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अदालती झटकों के बावजूद टैरिफ पर अड़े ट्रंप

वॉशिंगटन। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को लेकर अपनी अमेरिका फर्स्ट नीति को और कड़ा कर दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच भविष्य के आर्थिक समीकरणों पर सवाल खड़े होने लगे हैं। हाल ही में अमेरिका के सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति के व्यापक रेसिप्रोकल टैरिफ को असंवैधानिक करार दिए जाने के बावजूद, ट्रंप ने स्पष्ट कर दिया है कि भारत के साथ हुए हालिया व्यापार समझौते में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। ट्रंप ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि कुछ भी नहीं बदलेगा और भारत को अमेरिका को टैरिफ देना ही होगा, जबकि अमेरिका की ओर से ऐसी कोई बाध्यता नहीं होगी। ट्रंप का यह रुख अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियमों और घरेलू अदालती फैसलों के बीच एक नया कूटनीतिक विवाद पैदा कर रहा है।

राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को शानदार बताया, लेकिन साथ ही व्यापारिक मामलों में भारत की पिछली नीतियों पर कड़ा प्रहार भी किया। ट्रंप के अनुसार, पूर्व में भारत व्यापार के मामले में अमेरिका का अनुचित लाभ उठा रहा था, जिसे उन्होंने अपनी नई डील के माध्यम से बदल दिया है। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को एक चतुर राजनेता बताते हुए कहा कि वे व्यापारिक सौदों के मामले में पिछले अमेरिकी नेतृत्व से कहीं अधिक प्रभावी थे, जिसके कारण अमेरिका को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। ट्रंप ने दावा किया कि उनकी नई शर्तों के बाद अब स्थितियां पूरी तरह से अमेरिका के पक्ष में उलट गई हैं। व्यापार के अलावा ट्रंप ने भू-राजनीतिक मोर्चे पर भी भारत को लेकर बड़े दावे किए हैं।

उनका कहना है कि उनके व्यक्तिगत अनुरोध पर भारत ने रूस से तेल खरीदना काफी कम कर दिया है। ट्रंप ने इसे अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत के तौर पर पेश करते हुए कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध को सुलझाने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम है। इतना ही नहीं, ट्रंप ने साल 2024 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष को रोकने का पूरा श्रेय भी खुद को दिया। उन्होंने एक चौंकाने वाला आंकड़ा पेश करते हुए दावा किया कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने खुद स्वीकार किया है कि ट्रंप के हस्तक्षेप के कारण 35 करोड़ लोगों की जान बचाई जा सकी। ट्रंप के अनुसार, उन्होंने दोनों देशों पर 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी थी, जिसके डर से तत्काल शांति समझौता संभव हो सका।

अमेरिका के इस आक्रामक रुख और वहां की अदालत के फैसले के बाद अब भारत में राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कई गंभीर सवाल पूछे हैं। चिदंबरम ने तर्क दिया कि यदि अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप के टैरिफ को अवैध करार दिया है, तो भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक स्थिति अप्रैल 2025 से पहले की यथास्थिति पर लौट जानी चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि भारत ने अमेरिका से 500 अरब डॉलर का सामान खरीदने और रूसी तेल न खरीदने जैसे बड़े वादे तो कर दिए, लेकिन बदले में भारत के हितों की रक्षा कैसे हुई? विपक्ष का आरोप है कि संयुक्त बयान में अमेरिका से आने वाले कई सामानों पर जीरो टैरिफ की बात कही गई है, जबकि ट्रंप सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि भारत को अमेरिकी सामान पर टैरिफ देना ही होगा। ऐसी स्थिति में यह समझौता भारत के हितों के खिलाफ झुका हुआ प्रतीत होता है। वर्तमान में वाशिंगटन में मौजूद भारतीय प्रतिनिधिमंडल से इस समझौते के वास्तविक प्रभाव और शर्तों को स्पष्ट करने की मांग की जा रही है। भारत के लिए अब चुनौती यह है कि वह अमेरिका के साथ अपनी सामरिक मित्रता को बचाए रखते हुए अपने आर्थिक हितों और संप्रभु व्यापारिक फैसलों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखता है।

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