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बैर भाव त्यागने का नाम है क्षमा

(पर्यूषण पर्व पर विशेष - प्रथम दिवस ) 

मिलने का नाम, जोड़ने का नाम, आपस बैर बार त्यागने का नाम क्षमा है। प्रत्येक जीव के प्रति मन, वचन, काय अन्तरंग व बहिरंग में क्षमा याचना करना क्षमा है। दुश्मनी मिटाने का नाम क्षमा है, दुश्मनी मिटाने का फार्मूला है। अपने दुश्मन को देखकर थोडा मुस्कराइये (मुस्कराहट) आमत्रंण कार्ड है। मैं तुम्हें पसंद करता हूँ। मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ। दुश्मन को नहीं दुश्मनी को मारने का प्रयास करो। दुश्मनी के मरते ही दुश्मन समाप्त हो जाता है। भगवान महावीर ने एक सूत्र दुश्मनी मिटाने का दिया, आपस में सभी से जयजिनेन्द्र का महामंत्र दिया। हाथ जोडकर विनय पूर्वक जयजिनेन्द्र करने से दुश्मनी समाप्त हो जाती है। ये उद्घ्गार परम पूज्य मुनि श्री विश्शोक सागर जी महाराज ने क्षमावाणी के पावन पर्व पर कहे-

मुनिश्री ने कहा सभी को मित्र बनाना सबसे बडी साथना है। परमात्मा के सभी मित्र है कोई दुश्मन नहीं। यदि दुश्मनी से बचना है तो दोस्ती से बचो, क्योंकि दोस्त ही एक दिन दुश्मन बनते हैं। मुनिश्री ने कहा कि यही स्वर्ग है, यही पर नरक है। यदि चार भाई, चार बहुऐं, माता-पिता एक साथ नहीं रहते, मिल बांटकर नहीं रहते, आपस में लड़ते हैं कुत्तों की तरह, अलग-अलग खाना बनाते है तो समझना चाहिए यही पर नरक है। जो आपस में मिलजुल कर रहते है, प्रेम से रहते है, एक ही थाली में भोजन करते हैं तो समझना चाहिए यहीं पर स्वर्ग है। विश्व मैत्री दिवस पर मनमुटाव खत्म करें, जाति-पाति पन्थवाद, ऊंच-नीच जैसी वैमनस्यता को भुलाकर ध्यान करें कि हम इसान हैं। मुनिश्री ने कहा व्यवहार से ही दुश्मन और व्यवहार से ही मित्र बन जाता है। व्यवहार सरल तो आचार-विचार अच्छा हो निस्वार्थ हो, व्यवहार को चीनी की तरह मीठा बनाओ नींबू की तरह खट्टा नहीं, एक बूंद चीनी की चाशनी हजारों चीटियों को आकर्षित करती है। हम भी इसी तरह अपने व्यवहार को बनायें जो सभी को आर्कषित कर सकें। 

मुनिश्री ने कहा- सच्चा मित्र वही है जो बुराइयों पर पर्दा डालें, सच्चा मित्र वह है जो ज्ञान दे, सद्गुघ्णों को दे, ऊंचाइयों पर चढ़ा दे। क्षमा धर्म है जो जीवन में है वाणी में है तभी जब दिल में हो वाणी की क्षमा सही क्षमा हो अपनी वाणी को संयमित करो, सभी से प्रेम पूर्वक व्यवहार करो - कहा है- फैले प्रेम परस्पर जग में मोह दूर से रहा करो, अप्रिय कठिन कठोर वचन नहीं कोई मुख से कहा करें। अन्त में मुनिश्री ने कहा- क्षमा धर्म अति प्यारा है सबको पुण्य सहारा यही ज्ञान का फब्बारा है। क्षमा धर्म धर जाओ तुम, जीवन सफल बनाओं तुम, धर्म से प्राणी सुखमय हो जाये रें। 


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