटेंट क्रिएटर्स के बीच भी मतभेद देखने को मिल रहे हैं। एक वर्ग वर्तमान आरक्षण व्यवस्था को सामाजिक समानता के लिए जरुरी मानता है, जबकि दूसरा वर्ग इसकी समीक्षा या समाप्ति की मांग कर रहा है। वहीं कुछ विशेषज्ञ आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक मानकों के आधार पर सुधार की पैरवी कर रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक राजनीतिक स्तर पर अधिकांश दल इस संवेदनशील मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाते दिखाई दे रहे हैं। हालांकि आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र इस बहस के राजनीतिक प्रभावों पर भी नजर रखी जा रही है। 2027 में यूपी, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होना हैं, जिसके बाद गुजरात और हिमाचल प्रदेश में भी चुनाव हैं। विशेष रूप से यूपी में जातीय समीकरण लंबे समय से चुनावी राजनीति का प्रमुख आधार रहे हैं। पिछले चुनावों में कांग्रेस के जितनी आबादी, उतना हक और समाजवादी पार्टी के पीडीए जैसे नारों ने राजनीतिक विमर्श को प्रभावित किया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आरक्षण को लेकर चल रही नई बहस भी आने वाले चुनावों में कई दलों की रणनीति और सामाजिक समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। आरक्षण का विषय लंबे समय से भारतीय राजनीति और समाज का संवेदनशील मुद्दा रहा है। ऐसे में इस पर उभरती बहस के बीच कई पक्षों के तर्क और संवैधानिक प्रावधानों को लेकर चर्चा आगे भी जारी रहने की संभावना है।

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