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बच्चों को पढ़ाई शुरू करने के लिए होती है सही प्रेरणा की जरुरत

नई दिल्ली । अक्सर बच्चे किताबों का नाम सुनते ही या होमवर्क का जिक्र होते ही उससे दूर भागने लगते हैं। ऐसी स्थिति में अभिभावक भी बच्चों को डाट-फटकार करने लगते है, जिससे स्थिति और बिगड़ जाती है। ऐसे में बाल मनोविज्ञान विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की नकारात्मक प्रतिक्रिया देने के बजाय सही और सकारात्मक तरीका अपनाने से बच्चों में न केवल पढ़ाई के प्रति रुचि पैदा की जा सकती है, बल्कि उन्हें एक बेहतर शिक्षार्थी भी बनाया जा सकता है। जानकारों का कहना है कि अधिकतर बच्चे स्वभाव से आलसी नहीं होते, बल्कि उन्हें केवल पढ़ाई शुरू करने के लिए एक सही प्रेरणा और शुरुआत की आवश्यकता होती है। ठीक वैसे ही जैसे किसी पुराने स्कूटर को स्टार्ट करने के लिए सही किक और चोक का इस्तेमाल करना पड़ता है, उसी तरह बच्चे के दिमाग को भी पढ़ाई शुरू करने के लिए एक सकारात्मक पुश की जरूरत होती है। लगातार डांटना, दबाव बनाना या पढ़ाई को बोझिल बनाना बच्चे की आंतरिक रुचि को कम कर देता है। इसके विपरीत, एक छोटा-सा प्रोत्साहन या सही दिशा-निर्देश उसे पढ़ाई के लिए मानसिक रूप से तैयार कर सकता है।

 मनोवैज्ञानिकों और शिक्षा विशेषज्ञों की सलाह है कि बच्चों को एक साथ लंबे समय तक पढ़ने के लिए मजबूर करने के बजाय उन्हें छोटे और प्राप्त करने योग्य लक्ष्य दिए जाने चाहिए। उदाहरण के तौर पर, बच्चे से केवल पाँच मिनट तक पढ़ने या गणित के पाँच सवाल हल करने के लिए कहा जा सकता है। अक्सर यह देखा गया है कि जब बच्चा एक बार पढ़ाई शुरू कर देता है, तो वह इन पाँच मिनटों के बाद भी बिना किसी बाहरी दबाव के काफी देर तक पढ़ाई जारी रखता है। यह तरीका पढ़ाई को बोझिल लगने से बचाता है और बच्चे में आत्मविश्वास भी बढ़ाता है, क्योंकि वह सफलतापूर्वक अपना प्रारंभिक लक्ष्य पूरा कर लेता है। इसके अतिरिक्त, कई बार बच्चे पढ़ाई से इसलिए भी दूर भागते हैं क्योंकि उन्हें गलती करने पर डांट खाने या आलोचना का शिकार होने का डर होता है। 

उन्हें लगता है कि यदि उनसे कोई त्रुटि हुई तो माता-पिता नाराज होंगे या उनकी क्षमताओं पर सवाल उठाएंगे। ऐसे में, पढ़ाई शुरू करने से पहले बच्चों को यह विश्वास दिलाना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि गलती करना सीखने की प्रक्रिया का एक सामान्य और अपरिहार्य हिस्सा है। उन्हें यह भरोसा दिया जाना चाहिए कि आवश्यकता पड़ने पर उन्हें शांत और धैर्यपूर्ण तरीके से सही मार्गदर्शन दिया जाएगा, न कि डांटा जाएगा। विशेषज्ञों का निष्कर्ष है कि यदि बच्चों को बिना किसी डर या दबाव के सीखने का माहौल मिलता है, उन्हें छोटे-छोटे लक्ष्य निर्धारित करने में मदद की जाती है और उनकी हर छोटी-बड़ी कोशिश की सराहना की जाती है, तो वे धीरे-धीरे पढ़ाई में गहरी रुचि लेने लगते हैं। सकारात्मक संवाद, माता-पिता का धैर्य और लगातार प्रोत्साहन बच्चों में अकादमिक आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक होता है। 


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