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अमेरिकी रुख बदलने का इंतजार करने से बेहतर है खुद को मजबूत करे भारत

वर्तमान में जब हम तृतीय विश्वयुद्ध के मुहाने पर दुनिया को खड़ा पा रहे हैं, तब सभी देश एक-दूसरे से रिश्तों को लेकर भी पहले से ज्यादा सजग और संवेदनशील नजर आ रहे हैं। फिर चाहे वह भारत से रुस, ईरान, इजरायल या अन्य देशों के साथ रिश्तों की बात ही क्यों न हो। पड़ोसी मुल्कों के रिश्ते तो समय और परिस्थितियों के साथ बदलते भी रहे हैं और आगे भी इसकी गुंजाइश होती है। उदाहरण के तौर पर चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, म्यांमार, अफगानिस्तान के साथ ही समुद्री सीमा से लगे श्रीलंका और मालद्वीप के रिश्तों में आए उतार-चढ़ाव को भी देखा जा सकता है। इनमें अफगानिस्तान से भारत के संबंध ज्वलंत उदाहरण के तौर पर वर्तमान परिदृष्य में देखा जा सकता है। जहां तक अमेरिका का सवाल है तो यह शक्तिकेंद्र अब अपने लाभ की खातिर अन्य देशों से अपनी शर्तों पर संबंध बनाने की नीति पर कार्य कर रहा है। वैसे भी अमेरिका जैसे देश से रिश्ते भावी रणनीति के तहत ही तय होते हैं। बावजूद इसके अमेरिका और भारत के रिश्तों को लेकर एक धारणा जो सामने आई कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति पद से हटते ही दोनों देशों के संबंध फिर पुराने ढर्रे पर लौट आएंगे। इस सोच के पीछे यह मान्यता है कि मौजूदा तनाव मुख्य रूप से ट्रंप की व्यक्तिगत शैली, उनकी ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और लेन-देन वाली (टैरिफ-वार) कूटनीति का परिणाम है। लेकिन तस्वीर इससे कहीं अधिक जटिल है। भारत के प्रति अमेरिकी नीति में पिछले कुछ वर्षों में जो बदलाव आए हैं, वे केवल किसी एक राष्ट्रपति या प्रशासन से जुड़े हुए नहीं हैं। इनमें कई ऐसे संस्थागत और रणनीतिक परिवर्तन हैं, जिनका असर ट्रंप के कार्यकाल के बाद भी बना रह सकता है। 

अमेरिका अब भारत के साथ अपने संबंधों को केवल लोकतांत्रिक मूल्यों या चीन के मुकाबले एक रणनीतिक साझेदारी के नजरिए से नहीं देखता। व्यापार, तकनीक, रक्षा, ऊर्जा, आव्रजन और वैश्विक आपूर्ति शृंखला जैसे मुद्दे भी रिश्तों के केंद्र में आ गए हैं। यही कारण है कि आने वाले वर्षों में भारत को अमेरिकी नीति में निरंतरता और बदलाव, दोनों को साथ-साथ समझना होगा।

रक्षा सहयोग में बढ़ी रणनीतिक गहराई 

गौर करने वाली बात है कि वैष्विक स्तर पर आर्थिक व सैन्य तनाव ने रिकॉर्ड बनाने का एक अलग ही काम किया है। इस बीच रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में भारत और अमेरिका के बीच सहयोग पिछले वर्षों में लगातार विस्तृत हुआ है। 2025-2035 के लिए दस वर्षीय द्विपक्षीय रक्षा सहयोग ढांचे और समुद्री सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ाने के प्रयास इसी दिशा का संकेत कहे जा रहे हैं। भारत में जीई-414 जेट इंजनों की असेंबलिंग और ‘सप्लाई की सुरक्षा’ जैसे समझौते दोनों देशों के रक्षा संबंधों को महज हथियार खरीद-बिक्री से आगे ले जाते हैं। ऐसे में यह भी कहा जाता है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका के बीच अमेरिका भारत को एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है। हालांकि, अमेरिका चीन के साथ भी अपने संबंधों को अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों के अनुरूप स्थिर रखने की कोशिश कर रहा है। ऐसे हालात में भारत को यह समझना होगा कि अमेरिकी-भारत साझेदारी का एक बड़ा आधार साझा हित हैं, न कि किसी एक देश के प्रति स्थायी विरोध। 

व्यापार में साझेदारी के साथ दबाव भी 

एक राष्ट्राध्यक्ष जब दूसरे देश के प्रमुख को दोस्त की श्रेणी में रखता है तो उससे उम्मीद की जाती है कि वह कम से कम व्यापार के क्षेत्र में नुक्सान नहीं पहुंचाएगा। पर अमेरिका के साथ ऐसा नहीं है। व्यापार के मोर्चे पर अमेरिका का रुख रिश्तों की जटिलता को स्पष्ट करता है। भारतीय वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ को लेकर वॉशिंगटन ने सख्त रुख अपनाया है। दोनों देश व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने और शुल्क को घटाकर करीब 18 प्रतिशत तक लाने की दिशा में बातचीत कर रहे हैं, लेकिन रूसी तेल आयात और कृषि जैसे मुद्दे अभी भी चुनौती बने हुए हैं। इससे स्पष्ट है कि अमेरिका भारत को एक महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार मानते हुए भी अपने घरेलू उद्योग और व्यापारिक हितों को प्राथमिकता देता है। यह रवैया किसी एक राष्ट्रपति के जाने से पूरी तरह बदल जाएगा, ऐसा मानना आसान लेकिन शायद सही नहीं होगा। 

तकनीक और आव्रजन की दो अलग तस्वीरें

प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच सहयोग का दायरा बढ़ रहा है। एआई, अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर और महत्वपूर्ण खनिजों से जुड़े ढांचे भारत-अमेरिका संबंधों को नई आर्थिक और तकनीकी दिशा दे रहे हैं। दूसरी ओर, आव्रजन नीति में अमेरिका का सख्त रुख भारतीय पेशेवरों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। एच-1बी वीजा शुल्क में भारी वृद्धि और ईबी-2 वीजा से जुड़े नियमों में कड़ाई का सीधा प्रभाव भारतीय पेशेवरों पर पड़ रहा है। कुल मिलाकर एक ही समय में अमेरिका भारत के साथ उच्च तकनीक में सहयोग तो बढ़ा रहा लेकिन वहीं मानव संसाधन के आवागमन पर नियंत्रण कड़ा कर रहा है। एक तरफ व्यापार आसान करने की बात कर रहा वहीं दूसरी तरफ पावंदियां लगाकर व्यापार को ठप करने में कोताही भी नहीं बरत रहा है। यही विरोधाभास बताता है कि रिश्ते अब भावनात्मक साझेदारी से ज्यादा हितों के संतुलन पर आधारित हैं। 

रिहाई मामले ने भी किया संबंध उजागर  

यही नहीं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्काे रुबियो के हस्तक्षेप के बाद अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैनडाइक और उसके छह यूक्रेनी साथियों की रिहाई मामला भी इसी बदलते रुख के तौर पर देखा जा सकता है। रिहाई को लेकर भारत में उठी प्रतिक्रियाएं भी इस संवेदनशीलता को सामने लाती हैं। इन लोगों को भारत की राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने आतंकवादी साजिश और भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोपों में गिरफ्तार किया था। इसलिए भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती केवल यह नहीं है कि ट्रंप के बाद व्हाइट हाउस में भारत समर्थक आएगा या नहीं, बल्कि असली चुनौती अमेरिकी नीति में आए उस व्यापक बदलाव को समझना है, जिसमें भारत को एक साथ साझेदार, प्रतिस्पर्धी और अपने हितों वाला स्वतंत्र शक्ति-केंद्र माना जा रहा है। 

दो नावों की सवारी या कुछ और 

भारत-अमेरिका संबंधों में सहयोग के मजबूत आधार मौजूद हैं, लेकिन मतभेद भी अब रिश्तों का स्थायी हिस्सा बन चुके हैं। दरअसल पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से भारत ने अपने पुराने दोस्तों की बजाय अमेरिका को करीब आने दिया, उससे संदेश यह गया कि भारत दो नावों पर सवार होकर वैश्विक संबंध रुपी भवसागर पार करना चाह रहा है। इसका बेजा लाभ चालाक देश ने खूब उठाया। यहां तक कि भारत के प्रति संस्थागत नीति तक बदलने जैसा काम कर दिखाया। इसलिए अब यह कहना कि ट्रंप के जाते ही सब कुछ पुराने ढर्रे पर आ जाएगा सही नहीं होगा। यह सही है कि ट्रंप के जाने से अमेरिकी प्रशासन की भाषा, शैली या प्राथमिकताओं में बदलाव संभव है, पर रक्षा, व्यापार, तकनीक, आव्रजन और चीन से जुड़ी रणनीतिक गणनाएं किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हैं। इसलिए नई दिल्ली को किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के बदलने का इंतजार करने के बजाय ऐसी दीर्घकालिक नीति बनानी होगी, जो बदलते अमेरिकी रुख के बीच भारत अपने पैरोंतले की जमीन को मजबूत कर सके। समय के साथ भारत अपने आर्थिक, सुरक्षा और भू-राजनीतिक हितों को मजबूती से सुरक्षित रख सके। 


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