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बच्चों की निजता और स्वतंत्रता पर सवाल खड़े कर रही है ये तकनीक

नई दिल्ली। बच्चों की सुरक्षा के लिए इस्तेमाल की जाने वाली जीपीएस फोन, स्मार्टवॉच और लोकेशन-शेयरिंग ऐप्स की तकनीक अब उनकी निजता और स्वतंत्रता को लेकर भी सवाल खड़े कर रही है। आमतौर पर माता-पिता बच्चों के करीब 8 से 12 वर्ष की उम्र के बीच उनकी लोकेशन ट्रैक करना शुरू करते हैं। इसके पीछे उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि बच्चा सुरक्षित है और निर्धारित जगह पर पहुंच गया है। रास्ता भटकने या किसी आपात स्थिति में फंसने पर भी लोकेशन ट्रैकिंग मददगार साबित हो सकती है। बच्चों की लोकेशन जानने के लिए एप्पल का ‘फाइंड माई’, स्नैपचौट का ‘स्नैप मैप’, ‘लाइफ360’ जैसे ऐप और जीपीएस आधारित स्मार्टवॉच इस्तेमाल की जाती हैं। 

खासतौर पर छोटे बच्चों के लिए बनाई गई स्मार्टवॉच में फोन की तुलना में सीमित सुविधाएं होती हैं और उनका प्रमुख उद्देश्य लोकेशन तथा संपर्क की सुविधा देना होता है। हालांकि, लगातार निगरानी का दूसरा पहलू बच्चों की निजता से जुड़ा है। जब किसी बच्चे की लोकेशन लगातार रिकॉर्ड होती है, तो उसके स्कूल, घर, दोस्तों और रोजाना आने-जाने से जुड़ा विस्तृत डेटा तैयार हो सकता है। ऐसे में माता-पिता के लिए यह जानना जरूरी है कि यह जानकारी कहां स्टोर की जाती है, उसे कौन देख सकता है और कंपनी उसे किसी तीसरे पक्ष के साथ साझा करती है या नहीं। किसी सेवा की प्राइवेसी नीति को समझे बिना उसका इस्तेमाल करना जोखिम पैदा कर सकता है। लगातार ट्रैकिंग का असर बच्चे के मानसिक और सामाजिक विकास पर भी पड़ सकता है। खासकर किशोर बच्चों को यह महसूस हो सकता है कि माता-पिता उन पर भरोसा नहीं करते।

इससे परिवार में तनाव और स्वतंत्रता को लेकर मतभेद पैदा हो सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में 2023 में 112 माता-पिता पर किए गए एक सर्वे में भी सामने आया कि कई अभिभावक सुरक्षा और बच्चों की आजादी के बीच संतुलन को लेकर दुविधा में हैं। कुछ माता-पिता ‘ट्रैकिंग’ के बजाय इसे ‘चेकिंग इन’ यानी बच्चे का हालचाल जानना कहना पसंद करते हैं। 

विशेषज्ञों के अनुसार, लोकेशन ट्रैकिंग शुरू करने से पहले बच्चे को इसका उद्देश्य समझाना जरूरी है। उसे बताया जाना चाहिए कि तकनीक का इस्तेमाल सुरक्षा के लिए किया जा रहा है, उस पर अविश्वास जताने के लिए नहीं। माता-पिता को यह भी देखना चाहिए कि बच्चे की उम्र और जिम्मेदारी बढ़ने के साथ निगरानी का स्तर धीरे-धीरे कम किया जा रहा है या नहीं। इसलिए बच्चों की लोकेशन ट्रैक करने वाली तकनीक सुरक्षा का उपयोगी साधन हो सकती है, लेकिन इसे भरोसे का विकल्प नहीं बनाना चाहिए। स्पष्ट बातचीत, सीमित निगरानी और डेटा प्राइवेसी की जानकारी के साथ इसका इस्तेमाल बच्चों की सुरक्षा और उनकी निजता के बीच बेहतर संतुलन बनाने में मदद कर सकता है। बता दें कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर माता-पिता की चिंता स्वाभाविक है। इसी वजह से आजकल जीपीएस फोन, स्मार्टवॉच और लोकेशन-शेयरिंग ऐप्स का इस्तेमाल बढ़ रहा है। बच्चा स्कूल जा रहा हो, दोस्तों के साथ बाहर हो या अकेले किसी जगह पहुंच रहा हो, माता-पिता कुछ ही सेकंड में उसकी लोकेशन देख सकते हैं। 

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