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सत्य-अहिंसा के संकल्प से महात्मा बने गांधी

 छोटे-छोटे सद्गुणों ने गढ़ा महान व्यक्तित्व

 गांधीजी का जीवन सद्गुणों और सत्संकल्पों का ऐसा प्रेरणास्रोत था, जिसमें सत्य, अहिंसा, स्वावलम्बन, सादगी, ईमानदारी और सदाचार जीवन के व्यवहार का हिस्सा बनकर सामने आए। उनके विचार और आचार में कोई अंतर नहीं था। वे जो कहते थे, उसे अपने जीवन में उतारकर दिखाते थे। यही कारण है कि उनके संपर्क में आने वाले अनेक कार्यकर्ताओं और अनुयायियों के जीवन पर भी उनके विचारों और आचरण की गहरी छाप पड़ी। विनोबा भावे, डॉ. राजेन्द्रप्रसाद, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे अनेक प्रमुख व्यक्तित्व उनके विचारों से प्रभावित हुए।

गुजरात के पोरबंदर में 2 अक्टूबर को जन्मे मोहनदास कर्मचंद गांधी बचपन से ही संस्कारवान और संवेदनशील थे। माता-पिता के संस्कार तथा परिवार के धार्मिक वातावरण ने उनके भीतर सत्यनिष्ठा, ईमानदारी, कर्तव्यभावना और संकल्पशीलता को मजबूत किया। कोई व्यक्ति जन्म से महापुरुष नहीं होता। उसके छोटे-छोटे निर्णय, संस्कार, कर्म और जीवन के प्रति उसकी सजगता ही धीरे-धीरे उसके व्यक्तित्व का निर्माण करती है। बालक मोहनदास के जीवन में भी ऐसे अनेक प्रसंग आए, जिन्होंने आगे चलकर उनके व्यक्तित्व को दिशा दी।

बचपन में एक बार गांधीजी ने अपने पिता की जेब से कुछ पैसे ले लिए। बाद में उन्हें अपनी भूल का गहरा पश्चाताप हुआ। उनकी अंतरात्मा उन्हें धिक्कारती रही। पिता के सामने सीधे अपनी गलती स्वीकार करने का साहस नहीं जुटा पाए तो उन्होंने पत्र लिखकर अपनी भूल स्वीकार की और क्षमा मांगी। साथ ही भविष्य में चोरी और झूठ से दूर रहने का संकल्प लिया। यही घटना बताती है कि गलती हो जाना उतना महत्वपूर्ण नहीं, जितना अपनी गलती को पहचानना, उसका पश्चाताप करना और उसे दोबारा न दोहराने का दृढ़ निश्चय करना। यही आत्मचिंतन व्यक्ति को भीतर से मजबूत बनाता है।

गांधीजी के जीवन निर्माण में उनकी माता के संस्कारों के साथ गुजरात के स्थानकवासी जैन संत बेचरदासजी और श्रीमद राजचंद्र का भी महत्वपूर्ण प्रभाव रहा। विदेश जाते समय बेचरदासजी से मिले नियमों ने उनके जीवन को अनुशासन दिया, वहीं श्रीमद राजचंद्र के आध्यात्मिक चिंतन ने उनके भीतर आत्ममंथन और सत्य की खोज को गहरा किया। गांधीजी के व्यक्तित्व में जो संयम, आत्मनिरीक्षण और सिद्धांतनिष्ठा दिखाई देती है, उसके पीछे ऐसे संस्कारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

गांधीजी जीवन की छोटी-छोटी बातों को भी बहुत गंभीरता से लेते थे। एक सभा में हरिजन निधि के लिए चंदा एकत्र किया जा रहा था। इसी दौरान एक पैसा हाथ से गिर गया। साथियों ने कहा कि उस पैसे को छोड़कर उसके बदले एक रुपया दे दिया जाएगा, लेकिन गांधीजी ने ऐसा करने से इनकार कर दिया। उनके लिए वह पैसा राष्ट्र की संपत्ति था। उन्होंने उसे खोजकर ही दम लिया। इस घटना में राशि का मूल्य नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन के प्रति उनकी जिम्मेदारी और निष्ठा दिखाई देती है। उनका मानना था कि जनता के विश्वास और धन का सम्मान करना प्रत्येक सार्वजनिक व्यक्ति का कर्तव्य है।

गांधीजी का सादगीपूर्ण जीवन भी उनके विचारों का ही विस्तार था। उड़ीसा की यात्रा के दौरान उन्होंने एक गरीब महिला को देखा, जिसके पास शरीर ढकने के लिए भी पर्याप्त कपड़ा नहीं था। इस दृश्य ने उन्हें भीतर तक प्रभावित किया। उन्होंने अनुभव किया कि जिस देश के गरीब लोगों के पास पर्याप्त वस्त्र नहीं हैं, वहां स्वयं आरामदायक वस्त्र पहनना उनके लिए उचित नहीं। इसके बाद उन्होंने अपनी पोशाक को अत्यंत सादा बना लिया। उनकी वेशभूषा केवल व्यक्तिगत पसंद नहीं थी, बल्कि देश के गरीब और वंचित लोगों के साथ आत्मीयता का प्रतीक बन गई।

स्वावलम्बन गांधीजी के जीवन का एक और महत्वपूर्ण पक्ष था। वे अपना काम स्वयं करने में विश्वास रखते थे। लंदन में भारतीय विद्यार्थियों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान वे बिना किसी संकोच के बर्तन साफ करने में लग गए। विद्यार्थियों को बाद में पता चला कि जिनके हाथों में वे बर्तन धोते देख रहे थे, वे गांधीजी ही हैं। आश्रम जीवन में भी उन्होंने स्वयं श्रम करके दूसरों को श्रम की गरिमा का संदेश दिया। उन्होंने केवल भाषण देकर स्वावलम्बन नहीं सिखाया, बल्कि अपने आचरण से उसे जीवन का हिस्सा बनाया।

गांधीजी का अनुशासन कठोरता से अधिक आत्मीयता पर आधारित था। वे किसी की गलती पर केवल दोषारोपण करने के बजाय व्यक्ति को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करते थे। उनका विश्वास था कि प्रेम और आत्मीयता से मनुष्य के भीतर परिवर्तन अधिक स्थायी रूप से आता है। वे स्वयं अपने आचरण को दूसरों के लिए उदाहरण बनाते थे। इसलिए उनका संदेश केवल शब्दों तक सीमित नहीं रहता था, बल्कि लोगों के व्यवहार में दिखाई देने लगता था।

गांधीजी का पूरा जीवन सत्य और अहिंसा के प्रयोगों की प्रयोगशाला था। उन्होंने अहिंसा को केवल हिंसा से दूर रहने का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे आत्मबल, संयम और नैतिक शक्ति के रूप में जीवन में उतारा। उनकी संकल्पशक्ति, नियम-निष्ठा और जनता के प्रति सेवा-भाव ने स्वतंत्रता आंदोलन को व्यापक जनभागीदारी से जोड़ा। बिना हथियार उठाए सत्याग्रह और अहिंसा के माध्यम से संघर्ष करना उनके नेतृत्व की विशिष्ट पहचान बनी।

आज गांधी जयंती केवल एक महान व्यक्तित्व को याद करने का अवसर नहीं है, बल्कि अपने जीवन के छोटे-छोटे व्यवहारों पर विचार करने का दिन भी है। ईमानदारी, सत्य, स्वावलम्बन, सार्वजनिक संपत्ति के प्रति जिम्मेदारी, श्रम की गरिमा और अपनी भूल स्वीकार करने का साहस जैसे गुण आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। गांधीजी ने दिखाया कि महानता किसी एक बड़े कार्य से नहीं बनती। जैसे एक-एक ईंट से विशाल भवन बनता है, वैसे ही एक-एक सद्गुण से महान व्यक्तित्व का निर्माण होता है।

गांधीजी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि समाज और राष्ट्र में परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से होती है। यदि व्यक्ति अपने आचरण में सत्य, संयम, सादगी और जिम्मेदारी को स्थान दे, तो उसका प्रभाव परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र तक पहुंच सकता है। यही गांधीजी के जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा है और यही गांधी जयंती का सार्थक संदेश भी है।

’हिमालय कभी नाखूनों से हट नहीं सकता, गांधी-दर्शन विश्व से कभी मिट नहीं सकता।’

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