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नई दिल्ली। तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के प्रमुख वैश्विक समूह ब्रिक्स में नए सदस्यों को शामिल करने की प्रक्रिया लगातार चर्चा का विषय बनी रहती है। वर्तमान में 11 पूर्ण और 10 साझेदार सदस्य देश इस मंच का हिस्सा हैं। ब्राजील रूस भारत चीन और दक्षिण अफ्रीका इसके संस्थापक सदस्य हैं जबकि मिस्र इथियोपिया ईरान यूएईए सऊदी अरब और इंडोनेशिया जैसे देश बाद में पूर्ण सदस्य बने हैं। इन पूर्ण सदस्यों में कई मुस्लिम बहुल राष्ट्र भी शामिल हैं। इसके बावजूद पाकिस्तान जैसे इस्लामिक मुल्क को चाहकर भी इस संगठन में प्रवेश नहीं मिल पा रहा है। पाकिस्तान की ब्रिक्स सदस्यता की राह में सबसे बड़ी अड़चन को भारत से जुड़ी आपत्तियों के रूप में देखा जाता है।
हालांकि इसे तकनीकी रूप से भारत का वीटो कहना पूरी तरह सही नहीं होगा क्योंकि ब्रिक्स में नए सदस्य को शामिल करने का फैसला आम सहमति से लिया जाता है। यानी अगर एक भी सदस्य देश को आपत्ति हो तो पूरी प्रक्रिया रुक सकती है। पाकिस्तान ने अगस्त 2023 में ब्रिक्स की सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन किया था जिसे चीन ने तुरंत समर्थन दिया। रूस की ओर से भी पाकिस्तान को समर्थन के संकेत मिले थे लेकिन इसके बावजूद 2024 में रूस की अध्यक्षता के दौरान यह स्पष्ट कर दिया गया कि पाकिस्तान की सदस्यता पर सदस्यों के बीच आम सहमति नहीं बन पाई है। यही वह बिंदु है जहाँ भारत की भूमिका अहम हो जाती है। नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच तनावपूर्ण संबंध और सीमा पार आतंकवाद को लेकर भारत की स्पष्ट आपत्तियां किसी से छिपी नहीं हैं। ऐसे में पाकिस्तान को ब्रिक्स में शामिल करने के लिए भारत की सहमति अपरिहार्य है। भले ही चीन और रूस पाकिस्तान के पक्ष में कितना भी जोर लगाएँ अकेले उनके समर्थन से पाकिस्तान ब्रिक्स का सदस्य नहीं बन सकताए जब तक भारत की सहमति से सर्वसम्मति न बने। यही कारण है कि चीन के प्रभाव के बावजूद पाकिस्तान की एंट्री अब तक अटकी हुई है।
पाकिस्तान पिछले कुछ वर्षों से गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है जिसमें भारी महंगाईए विदेशी मुद्रा की कमी कर्ज का दबाव और बार.बार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेने की आवश्यकता उसकी आर्थिक स्थिति को लगातार कमजोर करती रही है। हालांकिए यह कहना भी ठीक नहीं होगा कि पाकिस्तान को सिर्फ आर्थिक कमजोरी के कारण बाहर रखा गया हैए क्योंकि किसी भी आधिकारिक जानकारी में उसकी सदस्यता अस्वीकार करने की कोई एक वजह घोषित नहीं की गई है। रूस ने 2024 में केवल इतना कहा था कि उसकी सदस्यता पर आम सहमति नहीं बनी है। ब्रिक्स अब सिर्फ एक आर्थिक मंच नहीं रह गया है बल्कि इसका राजनीतिक महत्व भी लगातार बढ़ा है। ऐसे में सदस्य देश नहीं चाहेंगे कि भारत.पाकिस्तान का पुराना विवाद इस मंच पर भी हावी हो जाए। पाकिस्तान को शामिल करने से हर शिखर सम्मेलन में कश्मीर आतंकवाद और भारत.पाकिस्तान तनाव जैसे मुद्दे उठने की आशंका रहेगीए जिससे ब्रिक्स के आर्थिक एजेंडे पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि ब्रिक्स का विस्तार सिर्फ इस आधार पर नहीं होता कि कोई देश कितना बड़ा या रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैए बल्कि सदस्य देशों के बीच अच्छे संबंध और संगठन के भीतर सहमति भी अहम है।
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