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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : जिनकी आत्मा में शिक्षक जीवित रहा

आज 5 सितंबर है, एक ऐसे शिक्षक का जन्मदिवस, जिसे भारत के समस्त शिक्षकों के प्रतिनिधि के रूप में स्मरण किया जाता है। यह वह दिन है, जब हमारे सामने ऐसा व्यक्तित्व स्मृति में उभरता है, जिसने शिक्षक को केवल जीविका का साधन नहीं समझा, बल्कि शिक्षक-जीवन को साधना माना; ज्ञान को केवल सूचना नहीं, आत्मप्रकाश समझा और शिक्षा को केवल पाठ्यक्रम नहीं, मनुष्य निर्माण की प्रक्रिया माना। वह व्यक्तित्व है—डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एक अद्भुत, अपूर्व शिक्षक।

किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति बन जाना असाधारण हो सकता है, लेकिन किसी शिक्षक का राष्ट्रपति भवन तक पहुँचना और वहाँ पहुँचकर भी अपने भीतर के शिक्षक को जीवित रखना उससे कहीं बड़ी घटना है। राधाकृष्णन के जीवन का सबसे उजला सत्य यही था कि पद बदलते रहे, दायित्व बदलते रहे, सत्ता के सर्वोच्च शिखर तक वे पहुँचे, लेकिन उनके भीतर का शिक्षक कभी पदासीन नहीं हुआ। वह जीवन भर विद्यार्थी, समाज और सत्य के बीच विचार का प्रकाश बाँटता रहा।

5 सितंबर 1888 को जन्मे राधाकृष्णन मूलतः दर्शन के अध्यापक थे। भारतीय दर्शन उनके लिए केवल अध्ययन का विषय नहीं था; वह उनकी जीवन-दृष्टि की भूमि था। उन्होंने भारतीय चिंतन को अतीत की किसी जड़ स्मृति के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक जीवित परंपरा के रूप में समझा—ऐसी परंपरा, जिसमें मनुष्य बाहरी संसार को जीतने से पहले अपने भीतर उतरकर सत्य की खोज करता है।

उनके लिए शिक्षा का अर्थ केवल पुस्तकीय ज्ञान अर्जित करना नहीं था। शिक्षा मनुष्य के भीतर विवेक जगाए, उसे प्रश्न करने का साहस दे, उसके मन में संवेदना पैदा करे और उसके आचरण को नैतिक बनाए—यही शिक्षा का वास्तविक प्रयोजन था। ज्ञान यदि मनुष्य को अधिक विनम्र, अधिक विवेकशील और अधिक मानवीय नहीं बनाता, तो वह ज्ञान अधूरा है। शायद इसी कारण राधाकृष्णन के लिए शिक्षक होना किसी पद का नाम नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी संभावनाओं को जगाने की निरंतर साधना थी।

यहीं राधाकृष्णन केवल दार्शनिक नहीं रहते, महान शिक्षक बन जाते हैं। दार्शनिक सत्य की खोज करता है; शिक्षक उस सत्य को जीवन से जोड़ता है। राधाकृष्णन ने दोनों भूमिकाओं को एक साथ जिया। उनकी विद्वता में अध्यापक की सरलता थी और उनके अध्यापन में दार्शनिक की गहराई। वे विद्यार्थियों को तैयार उत्तर देने के बजाय प्रश्नों की दुनिया में प्रवेश करना सिखाते थे, क्योंकि उनके लिए शिक्षा का अर्थ उत्तरों का संग्रह नहीं, विचार करने की क्षमता का विकास था।

उनकी भारतीयता किसी संकीर्ण पहचान का नाम नहीं थी। उनके लिए भारतीयता अनेक परंपराओं, विचारों, भाषाओं और विश्वासों के बीच संवाद से निर्मित एक व्यापक मानवीय चेतना थी। वे भारतीय दर्शन को विश्व-दर्शन के सामने आत्मविश्वास के साथ रखते थे, लेकिन उसमें आत्ममुग्धता नहीं थी। वे पश्चिम से संवाद करते थे, उससे सीखते थे और साथ ही भारतीय चिंतन की मौलिकता को भी स्थापित करते थे। उनके लिए सत्य किसी एक सभ्यता की निजी संपत्ति नहीं था; ज्ञान की सीमाएँ मनुष्य की सीमाओं से बड़ी थीं।

इसी बौद्धिक क्षमता और संवादशील व्यक्तित्व ने उन्हें विश्वविद्यालय की कक्षाओं से बाहर निकालकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय जीवन के व्यापक मंच तक पहुँचाया। वे सोवियत संघ में भारत के राजदूत बने। वहाँ उन्होंने केवल भारत का कूटनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं किया, बल्कि संवाद, समझ और विचार की भारतीय परंपरा को भी सामने रखा। स्वतंत्र भारत के प्रथम उपराष्ट्रपति बने और राज्यसभा के सभापति के रूप में संसदीय जीवन को अपनी बौद्धिक गरिमा से समृद्ध किया। बाद में देश ने उन्हें राष्ट्रपति के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर प्रतिष्ठित किया। लेकिन इन सभी पदों के ऊपर उनकी एक पहचान बनी रही—वे मूलतः शिक्षक थे।

यदि आज आप हमारे बीच होते और देश के उपराष्ट्रपति होते, तो राज्यसभा के सभापति के रूप में आपकी वही गरिमा, गंभीरता और बौद्धिक ऊँचाई सदन में दिखाई देती, जिसकी झलक आपके सभापतित्व में मिलती थी। आप केवल सदन की कार्यवाही संचालित करने वाले सभापति नहीं थे; आप अपने ज्ञान और विवेक से बहस को विचार-विमर्श और असहमति को संवाद में बदलने वाले शिक्षक थे। और यदि आज आप देश के राष्ट्रपति होते, तो शायद आपकी दार्शनिक चेतना राष्ट्रीय नेतृत्व और विदेश नीति को भी अपनी दिशा देती। नेहरू जैसे नेतृत्व के सामने आप कृष्ण की तरह एक विवेकशील सारथी बनकर खड़े होते—सत्ता के रथ को स्वयं हाँकने के बजाय उसे धर्म, कर्तव्य, विवेक और राष्ट्रहित की दिशा दिखाते।

पाकिस्तान के साथ बार-बार हुए तनाव और संघर्षों के बीच आपकी शांतिप्रिय और संवादधर्मी दृष्टि शायद टकराव के साथ समाधान के मार्ग को भी अधिक महत्व देती। शीतयुद्ध की बदलती दुनिया में आपकी गहरी गुटनिरपेक्ष चेतना भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को और अधिक वैचारिक दृढ़ता प्रदान कर सकती थी। आपने जीवन भर यह सिखाया कि राष्ट्र की शक्ति केवल शस्त्रों में नहीं, उसके विवेक, नैतिक साहस और संवाद की क्षमता में भी होती है। आज आपकी अनुपस्थिति में मन सहज ही पूछता है—यदि वह दार्शनिक शिक्षक आज हमारे बीच होता, तो क्या हमारी राज्यसभा का संवाद, हमारा राष्ट्रीय नेतृत्व और हमारी विदेश नीति कुछ अधिक विवेकपूर्ण, शांतिपूर्ण और मानवीय होती?

राज्यसभा के सभापति के रूप में उनकी शैली का एक सुंदर संस्मरण एम.सी. छागला ने किया है। उनके अनुसार राधाकृष्णन की अध्यक्षता में राज्यसभा का वातावरण ऐसा लगता था जैसे दर्शनशास्त्र के किसी प्रोफेसर की कक्षा चल रही हो; डॉ. जाकिर हुसैन की शैली विश्वविद्यालय के किसी विचारपूर्ण सेमिनार जैसी प्रतीत होती थी और वी.वी. गिरि की अध्यक्षता में मानो ट्रेड यूनियन की बैठक का वातावरण दिखाई देता था। यह केवल तीन व्यक्तित्वों की तुलना नहीं थी; इसमें राधाकृष्णन के उस अद्वितीय व्यक्तित्व की झलक मिलती है, जिसमें संवैधानिक पद की औपचारिकता के भीतर भी शिक्षक की आत्मा जीवित थी।

1962 का भारत-चीन युद्ध स्वतंत्र भारत के इतिहास की अत्यंत कठिन घड़ी थी। सैन्य असफलता के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री वी.के. कृष्ण मेनन पर राजनीतिक और सार्वजनिक दबाव बढ़ता गया। पंडित जवाहरलाल नेहरू और कृष्ण मेनन के बीच लंबे समय से निकटता थी। मेनन प्रतिभाशाली, तेजस्वी और वैचारिक रूप से दृढ़ व्यक्ति थे, लेकिन युद्ध के बाद उनके नेतृत्व पर गंभीर प्रश्न उठे। अंततः उनके इस्तीफे का प्रश्न राष्ट्रपति राधाकृष्णन के सामने आया। 7 नवंबर 1962 को नेहरू द्वारा राधाकृष्णन को लिखे गए पत्रों तथा उसके बाद के पत्राचार से स्पष्ट होता है कि राष्ट्रपति ने इस संवैधानिक प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभाई और परिस्थितियों को देखते हुए इस्तीफा स्वीकार करने की सहमति दी।

कृष्ण मेनन के इस्तीफे से जुड़े इस प्रसंग के संदर्भ में नरेंद्र सिंह के नाम से एक संस्मरणात्मक कथन भी मिलता है, जिसमें राधाकृष्णन की सोच को गीता के कर्मयोग से जोड़कर देखा गया है। इसे किसी प्रमाणित सरकारी अभिलेख की तरह नहीं, बल्कि राधाकृष्णन के व्यक्तित्व की एक संस्मरणात्मक व्याख्या के रूप में देखना अधिक उचित होगा। उसमें उनके जीवन को उस कर्मयोगी दृष्टि से समझने का प्रयास दिखाई देता है, जिसमें मनुष्य अपने कर्तव्य को परिणाम की चिंता से ऊपर रखता है—

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”

यह श्लोक राधाकृष्णन के जीवन को समझने की एक सुंदर दार्शनिक कुंजी अवश्य बन सकता है। शिक्षक के रूप में उन्होंने ज्ञान दिया, दार्शनिक के रूप में विचार दिया, राजदूत के रूप में संवाद दिया, उपराष्ट्रपति और सभापति के रूप में संवैधानिक मर्यादा निभाई और राष्ट्रपति के रूप में अपने दायित्व का निर्वहन किया। पद उनके लिए प्रतिष्ठा की सीढ़ियाँ नहीं थे; वे जिम्मेदारी के पड़ाव थे।

राधाकृष्णन की महानता शायद इसी में थी कि वे जहाँ भी गए, अपने साथ शिक्षक को लेकर गए। विश्वविद्यालय में वे शिक्षक थे, संसद में वे शिक्षक थे, कूटनीति में वे शिक्षक थे और राष्ट्रपति भवन में भी उनके भीतर का शिक्षक जीवित रहा। उनके लिए मनुष्य को शिक्षित करना केवल पाठ पढ़ाना नहीं था; मनुष्य के भीतर विवेक, संवेदना और नैतिक चेतना को जगाना था।

आज जब शिक्षा अनेक बार परीक्षा, प्रमाणपत्र, नौकरी और प्रतिस्पर्धा के बीच सिमटती दिखाई देती है, तब राधाकृष्णन का जीवन हमें एक बुनियादी प्रश्न के सामने खड़ा करता है—हम शिक्षा से बनाना क्या चाहते हैं—केवल सफल मनुष्य या सार्थक मनुष्य?

उनका उत्तर शायद स्पष्ट होता—शिक्षक केवल विषय नहीं पढ़ाता; वह दृष्टि देता है। वह केवल ज्ञान नहीं देता; विवेक जगाता है। वह केवल विद्यार्थी का भविष्य नहीं बनाता; वह समाज के भविष्य की नींव रखता है। एक शिक्षक की वास्तविक सफलता इस बात में नहीं कि उसके कितने विद्यार्थी ऊँचे पदों पर पहुँचे, बल्कि इस बात में है कि उसके कारण कितने मनुष्य बेहतर मनुष्य बने।

इसलिए 5 सितंबर केवल एक महान दार्शनिक की जन्मतिथि नहीं है। यह उस भारतीय परंपरा को प्रणाम करने का दिन है, जिसमें ज्ञान को जीवन का प्रकाश और शिक्षक को उस प्रकाश का वाहक माना गया। राधाकृष्णन ने अपने जीवन से सिद्ध किया कि शिक्षक का प्रभाव कक्षा की चार दीवारों तक सीमित नहीं रहता। उसके विचार विद्यार्थियों से आगे समाज तक पहुँचते हैं और उसका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रश्न छोड़ जाता है।

राधाकृष्णन आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन आज भी शिक्षा के अर्थ पर विचार करने को विवश करता है। उनकी पुस्तकों और व्याख्यानों में भारतीय दर्शन की गहराई है, पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण वह आग्रह है कि विचार जीवन से अलग न हो। ज्ञान तभी सार्थक है, जब वह मनुष्य को अपने समय, अपने समाज और अपने भीतर के सत्य के प्रति अधिक जागरूक करे।

आज शिक्षक दिवस पर उस अद्भुत, अपूर्व शिक्षक को स्मरण करते हुए मन श्रद्धा से भर उठता है। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को केवल इसलिए नमन नहीं कि वे भारत के राष्ट्रपति थे; उन्हें इसलिए नमन कि इतने ऊँचे पद पर पहुँचकर भी उन्होंने अपने भीतर के शिक्षक को कभी मरने नहीं दिया। उन्होंने ज्ञान को प्रतिष्ठा नहीं, साधना बनाया; दर्शन को जीवन से जोड़ा और शिक्षा को मनुष्य की अंतश्चेतना को जगाने का माध्यम माना।

हे भारत के महान शिक्षक, हे दर्शन के मनीषी, हे ज्ञान के साधक—आपको शत-शत नमन।

आप देह से विदा हो गए, लेकिन आपके जीवन का प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या ज्ञान हमें सचमुच बेहतर मनुष्य बना रहा है? शायद किसी शिक्षक की इससे बड़ी विरासत नहीं हो सकती कि उसके जाने के बाद भी उसके प्रश्न हमारे भीतर बेचैनी पैदा करते रहें और हमें अपने उत्तर खोजने के लिए विवश करें।

और जब आज हम आपकी स्मृति के सामने सिर झुकाते हैं, तो यह नमन केवल एक महान दार्शनिक, राष्ट्रपति या विद्वान को नहीं, उस शिक्षक को है जिसने अपने जीवन की ऊँचाइयों के बीच भी स्वयं को जनता, विद्यार्थियों और ज्ञान की साधना से अलग नहीं होने दिया। आपकी महानता किसी पद की ऊँचाई में नहीं, उस विनम्र सत्य में है कि ज्ञान अंततः मनुष्य के लिए है और मनुष्य से बड़ा कोई पद नहीं।

समय बहुत कुछ मिटा देता है—पद, प्रतिष्ठाएँ, राजमहल और स्मृतियों के अनेक नाम भी। लेकिन जिस शिक्षक ने किसी मनुष्य के भीतर सोचने की लौ जला दी, उसे समय पूरी तरह मिटा नहीं सकता। आप चले गए, आपकी आवाज़ मौन हो गई, आपकी आँखों के सामने की दुनिया बदल गई; पर आपके जीवन से निकला वह प्रश्न आज भी हमारे भीतर कहीं धीरे से दस्तक देता है। शायद यही एक महान शिक्षक की सबसे अमर पहचान है—वह स्वयं विदा हो जाता है, लेकिन उसकी कक्षा कभी समाप्त नहीं होती।

आज उनके जन्मदिवस पर मन, मस्तिष्क और आत्मा की गहराइयों से उस महान शिक्षक-दर्शनशास्त्री को विनम्र श्रद्धांजलि

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