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भागदौड़ भरी व्यस्त जीवनशैली दे रही गंभीर बीमारियों को जन्म

नई दिल्ली । आज की भागदौड़ भरी व्यस्त जीवनशैली वास्तव में बेहद निष्क्रिय (सेडेंटरी) हो चुकी है, जो गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों को जन्म दे रही है। लोग घंटों एक ही जगह बैठकर स्क्रीन के सामने काम करते रहते हैं, चाहे वह ऑफिस हो या घर। यह गतिहीन जीवनशैली एक नई स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरी है।  अगर आप दिन के 8-10 घंटे कुर्सी पर बैठकर बिताते हैं, तो कभी-कभी की गई एक्सरसाइज या सप्ताह में एक-दो बार जिम जाना भी आपको पूरी तरह से बीमारियों से बचा नहीं सकता। इस कम मूवमेंट वाली दिनचर्या का शरीर पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। इससे शरीर शुगर और फैट को ठीक से नहीं पचा पाता, क्योंकि शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण चयापचय दर धीमी हो जाती है और इंसुलिन संवेदनशीलता कम हो जाती है।

इसके परिणामस्वरूप, डायबिटीज, फैटी लिवर और दिल की बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। इसके अतिरिक्त, मांसपेशियों में कमजोरी, जोड़ों की समस्याएँ और मोटापे की समस्या भी आम हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति आधुनिक समाज के लिए एक चिंताजनक संकेत है। यह समझना ज़रूरी है कि ऑफिस का काम खत्म करने पर मिलने वाला त्वरित परिणाम और सराहना अक्सर हमें अपनी सेहत से समझौता करने पर मजबूर कर देती है। हम अनजाने में उन छोटी, लेकिन महत्वपूर्ण आदतों को टाल देते हैं, जिनका लाभ तुरंत दिखाई नहीं देता। उदाहरण के लिए, 10-15 मिनट की पैदल चलना, समय पर पौष्टिक भोजन करना या पर्याप्त नींद लेनाकृये आदतें भले ही तुरंत कोई बड़ा फर्क न दिखाएँ, लेकिन लंबे समय में ये हमारे शरीर को स्वस्थ रखने में अहम भूमिका निभाती हैं। 

इसके विपरीत, हमारा शरीर एक खराब जीवनशैली पर बहुत धीमी गति से प्रतिक्रिया देता है। उच्च रक्तचाप का धीरे-धीरे बढ़ना, रक्त शर्करा का अनियंत्रित होना और मेटाबॉलिज्म का सुस्त पड़नाकृये सभी शुरुआती दौर में कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाते। जब तक ये बीमारियाँ अपने पूर्ण रूप में सामने आती हैं, तब तक शरीर को अंदर से काफी नुकसान हो चुका होता है। इस निष्क्रिय व्यस्तता को एक अदृश्य हत्यारा माना जा रहा है, जो चुपचाप शरीर को खोखला कर रहा है। इसलिए, अपनी दिनचर्या में सक्रियता को प्राथमिकता देना और यह समझना आवश्यक है कि व्यस्त होने का मतलब हमेशा स्वस्थ होना नहीं है। 

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